रामपुर नवाब और हैदराबाद निजाम की किन करतूतों की अंग्रेजों ने बनाई थी सीक्रेट फाइल्स, जाते समय जला दी

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वैसे तो जब ब्रिटिश राज भारत में था, तो उसके हुक्मरानों ने भारत की तकरीबन सभी रियासतों, राजा-महाराजों, नवाब और हैदराबाद निजाम से जुड़ीं सीक्रेट फाइल्स बनवा रखी थीं. इनमें उनकी अय्याशियां, स्कैंडल्स, सेक्स गतिविधियां, फिजूलखर्चियां और जनता के पैसों को विदेशों में जमा करने जैसी बातों को रखा जाता था. ब्रिटिश राज के जासूस इन राजाओं की गुप्त जानकारियां लगातार इकट्ठा करते थे ताकि उन्हें काबू में रखा जा सके. इसमें हैदराबाद निजाम और रामपुर के नवाब के मामले तो कुछ ज्यादा ही चर्चाओं में थे, जिन्हें ब्रिटिश सरकार ने सीक्रेट फाइलों में रखा. हालांकि जब अंग्रेज भारत से जाने लगे तो उन्होंने बहुत सी फाइलें जला दीं.

भारत की आजादी के समय ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा रियासतों से जुड़ी गोपनीय फाइलों को जलाना इतिहास का एक बहुत ही विवादास्पद और महत्वपूर्ण हिस्सा है. इसे अक्सर “ऑपरेशन विदर” के नाम से भी जाना जाता है. इतिहासकार डोमिनिक लापियर और लैरी कॉलिन्स अपनी किताब ‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ में लिखते हैं कि अंग्रेजों ने हर रियासत की कम से कम पांच पीढ़ियों के घपले-घोटाले और स्कैंडल से जुड़े दस्तावेज जुटाए थे.

इन फाइलों में राजाओं की निजी जिंदगी, उनके राजनीतिक झुकाव और ब्रिटिश सरकार के साथ उनकी गुप्त संधियों की जानकारी थी. अंग्रेजों का तर्क था कि चूंकि यह रिश्ता ब्रिटिश क्राउन और राजाओं के बीच व्यक्तिगत था, इसलिए वे इस जानकारी को भारत की नई लोकतांत्रिक सरकार को सौंपकर राजाओं के साथ विश्वासघात नहीं करना चाहते थे.

क्या था इन फाइलों में 

इन फाइलों में कई राजाओं की कमजोरियों, उनके अवैध संबंधों, वित्तीय अनियमितताओं और उनके द्वारा किए गए दमन के सबूत थे. अंग्रेजों को डर था कि यदि ये फाइलें सरदार वल्लभभाई पटेल के हाथ लग गईं, तो भारत सरकार इन जानकारियों का इस्तेमाल राजाओं को डराने या उन्हें भारत में विलय के लिए मजबूर करने के लिए कर सकती है.

पटेल की नाराजगी से कुछ फाइलें जलने से बच गईं

हालांकि बाद में जब ये बात वल्लभभाई पटेल और उनके सचिव वी.पी. मेनन को पता चली तो वो बहुत नाराज हुए. इसकी वजह से भारत सरकार को कई राजाओं के पिछले रिकॉर्ड और उनकी संपत्तियों की सही जानकारी नहीं मिल सकी. पटेल के कड़े विरोध के बाद, कुछ फाइलों को जलने से बचाया जा सका या उन्हें वापस लंदन भेज दिया गया लेकिन एक बहुत बड़ा हिस्सा राख हो चुका था.

कैसी थी हैदराबाद निजाम की रंगीन जिंदगी

इन फाइलों में हैदराबाद निजाम मीर उस्मान अली खान के रसिक मिजाज से लेकर निजी जिंदगी के ऐसे किस्से थे, जो अगर सामने आते तो बहुत से विवाद भी उठकर खड़े हो सकते थे. दुनिया के सबसे अमीर आदमी होने के बावजूद निजाम की निजी जिंदगी बेहद अजीब और विवादों से भरी थी.

निजाम के हरम में सैकड़ों महिलाएं थीं, जिसमें से कई से उन्होंने निकाह किया और कई गैर-निकाह वाली थीं. कहा जाता है कि उनके 100 से भी ज्यादा बच्चे थे. ब्रिटिश फाइलों में इन बच्चों के उत्तराधिकार और उनके खर्चों को लेकर अक्सर चिंता जताई जाती थी.

निजाम सुंदर लड़कियों को महल में लाते थे

कई रिपोर्ट्स के अनुसार, निजाम अपनी रियासत की सुंदर लड़कियों को अपने महल में लाने के लिए दबाव बनाते थे. ब्रिटिश रेजिडेंट्स ने कई बार अपनी गुप्त रिपोर्ट्स में लिखा था कि निजाम का व्यवहार महिलाओं के प्रति काफी दमनकारी है.

एक तरफ उनके पास ‘जैकब डायमंड’ था, जो शुतुरमुर्ग के अंडे जितना बड़ा था, जिसे वो पेपरवेट की तरह इस्तेमाल करते थे तो दूसरी तरफ फटे-पुराने कपड़े पहनते थे. मेहमानों से सिगरेट मांगकर पीते थे. उनके इस व्यवहार को ब्रिटिश अधिकारी ‘मानसिक सनक’ मानते थे.

रामपुर के नवाब और कामुकता के चर्चे 

रामपुर के नवाब रज़ा अली खान और उनके पूर्ववर्ती अपनी विलासिता और ‘रंगीन मिजाजी’ के लिए बदनाम थे. रामपुर के नवाबों के बारे में कहा जाता था कि उनके दरबार में शराब और नृत्य की महफिलें कभी खत्म नहीं होती थीं. ब्रिटिश फाइलों में नवाबों के विदेशी डांसरों और अभिनेत्रियों के साथ संबंधों के कई किस्से दर्ज थे.

