‘9 से 5 की नौकरी कर लो’, दीपिका पादुकोण की 8 घंटे की शिफ्ट दिग्गज एक्टर का रिएक्शन, दी अमिताभ बच्चन की मिसाल
मुंबई. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में इन दिनों एक्टर्स के लिए तय काम के घंटे को लेकर बहस चल रही है. कई एक्टर्स, प्रोड्यूसर और डायरेक्टर इस मुद्दे पर अपनी राय रख चुके हैं. जहां कई लोग दीपिका पादुकोण की एक्टर्स के लिए 8 घंटे की शिफ्ट की मांग को सपोर्ट कर रहे हैं, वहीं कुछ लोग इसे गैरजरूरी बता रहे हैं. अब दिग्गज एक्टर राजेंद्र चावला ने भी इस पर अपनी राय रखी है. उनका कहना है कि अगर आप एक्टिंग की दुनिया में आए हैं, तो आपको इसके हिसाब से ही काम करना पड़ेगा. अगर आप ऐसा नहीं कर सकते हैं तो 9-5 की नौकरी कर लो.
राजेंद्र चावला ने बॉलीवुड बबल को दिए इंटरव्यू में कहा, “मैं इसे समझता हूं, लेकिन अगर आप इस इंडस्ट्री में आ रहे हैं तो आपको पहले दिन से ही समझ लेना चाहिए कि यहां काम ऐसे ही होता है. आपको ये मानना पड़ेगा कि यहां 12 से 14 घंटे की शिफ्ट चलती है क्योंकि काम का वॉल्यूम बहुत बढ़ गया है.”
राजेंद्र चावला ने कहा,”मसलन, डेली सोप्स के लिए 22 से 25 मिनट का कंटेंट डिलीवर करना होता है. अब ऐसे में अगर आप ये सोचते रहेंगे कि ‘मैं 8 घंटे या 5 घंटे ही काम करूंगा’, तो काम कैसे पूरा होगा? अगर आप इस दौड़ में आए हैं तो उसी हिसाब से दौड़ना पड़ेगा. अगर आप इसे स्वीकार नहीं कर सकते तो 9 से 5 की नौकरी कर लो और खुश रहो.”
राजेंद्र चावला ने आगे कहा, “किसी ने आपको यहां आने के लिए मजबूर नहीं किया है. थक कर सोना बेहतर है, न कि चिढ़ कर.” राजेंद्र ने बताया कि अब सेट पर एक्टर्स को मिलने वाली सुविधाएं पहले से काफी बेहतर हो गई हैं. उन्होंने याद किया कि एक समय था जब अमिताभ बच्चन जैसे एक्टर भी धूप में पूरा कॉस्ट्यूम पहनकर बैठे रहते थे.
अमिताभ बच्चन कॉस्ट्यूम पहन धूप में बैठे रहते थे
राजेंद्र चावला ने कहा, “अब एक्टर्स के लिए चीजें बहुत बेहतर हो गई हैं. सबकी अपनी वैनिटी है, अपना स्टाफ है. हमारे समय में महिलाएं खुले में या पेड़ों के पीछे कपड़े बदलती थीं. न एयर कंडीशंड मेकअप रूम थे, न फ्लोर. अमिताभ बच्चन जैसे लोग भी धूप में पूरा कॉस्ट्यूम पहनकर बैठे रहते थे. आजकल अगर किसी का शॉट नहीं है तो वो वैनिटी में चले जाते हैं.”
राजेंद्र चावला को प्रोड्यूसर से मिली वैनिटी वैन
राजेंद्र चावला ने अपनी जिंदगी का एक किस्सा भी शेयर किया, “एक बार जब मैं ‘सास बिना ससुराल’ कर रहा था, तो एक सुपरवाइजिंग प्रोड्यूसर मेरे पास आए और बोले, ‘सर, आपके बारे में कभी कोई शिकायत नहीं सुनते. आप कभी कुछ कहते नहीं.’ मैंने उनसे कहा, ‘शिकायत किस बात की करूं? जब थिएटर शो के लिए जाता था, तो कीड़ों से भरे कमरों में सोते थे. सोने के लिए दरी मिलती थी. आप लोगों ने मुझे वैनिटी वैन दी है, फल दिए हैं, और मेरे नाम की चादर दी है- अब शिकायत किस बात की करूं?’”