Justice Mishra Vs Abhishek Manu Singhvi | Supreme Court News | Mamata Banerjee IPAC – ‘अब सब टेलीकास्ट होता है’—ED केस में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के मायने क्या हैं?
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Supreme Court News: ED बनाम बंगाल सरकार केस की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में माहौल तब गरमा गया, जब जस्टिस मिश्रा ने कहा कि हम 10 मिनट में भी आदेश दे सकते थे. सिंघवी की दलील, मेहता के आरोप और कोर्ट की सख्त टिप्पणियों ने इस मामले को संवैधानिक बहस के केंद्र में ला दिया. इस मामले में कोर्ट अब 3 फरवरी को सुनवाई करेगा और यह तय करेगा कि यह मामला सीबीआई को सौंपा जाए या नहीं….
सिंघवी की किस दलील को सुप्रीम कोर्ट ने नहीं माना नई दिल्ली. प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच टकराव से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई उस वक्त बेहद दिलचस्प और तीखी हो गई जब न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा ने वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी की दलील पर टिप्पणी करते हुए कहा कि नहीं, नहीं, हम 10 मिनट बाद भी आदेश पारित कर सकते थे लेकिन चूंकि बहुत बहस हुई इसलिए सब कुछ रिकॉर्ड करना जरूरी था, क्योंकि अब सब कुछ टेलीकास्ट होता है. यह टिप्पणी उस वक्त आई जब अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत से आग्रह किया कि ED अधिकारियों के खिलाफ दर्ज FIR पर रोक नहीं लगाई जाए या कम से कम जांच बिना किसी दबाव के हो.
सिंघवी की कौन-सी दलील पर आया जज का जवाब?
सिंघवी ने कोर्ट से कहा कि कृपया बिना किसी दबाव के जांच का निर्देश दें. अगर FIR पर रोक लगाई जाती है, तो हमें आवेदन करने के लिए कुछ और समय दिया जाए. यही वह बिंदु था, जिस पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामला इतना गंभीर है कि सिर्फ अंतरिम राहत देने से पहले हर दलील और हर शब्द का रिकॉर्ड होना जरूरी है. न्यायमूर्ति मिश्रा का संकेत साफ था कि यह कोई साधारण प्रक्रिया नहीं, बल्कि संवैधानिक संतुलन और एजेंसियों की स्वतंत्रता से जुड़ा मामला है.
सुप्रीम कोर्ट के अहम निर्देश
सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कई महत्वपूर्ण आदेश और टिप्पणियां कीं कि ED अधिकारियों के खिलाफ दर्ज सभी FIR अगली सुनवाई तक स्थगित रहेंगी. तलाशी के दौरान परिसर के CCTV फुटेज सुरक्षित रखने का निर्देश भी दिया. सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले तक ED अधिकारियों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी. इस मामले में कोर्ट ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, पुलिस कमिश्नर और DGP को नोटिस जारी किया है. इस मामले की अगली सुनवाई 3 फरवरी को होगी.
कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि यह अत्यंत गंभीर मुद्दा है कि केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई में क्षेत्रीय पुलिस हस्तक्षेप कर रही है. संविधान हर व्यवस्था को स्वतंत्र रूप से काम करने की छूट देता है. कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि राज्य पुलिस को यह अधिकार नहीं कि वह वैधानिक केंद्रीय एजेंसी की कार्रवाई में बाधा डाले. कोई भी केंद्रीय एजेंसी किसी राजनीतिक दल के चुनावी कार्यक्रम में हस्तक्षेप नहीं कर सकती लेकिन गैरकानूनी गतिविधियों के खिलाफ कानून के तहत कार्रवाई कर सकती है.
क्या बोले तुषार मेहता
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बंगाल सरकार पर बेहद गंभीर आरोप लगाए कि यह सरासर चोरी है. पुलिस मुख्यमंत्री बनर्जी के साथ मिलकर सबूत हटाने और नष्ट करने आई थी. मेहता ने कहा कि मुख्यमंत्री ने कथित तौर पर फाइलें अपने कब्जे में ले लीं और एक ED अधिकारी का फोन जब्त किया गया. इससे केंद्रीय एजेंसियों का मनोबल गिरेगा. उन्होंने यहां तक कहा कि अगर ऐसे मामलों में मिसाल नहीं बनेगी, तो राज्य सरकारें समझेंगी कि वे घुसपैठ कर सकती हैं. सबूत उठा सकती हैं और फिर धरने पर बैठ सकती हैं.
जस्टिस का क्या था सवाल ?
जस्टिस मिश्रा ने कहा कि तो क्या हमें उन्हें निलंबित कर देना चाहिए? मेहता ने जवाब दिया कि सक्षम अधिकारियों को कार्रवाई का निर्देश दिया जाए. मैंने PMLA की धारा 54 का हवाला दिया है. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह साफ कर दिया कि मामला संघीय ढांचे केंद्रीय एजेंसियों की स्वायत्तता और कानून के शासन से जुड़ा है. इसीलिए, कोर्ट ने जल्दबाजी में आदेश देने के बजाय हर बहस को रिकॉर्ड पर लाना जरूरी समझा.