Makar Sankranti 2026। नेपाल नरेश की खिचड़ी की परम्परा

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Makar Sankranti 2026 : पूर्वांचल की संस्कृति और आस्था में मकर संक्रांति का दिन किसी बड़े पर्व से कम नहीं माना जाता. इस दिन को यहां आम भाषा में खिचड़ी पर्व भी कहा जाता है. उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में स्थित गोरखनाथ मंदिर इस पर्व का मुख्य केंद्र होता है, जहां लाखों श्रद्धालु भगवान गोरक्षनाथ को खिचड़ी चढ़ाने पहुंचते हैं. खास बात यह है कि इस परंपरा में नेपाल के राजा की भी अहम भूमिका मानी जाती है. बहुत कम लोग जानते हैं कि मकर संक्रांति के दिन गोरखनाथ मंदिर में सबसे पहले खिचड़ी गोरक्षपीठाधीश्वर चढ़ाते हैं और उसके बाद नेपाल नरेश की ओर से खिचड़ी अर्पित की जाती है. यह परंपरा सिर्फ धार्मिक नहीं बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जुड़ाव का भी प्रतीक है. गोरखनाथ मंदिर और नेपाल के राजवंश के बीच सदियों पुराना संबंध बताया जाता है. खिचड़ी जैसा साधारण भोजन यहां बराबरी, भक्ति और सेवा का प्रतीक माना जाता है. यही कारण है कि इस दिन अमीर-गरीब, राजा-रंक सभी एक समान भाव से भगवान को खिचड़ी चढ़ाते हैं. इस परंपरा के पीछे कई रोचक कथाएं और मान्यताएं जुड़ी हुई हैं, जिन्हें जानना हर श्रद्धालु के लिए दिलचस्प होता है.

गोरखनाथ को क्यों प्रिय है खिचड़ी
मान्यता है कि भगवान गोरक्षनाथ को खिचड़ी सबसे अधिक प्रिय है. गोरखपुर को उनकी तपस्थली माना जाता है और आदि काल से यहां मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा चली आ रही है. मंदिर में इस दिन विशेष पूजा होती है और प्रसाद के रूप में भी भक्तों को खिचड़ी दी जाती है.

लोक मान्यताओं के अनुसार हिमाचल प्रदेश के ज्वाला देवी मंदिर में जो जल निरंतर उबलता रहता है, वह भगवान गोरक्षनाथ के लिए खिचड़ी पकाने के लिए उबल रहा है. यही वजह है कि खिचड़ी पर्व को गोरखनाथ परंपरा से जोड़ा जाता है.

ज्वाला देवी से जुड़ी कथा
कहानी के अनुसार एक बार भगवान गोरक्षनाथ ज्वाला देवी के यहां भोजन के लिए पहुंचे थे. वहां उन्हें तामसी भोजन परोसा गया, जिसे उन्होंने ग्रहण नहीं किया. देवी के आग्रह पर गोरक्षनाथ ने कहा कि जल गर्म रखिए, वे भिक्षा मांगकर कुछ लेकर आते हैं.

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भिक्षा मांगते हुए वे गोरखपुर तक पहुंच गए, लेकिन जिस खप्पर में वे भिक्षा एकत्र कर रहे थे, वह कभी पूरा नहीं भर सका. इसके बाद उन्होंने गोरखपुर को अपनी साधना स्थली बना लिया और यहीं निवास करने लगे. तभी से ज्वाला देवी में जल उबलता रहने और गोरखपुर में खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा मानी जाती है.

नेपाल के राजा और गोरखनाथ का संबंध
गोरखनाथ मंदिर का नेपाल से गहरा नाता बताया जाता है. ऐसी मान्यता है कि नेपाल के शाह वंश की उत्पत्ति भगवान गोरक्षनाथ के आशीर्वाद से हुई थी. इसी कारण नेपाल के राजा गोरखनाथ को अपना गुरु मानते हैं.

मकर संक्रांति के दिन जब पहली खिचड़ी गोरक्षपीठाधीश्वर चढ़ाते हैं, उसके बाद नेपाल नरेश की ओर से दूसरी खिचड़ी चढ़ाई जाती है. इसके बाद आम श्रद्धालु खिचड़ी अर्पित करते हैं. यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है.

मकर संक्रांति पर लगता है विशाल मेला
हर साल मकर संक्रांति के दिन गोरखनाथ मंदिर में विशाल मेला लगता है. देश के अलग-अलग राज्यों से ही नहीं, नेपाल से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं. मंदिर प्रशासन और जिला प्रशासन की ओर से सुरक्षा और व्यवस्था के खास इंतजाम किए जाते हैं.

श्रद्धालुओं का कहना है कि वे बचपन से इस परंपरा का पालन करते आ रहे हैं. खिचड़ी पर्व समाज में समानता और आपसी भाईचारे का संदेश देता है. शायद यही वजह है कि खिचड़ी को भगवान गोरक्षनाथ का सबसे प्रिय भोग माना जाता है.

(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)

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