आज खुलेंगी शाहजहां और मुमताज की असली कब्रें, ताजमहल के अंदर ‘उर्स’ का आयोजन, क्या है इसका इतिहास?
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Agra News: ताजमहल में आज मुमताज की उर्स मनाई जाएगी. इस दौरान ताजमहल की एंट्री फ्री कर दी गई है. 17 जनवरी को उर्स के दौरान ताजमहल के अंदर बादशाह शाहजहां और मुमताज की असली कब्र पर 1720 मीटर लंबी चादर पोशी की जाएगी. मुस्लिम समाज में उर्स को बड़े धूमधाम से मनाया जाता है. आइए जानते हैं कि उर्स को लेकर क्या कहानी है.

आगरा में उर्स का महत्व विशेष माना जाता है. 15 जनवरी से शुरू हुआ उर्स 17 जनवरी तक मनाया जाएगा. इस दौरान तीन दिनों तक ताजमहल में एंट्री फ्री रहेगी. 17 जनवरी को उर्स के दौरान ताजमहल के अंदर बादशाह शाहजहां और मुमताज की असली कब्र पर 1720 मीटर लंबी चादर पोशी की जाएगी. मुस्लिम समाज में उर्स को बड़े धूमधाम से मनाया जाता है.

उर्स के दौरान ताजमहल में अपार भीड़ भी देखने को मिलती है. दरअसल उर्स हर साल तीन दिनों तक मनाया जाता है. दरअसल उर्स मुगल बादशाह शाहजहां की याद में मनाया जाता है. इस दिन ताजमहल के नीचे शाहजहां और मुमताज की असली कब्रों को खोला जाता है. उर्स के दौरान तीन दिनों तक आम पर्यटक भी असली कब्रों को देख सकते हैं. यह कब्र साल में एक बार केवल उर्स के दौरान ही खोली जाती है.

उर्स को लेकर इतिहास बताता है कि पहले यहां मुमताज की याद में उर्स मनाया जा चुका है. बता दें कि आइरिश लेखिका ईबा कोच ने अपनी किताब ‘दी कंप्लीट ताजमहल एंड द रिवरफ्रंट गार्डन्स ऑफ आगरा’ में इसका जिक्र किया है. 22 जून 1632 को मुमताज का पहला उर्स ताजमहल में उद्यान में मना था. उस दौरान ताज का निर्माण चल रहा था. उर्स के लिए फोरकोर्ट में शाही टेंट व कारपेट लगवाए गए थे. पहले उर्स में सभी लोगों ने सफेद वस्त्र पहनकर शिरकत की थी और आभूषण भी सफेद रंग वाले ही पहने थे. शाहजहां ने कुरान की आयतें पढ़ी थीं और मुमताज की आत्मा की शांति को दुआ की थी.
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ताजमहल में दूसरा उर्स भी मुमताज का ही मनाया गया था. इतिहाकारों के मुताबिक, दूसरी बार मुमताज का उर्स 26 मई, 1633 को मनाया गया, उस वक्त यमुना किनारे पर मकबरे का निचला तल बनकर तैयार हो चुका था. वर्ष 1643 में मुमताज का 12वां उर्स मना था. वर्ष 1666 में शाहजहां की मौत के बाद उनका उर्स शुरू हो गया. कहा जाता है कि बादशाह की मौत के बाद से अब तक उनकी याद में उर्स मनाया जाता है.

इतिहासकारों के अनुसार, बादशाह की बेगम मुमताज की मौत 17 जून, 1631 में मध्य प्रदेश के बुरहानपुर में हुई थी और उनका पहला दफन वहीं जैनाबाद के बाग में हुआ था. 6 महीने बाद उनके शव को ताबूत में रखकर आगरा लाया गया. ताजमहल में शाही मस्जिद के नजदीक स्थित जिलाऊखाना में उनका दूसरा दफन किया गया था. ताजमहल का निर्माण पूरा होने के बाद उनके शव को तीसरी बार मुख्य स्मारक में दफन किया गया था. तब पहला उर्स बेगम मुमताज की याद में मनाया गया था. आज ताजमहल में 371वां उर्स मनाया जा रहा है.

इतिहासकार बताते हैं कि 6 जून, 1719 को सैयद बंधुओं ने रफीउद्दौला को दिल्ली की गद्दी पर बैठाया था. उसी समय मित्रसेन नागर ने आगरा किले में निकुसियर को गद्दी पर बैठाया. इस पर सैयद बंधुओं ने आगरा पर हमला कर निकुसियर को कारावास में डाल दिया. मित्रसेन नागर ने आत्महत्या कर ली थी. सैयद बंधुओं में छोटे भाई हुसैन अली ने शाही कोष पर कब्जा कर लिया. इसमें मुमताज की कब्र पर प्रतिवर्ष उर्स में चढ़ाई जाने वाली मोतियों की चादर भी थी. बताया जाता है कि उस समय चादर की क़ीमत करीब चार हजार रुपये थी. चादर लुटने के बाद मुमताज का उर्स बंद हो गया और फिर मुमताज का उर्स कभी नहीं मनाया गया.

इतिहासकारों के अनुसार, मुमताज बच्चे की पैदाइश के समय मरी थी, इसीलिए उन्हें शहीदी का दर्जा मिला था. कहा जाता है कि इसी वजह से मुमताज का उर्स मनाया जाने लगा था. माना जाता है कि शाहजहां की मौत के बाद उनका उर्स मनाना शुरू किया गया. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) का एक्ट ब्रिटिश काल में बना था, तभी स्मारक में उर्स के दौरान तीन दिन निशुल्क प्रवेश का नियम बना.

इस साल ताजमहल में 371वां उर्स मनाया जा रहा है. हर साल की तरह इस साल भी बड़े धूमधाम से तैयारी की गई है. उर्स को लेकर तहखाने में स्थित शाहजहां और मुमताज की असली कब्रें खोल दी गई हैं. ताजमहल में इन तीन दिनों में रिकॉर्डतोड़ भीड़ आने की उम्मीद जताई जा रही है. सुरक्षा व्यवस्था के व्यापक इंतजाम भी किये गए है. किसी प्रकार की पर्यटकों को दिक्कत ना हो, इसे लेकर भारतीय पुरातत्व विभाग ने पूरी तैयारी कर ली है.