Chandauli News : चंदौली का प्रभास गिरी पभोषा मेला…जिसकी पहचान हैं लाठियां, 200-200 रुपये में एक से एक

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Prabhaas Giri Pabhosha Mela Chandauli : प्रभास गिरी पभोषा मेला आस्था, परंपरा और रोजगार का अनोखा संगम है. इस मेले की सबसे बड़ी खासियत बन चुकी हैं यहां की मशहूर लाठियां. ये मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करता है. मेले में बिकने वाली लाठियां सिर्फ सहारे का साधन नहीं हैं, बल्कि ग्रामीण संस्कृति और परंपरा की पहचान भी हैं. एक लाठी की कीमत 200 से 300 के बीच होती है. अच्छी गुणवत्ता वाली हाथों-हाथ बिक जाती हैं.

कौशांबी. उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले का प्रभास गिरी पभोषा मेला अपनी धार्मिक आस्था के साथ-साथ एक अनोखी परंपरा के लिए भी पूरे प्रदेश में प्रसिद्ध है. इस मेले की सबसे बड़ी पहचान यहां मिलने वाली लाठियां हैं, जो कई वर्षों से इस मेले की खासियत बनी हुई हैं. कहा जाता है कि प्रभास गिरी पभोषा मेले में आने वाला शायद ही कोई होगा, जो यहां से लाठी खरीदे बिना लौट जाए. यहां की लाठियां न सिर्फ मजबूत और टिकाऊ होती हैं, बल्कि इनमें ग्रामीण परंपरा, हुनर और आस्था की झलक भी देखने को मिलती है. यही कारण है कि मेले में दूर-दराज से आए श्रद्धालु और पर्यटक लाठी खरीदना बेहद पसंद करते हैं. ये मेला मकर संक्रांति पर लगता है. आज इसका पहला दिन था. इस बार 14 और 15 जनवरी को लगा है.

मेले के दौरान लाठी विक्रेताओं की संख्या सैकड़ों से ज्यादा दुकानें लगती हैं. इस मेले मे आए हुए अधिकाधिक लोग लाठी खरीदना पसंद करते हैं. विक्रेता मेरठ जिले से लाठी लेकर मेले में बेचते है. यहां पर हजारों रुपये वाली लाठी भी देखने को मिलती है. ये विक्रेता मेले के दिनों में सुबह से देर रात तक लाठियों की बिक्री करते हैं. एक लाठी की कीमत आमतौर पर 200 से 300 रुपये के बीच होती है, और अच्छी गुणवत्ता वाली लाठियां हाथों-हाथ बिक जाती हैं. इस तरह से लाठी विक्रेताओं के लिए एक सुनहरा मौका होता है क्योंकि यहां पर अधिक संख्या में लाठियां बेचकर मुनाफा कमा लेते हैं. प्रत्येक दुकानदार दो दिवसीय मेले में कम से कम 40 से 50 हजार रुपये तक की लाठियों की बिक्री कर लेते हैं.

किसी के लिए शौक, किसी की परंपरा

इस तरह से दो दिनों में विक्रेताओं को कम से कम 25 से 30 हजार का मुनाफा हो जाता है. कई विक्रेता बताते हैं कि मेले के कुछ ही दिनों में वे हजारों लाठियां बेच लेते हैं, जिससे उन्हें साल भर के लिए अच्छी आय हो जाती है. प्रभास गिरी पभोषा मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करता है. मेले में बिकने वाली लाठियां सिर्फ सहारे का साधन नहीं हैं, बल्कि ग्रामीण संस्कृति और परंपरा की पहचान भी हैं. बुजुर्गों के लिए सहारा, युवाओं के लिए शौक और कुछ लोगों के लिए परंपरा निभाने का प्रतीक—हर वर्ग के लोग यहां से लाठी खरीदते नजर आते हैं.

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Priyanshu Gupta

Priyanshu has more than 10 years of experience in journalism. Before News 18 (Network 18 Group), he had worked with Rajsthan Patrika and Amar Ujala. He has Studied Journalism from Indian Institute of Mass Commu…और पढ़ें

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