West Bengal Election | PM Modi Ralli in Singur | Singur Tata-Nano-Plant News |
बात अक्टूबर 2008 की है. पश्चिम बंगाल के सिंगूर में करीब 1000 एकड़ उपजाऊ जमीन पर एक अजीब सी खामोशी छा गई. यह खामोशी टाटा ग्रुप के तत्कालीन चेयरमैन रतन टाटा की एक नाटकीय घोषणा के बाद आई थी. वह घोषणा थी टाटा के नैनो कार प्रोजेक्ट से जुड़ी. जी हां, खराब कारोबारी माहौल का हवाला देते हुए टाटा ने नैनो कार प्रोजेक्ट को सिंगूर से गुजरात के सानंद में शिफ्ट करने की घोषणा की. तब टाटा ने एक अच्छा एम (गुड एम) और एक बुरा एम (बैड एम) का जिक्र किया था. टाटा की नजर में शायद इसका अर्थ था बुरा एम मतलब ममता बनर्जी और अच्छा एम मतलब गुजरात के तब के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी. उन्होंने कहा था कि उनके सिर पर बंदूक तान दी गई थी और ट्रिगर दबा दिया गया था.
अठारह साल बाद भी सिंगूर की वह जमीन ज्यादातर बंजर पड़ी है. खेती वापस शुरू नहीं हुई है. और सिंगूर एक प्रतीक बना हुआ है- खोए हुए मौके, राजनीतिक टकराव और अधूरे वादों का. दरअसल, सिंगूर विवाद के दौरान रतन टाटा ने ममता बनर्जी के नेतृत्व में हुए विरोध प्रदर्शनों के कारण पश्चिम बंगाल से टाटा मोटर्स का नैनो प्लांट हटाने का फैसला किया था. यह पूरा मामला पश्चिम बंगाल में भूमि अधिग्रहण और ममता बनर्जी के नेतृत्व में हुए किसान आंदोलन से जुड़ा था. इसी के बाद टाटा समूह को प्लांट गुजरात ले जाना पड़ा.
सिंगूर के किसानों का दुख
आज इस जमीन के ज़्यादातर हिस्से पर खेती के कोई निशान नहीं दिखते. News18 ने उन किसानों से बात की, जिन्होंने अपनी मर्जी से और बिना मर्ज़ी के ज़मीन दी थी, जिनकी जिंदगी सिंगूर आंदोलन से बदल गई थी. सिंगूर के रहने वाले कौशिक बाग अब 60 के दशक में हैं. उन्होंने News18 को बताया कि वह अपनी मर्ज़ी से जमीन देने वाले किसान थे. उन्होंने टाटा फैक्ट्री के लिए सरकार को छह बीघा जमीन दी थी. उन्होंने उस समय तीन महीने की ट्रेनिंग भी ली थी, इस उम्मीद में कि उन्हें रोजगार मिलेगा. लेकिन कुछ नहीं हुआ.
आज इस जमीन के ज़्यादातर हिस्से पर खेती के कोई निशान नहीं दिखते.
जमीन मिली मगर अब खेती लायक नहीं
हालांकि जमीन आखिरकार वापस मिल गई. कौशिक कहते हैं कि अब वह खेती के लायक नहीं रही. 18 साल की रुकावट के बाद अब उन्हें उम्मीद है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा से बदलाव आ सकता है. हालांकि, कौशिक बाग अकेले नहीं हैं. श्यामापदो दास कहते हैं कि वह बिना मर्जी के जमीन देने वाले किसान थे, जिन्होंने तीन बीघा जमीन दी थी. उन्होंने आंदोलन के दौरान मीटिंग और रैलियों में हिस्सा लिया था, यह मानते हुए कि जमीन वापस मिल जाएगी और खेती फिर से शुरू हो जाएगी.