रामपुर के नवाबों को हथियारों का बहुत शौक था, लेकिन उनकी ‘कामुकता’ के चर्चे उससे भी ज्यादा थे. कहा जाता है कि रियासत के खजाने का एक बड़ा हिस्सा नवाब की निजी ऐय्याशियों और उनके ‘खास’ शौक पूरा करने में चला जाता था.

रामपुर में सत्ता के संघर्ष के पीछे अक्सर ‘अवैध संतानों’ का हाथ होता था. कई महिलाएं दावा करती थीं कि उनके बच्चे नवाब के हैं, जिससे राजमहल के भीतर गहरे स्कैंडल पैदा होते थे. अंग्रेजों को अक्सर इन पारिवारिक झगड़ों को सुलझाने के लिए दखल देना पड़ता था.

कुंवारी लड़कियों की नथ उतारने की शर्त

लेपियर ने अपनी किताब फ्रीडम एट मिडनाइट में लिखा, नवाब रामपुर ने अपने पड़ोस के रजवाड़ों से शर्त लगाई थी कि साल भर के अंदर कौन सबसे ज्यादा कुंवारी लड़कियों की नथ उतरेगा. इस शर्त को जीतने के लिए नवाब ने हर तरकीब अपनाई. अपने आदमियों को भेज कर गांव के गांव से कुंवारी लड़कियों को पकड़वा लिया और आसानी से शर्त जीत ली थी.

माउंटबेटन और कोरफील्ड ने नष्ट कीं फाइलें

वैसे कई मामलों में ब्रिटिश अफसर खुद राजाओं और नवाबों की पार्टियों और अय्याशियों का हिस्सा होते थे, इसलिए वे अपनी गर्दन भी बचाना चाहते थे. लॉर्ड माउंटबेटन और तत्कालीन पॉलिटिकल डिपार्टमेंट के प्रमुख कॉनराड कोरफील्ड को इन फाइलों को नष्ट करने का मुख्य सूत्रधार माना जाता है. कोरफील्ड तो नेहरू और पटेल के इतने खिलाफ थे कि उन्होंने फाइलों को जलाने का आदेश देने में जरा भी देरी नहीं की.

हालांकि जो फाइलें पटेल और नेहरू के कड़े विरोध के बाद बच गईं, वो फाइलें “सब्जेक्ट फाइल्स” और “पोलिटिकल फाइल्स” के नाम से हैं. ये फाइलें भारत के राष्ट्रीय अभिलेखागार, दिल्ली और द ब्रिटिश लाइब्रेरी लंदन में “इंडिया ऑफिस रिकॉर्ड्स” खंड में संग्रहित हैं. इन्हें सीधे देखा जा सकता है. द प्रिंसले इंडिया एंड द ब्रिटिश – पालिटिकल डेवलपमेंट एंड द आपरेशन ऑफ द क्राउन जैसी किताब में इन दस्तावेजों के बारे में काफी कुछ दिया गया है.

आमतौर पर अंग्रेज देश के उन शासकों की फाइलें खासतौर पर तैयार कराते थे, जिनके बारे में लगता था कि वो उनके विरोधी हैं और ब्रिटिश राज के खिलाफ विचार रखते हैं.

पटियाला महाराजा की स्कैंडल शीट

इन फाइलों में पटियाला के महाराजा भूपिंदर सिंह की “स्कैंडल शीट” भी थी. उनकी फाइल में उनके विलासितापूर्ण और अत्यधिक कामुक जीवन का विस्तार से ब्योरा दर्ज था. ब्रिटिश रेजिडेंट ने उनकी शराबखोरी, असंतोषजनक प्रशासन और यहां तक कि उनके “हरम” में महिलाओं की संख्या तक की रिपोर्ट की थी. एक रिपोर्ट में कहा गया था कि उनका महल “अनैतिकता का अड्डा” बन गया है.

इंदौर के महाराजा तुकोजीराव होल्कर तृतीय की 21 वर्षीय पत्नी महाराजी सिंधिया की रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गई. ब्रिटिश अधिकारियों ने तुरंत एक गोपनीय जांच शुरू की. फाइलों में संदेह जताया गया कि महाराजा का इसमें हाथ हो सकता है. उनके व्यक्तिगत जीवन के कई खुलासे दर्ज किए गए.

इस घटना ने ब्रिटिशों को महाराजा पर पूरा नियंत्रण दे दिया. उन पर मुकदमा चलाने की धमकी दी गई. उन्हें यूरोप में निर्वासित जीवन जीने के लिए मजबूर होना पड़ा. उनके बेटे को सिंहासन पर बैठाया गया.

कश्मीर महाराजा की सीक्रेट फाइल 

कश्मीर के महाराजा हरि सिंह को ब्रिटिश रिपोर्टों में अक्षम और अलोकप्रिय शासक बताया गया, ये दर्ज किया गया कि उनके राज्य में जनता असंतुष्ट है. 1931 के विद्रोह के बाद की रिपोर्टों में उनके प्रशासन की कठोर आलोचना की गई. उनकी छवि एक “खराब शासक” के रूप में बनाई गई, जिसने भारत में शामिल होने के उनके विलंब को और भी समस्याग्रस्त बना दिया.

इन किस्सों को विलियम डलरिम्पल की किताबों “द वाइट मुग़ल” और “द अनार्की” में पढ़ सकते हैं तो जॉन ज़ुब्राजिस्की की किताब “द लास्ट निज़ाम: द लाइफ एंड टाइम्स ऑफ़ मीर उस्मान अली खान” में पढ़ सकते हैं.

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