गोइठा की आग, सत्तू की महक और आलू-बैंगन के चोखे की खुशबू, परंपरा से भरपूर देसी स्वाद का सफर, ऑथेंटिक रेसिपी! – Bihar News

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सीवान. बिहार और झारखंड में सर्दियों का मौसम आते ही एक खास बात जरूर होने लगती है. ठंडी हवाओं के संग अलाव जलता है, बच्चे, बूढ़े और जवान सभी आग सेंकने के लिए जुट जाते हैं और अलाव के बीच सुगंध बिखेरती एक खास चीज, देसी और दिल को छू लेने वाली लिट्टी-चोखा. इस मौसम में शायद ही कोई घर होगा, जहां हर शाम गोइठा की तपिश में सिकती लिट्टी की खुशबू न मिले.

गलियों से निकल, देश-दुनिया में पहुंचा लिट्टी-चोखा
बिहार-झारखंड की थाली का यह पारंपरिक भोजन अब देश-दुनिया की पसंद बन चुका है. बड़े शहरों की गलियों से लेकर दिल्ली, मुंबई के नामी फूड जॉइंट्स तक, लिट्टी-चोखा अपनी पहचान बना रहा है. विदेशों में बसे बिहारी भी इसे गर्व से बनाते और खिलाते हैं, क्योंकि इसका स्वाद सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि मिट्टी की याद, संस्कृति की छाप और घर की महक साथ लेकर आता है.

बिहार के इतिहास जितनी पुरानी है यह डिश
लिट्टी-चोखा हजारों अनुभूतियों का संगम है, जो एक बाइट में पककर यादों में उतर जाता है. कहा जाता है कि यह व्यंजन उतना पुराना है, जितना बिहार के खेतों का इतिहास. किसानों का साथी रहा यह खाना सदियों से हर घर-परिवार में बनता आया है. खासकर सर्दियों में, जब खेत में काम करने वाले किसान घर लौटते थे, गोइठा की धीमी आग पर सिकती लिट्टी उन्हें ऊर्जा देती थी और चोखा स्वाद बढ़ाता था.

बिहार की ठंड यानी लिट्टी
बिहार में ठंड का मतलब ही है गोबर से तैयार गोइठा की सुगंध और उसके ऊपर रखी लिट्टी का हल्का भुनना. घरों की चौखटें, आंगन, खेत के किनारे और मोहल्ले के नुक्कड़ तक, हर जगह एक जैसा दृश्य. बच्चे उत्साह से गोइठा ढेर करते हैं, महिलाएं आटा गूंथती हैं, बुजुर्ग बताते हैं कि कब पहली लिट्टी पलटनी है और यूं ही परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती जाती है.

क्या है ऑथेंटिग लिट्टी की विधि
लिट्टी बनाने की अपनी विशेष विधि है. सबसे पहले गेहूं के आटे में नमक, अजवाइन और घी या तेल मिलाकर मुलायम आटा तैयार किया जाता है. इसे थोड़ा समय आराम दिया जाता है, ताकि वह गुथकर मुलायम हो जाए. फिर आता है वह स्वाद, जो लिट्टी को अलग बनाता है.

सत्तू की पिट्ठी. भुने चने की सत्तू में नमक, अचार मसाला, जीरा, नींबू या अमचूर का हल्का खट्टापन, हरी मिर्च, धनिया और थोड़ी सी सरसों तेल की धार. इस मिश्रण से ऐसा स्वाद निकलता है, जो जब लिट्टी में भर जाता है तो जादू बन जाता है.

लिट्टी सेंकना है सबसे बड़ी कला
इसके बाद लिट्टी बनाने की असली कला आग में दिखती है. गोइठा यानी सूखे उपले को जलाकर धीमी लेकिन मजबूत आग तैयार की जाती है. उस पर गोल-गोल भरी हुई लिट्टी को थोड़ी दूरी पर रख दिया जाता है. कोई जल्दी नहीं, कोई जल्दबाजी नहीं. धीरे-धीरे लिट्टी पकती है, पलटती है और धुएं की खुशबू अपनी आत्मा में सोखती जाती है.

आधा से अधिक पक जाने के बाद आग को ऊपर से ढककर उन्हें पूरी तरह पकाया जाता है, सूती कपड़े से राख साफ होती है और फिर देसी घी की बूंदें उस पर पड़ते ही लिट्टी तैयार, खाने योग्य ही नहीं, बरसों याद रह जाने योग्य.

चोखे की बात न हो तो लिट्टी का सफर रह जाए आधा
बिहार में चोखा भी सिर्फ चोखा नहीं, कला है. भुना हुआ बैंगन, आग में पककर सुगंध छोड़ते टमाटर, साथ में उबला या भुना आलू छीलकर हाथों से मसलना, उसमें कूटा हुआ लहसुन, प्याज, हरी मिर्च, अदरक की ताजगी, धनिया की हरियाली और ऊपर से सरसों के तेल की तेज खुशबू. नमक डालते ही पूरा मिश्रण ऐसा बन जाता है, जिसकी महक दूर तक चली जाती है.

सिर्फ खाना नहीं, मिट्टी से जुड़ने का तरीका
थाली में लिट्टी, कटोरी में चोखा, इससे बड़ा भोज और क्या. यही कारण है कि बिहार-झारखंड से जुड़े किसी भी परिवार में, चाहे गांव में हो या विदेश में, सर्दियां आते ही मन खुद आवाज देता है. चलो लिट्टी-चोखा खाएं. यह सिर्फ खाना नहीं, अपनी मिट्टी से जुड़ने का तरीका है, संस्कृति का स्वाद है और यह याद दिलाता है कि परंपराएं कितनी भी पुरानी हो जाएं, लेकिन जब दिल उन्हें अपनाता है तो वे हमेशा ताजा रहती हैं.

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