सिंगूर की बंजर जमीन
श्यामापदो दास आज कहते हैं कि खेतों में जंगली जानवर घूमते हैं और खेती असंभव है. पीछे मुड़कर देखें तो श्यामापदो का मानना है कि सिंगूर एक राजनीतिक अखाड़ा बन गया था और आखिरकार किसानों के साथ धोखा हुआ. वहीं, स्वपन मित्रा कहते हैं कि उस समय उनके परिवार ने राजनीतिक आश्वासनों पर भरोसा किया था. स्वपन मित्रा के पिता ने एक बीघा जमीन दी थी.
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कैसे राजनीति में फंस गए किसान
स्वपन मित्रा अब इसे एक गलती कहते हैं और कहते हैं कि परिवार राजनीति में फंस गया था. आज स्वपन चाहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी दखल दें और आजीविका बहाल करने में मदद करें. न्यूज18 के कैमरों ने जब पड़ताल की तो पाया कि सिंगूर में जमीन खेती के लिए कितनी मुश्किल हो गई है. माणिक घोष नामक एक और किसान जो शुरू से ही आंदोलन का हिस्सा थे, अब गुजारा करने के लिए ऑटो चलाते हैं. वह कहते हैं कि जमीन वापस मिलने के बाद उन्होंने खेती करने की कोशिश की, लेकिन मिट्टी अब फसल नहीं उगा सकती थी. माणिक का मानना है कि फैक्ट्री उनकी जिंदगी बदल सकती थी और वह मौका अब चला गया है.
पीएम मोदी आने वाले हैं सिंगूर
बहरहाल, इस इलाके को अब भी उम्मीद है, वह भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से. इस इलाके को आज भी स्थानीय लोग ‘टाटा की जमीन’ कहते हैं. आज उम्मीद एक अलग रूप में वापस आई है. कारण कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सिंगूर आने वाले हैं. कई निवासियों के लिए, इस दौरे से पुनरुद्धार, पहचान और एक संभावित नई शुरुआत की उम्मीदें जुड़ी हैं.
जहां विरोध शुरू हुआ, उस गांव का हाल
News18 गोपालनगर गया. यह वही गांव है, जहां से सिंगूर विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ था. यहां किसान अब खुले तौर पर मानते हैं कि उन्हें राजनीतिक लड़ाइयों में मोहरे के तौर पर इस्तेमाल किया गया. किसान अशोक घोष कहते हैं कि वादे किए गए थे लेकिन कभी पूरे नहीं हुए. गांव के एक और किसान स्वपन घोष भी यही बात कहते हैं कि रोजी-रोटी छिन गई, लेकिन किसी की जवाबदेही तय नहीं हुई.
सिंगूर को अब मोदी से उम्मीद
खैर, नैनो प्रोजेक्ट के सिंगूर से गुजरात शिफ्ट होने के अठारह साल बाद भी जमीन शांत है, लेकिन उम्मीदें एक बार फिर बढ़ रही हैं. क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी दौरा करने वाले हैं, ऐसे में मुख्य सवाल बना हुआ है: क्या सिंगूर को आखिरकार एक नई पहचान मिलेगी, या यह खोए हुए अवसर का प्रतीक बना रहेगा? अब सबकी नजरें सिंगूर और पीएम मोदी के दौरे पर हैं.
क्या है सिंगूर विवाद?
कोलकाता से करीब 40 किलोमीटर दूर सिंगूर में नैनो परियोजना के लिए सरकार ने कुल 997.11 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया था. मगर तृणमूल कांग्रेस और किसानों के संगठन कृषि जमीं जिबिका रक्षा कमेटी (केजेजेआरसी) का कहना था कि इसमें से 400 एकड़ जमीन किसानों से उनकी मर्जी के खिलाफ ली गई है, लिहाजा यह जमीन उन्हें लौटा दी जानी चाहिए. तब तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी इस मांग को लेकर अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ गई थीं. इस दौरान हिंसा भी हुई थी. प्रदर्शनकारियों द्वारा कथित रूप से संयंत्र के कर्मचारियों को डराए-धमकाए जाने की वजह से टाटा मोटर्स ने संयंत्र में कामकाज बंद कर दिया. बाद में टाटा ने नैनो प्रोजेक्ट को गुजरात शिफ्ट कर दिया. तब ममता बनर्जी विपक्ष में थीं.