Harivansh Rai Bachchan: जिस कवि ने शराब चखी नहीं, नशा शब्दों का था, जब ‘मधुशाला’ पर उठा सवाल और गांधी बने साक्षी

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नई दिल्ली. “मैं एक जगत को भूला, मैं भूला एक जमाना, कितने घटना-चक्रों में भूला मैं आना-जाना.” हरिवंश राय बच्चन हिंदी साहित्य के सुप्रसिद्ध कवि-लेखक और अनुवादकों में से एक हैं. उनकी कविताएं कमाल की होती हैं और रचनाएं आम-जनमानस को सहज रूप से प्रदर्शित करती हैं. इन कविताओं में भावुकता के साथ रस और आनंद का मिश्रण होता है.

“जीवन की आपाधापी में कब वक्त मिला, कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोंच सकूं, जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला.”

27 नवंबर 1907 को इलाहाबाद (प्रयागराज) में जन्मे हरवंश राय बच्चन ने मानव चेतना जागृति के लिए एक प्रेरणादायक कविता लिखी. यह हर इंसान की उस छवि को दर्शाती है जब जीवन की आपाधापी में भागदौड़ इस कदर है कि उसको वक्त नहीं कि वह कुछ सोच सके. उनकी लिखी कालजयी रचना ‘मधुशाला’ आज भी गुनगुनाई जाती है.

“अपने युग में सबको अनुपम ज्ञात हुई अपनी हाला, अपने युग में सबको अदभुत ज्ञात हुआ अपना प्याला. फिर भी वृद्धों से जब पूछा एक यही उत्तर पाया- अब न रहे वे पीने वाले, अब न रही वह मधुशाला.”

हरिवंश राय बच्चन एक ऐसे लेखक थे, जिन्होंने खुद कभी मदिरा को हाथ तक नहीं लगाया, लेकिन उस महफिल और अनुभव को पन्नों पर इस तरह उतारा कि उनकी कालजयी हिंदी काव्य-कृति ‘मधुशाला’ मशहूर हो गई. एक इंटरव्यू में अमिताभ बच्चन ने कहा था, “पिताजी ने कभी मदिरा पान नहीं किया. बहुत से लोगों को आश्चर्य होता था और कहते थे कि जब आप शराब पीते नहीं हैं तो आपने मधुशाला कैसे लिख दी.”

हालांकि, ‘मधुशाला’ ने समाज में जिस तरह जगह बनाई थी, उसके साथ-साथ विवाद भी चल रहा था. उस जमाने में ‘मधुशाला’ का काफी विरोध हुआ और कहा गया कि यह नई पीढ़ी को गुमराह कर रही है. इसी से जुड़ा किस्सा यह है कि ‘मधुशाला’ रचना का विरोध और विवाद होते-होते महात्मा गांधी तक पहुंच चुका था. तब महात्मा गांधी ने हरिवंश राय बच्चन को बुलाया और कहा कि पढ़ो तुमने क्या लिखा है. हरिवंश राय बच्चन ने पढ़कर सुनाया तो महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘इसमें कोई खराबी नहीं है.’ तब कहीं जाकर हरिवंश राय बच्चन को चैन की सांस मिल पाई थी. अमिताभ बच्चन ने उसी एक इंटरव्यू में आगे इसके बारे में बताया था.

“मैं कायस्थ कुलोदभव, मेरे पुरखों ने इतना ढाला, मेरे तन के लोहू में है 75 प्रतिशत हाला. पुश्तैनी अधिकार मुझे है मदिरालय के आंगन पर, मेरे दादों परदादों के हाथ बिकी थी मधुशाला.”

असल में यही वह जिंदगी की कड़ी थी, जिसे हरिवंश राय बच्चन ने काव्य-कृति का रूप दिया. अमिताभ बच्चन बताते हैं, “बार-बार पिताजी से लोग यही पूछते थे कि आपने मदिरा कभी नहीं पी, फिर भी कैसे ‘मधुशाला’ लिखी. उन्हें एक बार याद आया कि वे कायस्थों के कुल में पैदा हुए थे, जो पीने के लिए काफी प्रसिद्ध थे. तब उन्होंने इस बारे में अपने एक संस्करण में लिखा था.

हो चुका है चार दिन मेरा तुम्हारा, हेम हंसिनि, और इतना भी यहां पर कम नहीं है. एक आंधी है, उठी गर्दोगुबारी, और इसी के साथ उड़ जाना मुझे है. जानता मैं हूं नहीं, कोई नहीं है, कब तुम्हारे पास फिर आना मुझे है. यह विदा का नाम ही होता बुरा है. डूबने लगती तबीयत, किंतु सोचो—हो चुका है चार दिन मेरा तुम्हारा, हेम हंसिनि, और इतना भी यहां पर कम नहीं है.”

इस कविता के जरिए हरिवंश राय बच्चन ने प्रेम के साथ-साथ जिंदगी की असलियत से दर्शकों को रूबरू कराया. ‘हेम हंसिनि’ उनकी एक प्रसिद्ध कविता का हिस्सा है, जो उनके प्रेम और जीवन-दर्शन को दर्शाती है, जहां वे ‘हेम हंसिनि’ को संबोधित करते हुए कहते हैं कि जीवन के चार दिन बीत चुके हैं और यह समय कम नहीं है, जिसमें हर्ष और गम दोनों शामिल हैं.

‘जितनी सरल बात होगी, उतनी ही लोगों को समझ आएगी. सरल लिखने के लिए सरल होना बड़ा जरूरी है.’ हरिवंश राय बच्चन सरल भाषा में लिखने पर बड़ा जोर देते थे. यही एक वजह रही कि बच्चन की बोलचाल की भाषा ने उन्हें साहित्य की जगह में नई पहचान दिलाई.

साल 1935 में हिंदी कविता के आकाश पर चमकते सितारे की तरह छा जाने वाले हरिवंश राय बच्चन को हिंदी का उमर खय्याम और जन कवि भी कहा गया. उन्होंने लगभग एक लाख चिट्ठियां अपने चहेते प्रशंसकों को लिखीं, जो समय के साथ विशिष्ट साहित्यिक धरोहर बन गईं. उनकी आत्मकथा ‘क्या भूलूं क्या याद करूं’ साहित्य जगत में बेमिसाल मानी जाती है.

उन्होंने ताउम्र अपने कलम से दुनिया को रोशन किया. साल 1966 में हिंदी साहित्य जगत में अपने अविस्मरणीय योगदान के लिए उन्हें राज्यसभा में मनोनीत किया गया. उन्हें पद्मभूषण (1976), केके बिरला फाउंडेशन के पहले सरस्वती सम्मान, साहित्य अकादमी पुरस्कार (1969), सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, और एफ्रोएशियन राइटर्स कांफ्रेंस के लोट्स पुरस्कार और हिंदी साहित्य सम्मेलन साहित्य वाचस्पति सम्मान भी मिला. 18 जनवरी 2003, हिंदी साहित्य के लिए यह वह दुखद दिन था जब हरिवंश राय बच्चन इस दुनिया को अलविदा कहकर चले गए.

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