सरसों की फसल पर लाही का कहर, यह दवा है बेहद कारगर, इस समय करें छिड़काव, बंपर होगी पैदावार
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सरसों की खेती करने वाले किसानों के लिए लाही कीट एक गंभीर चुनौती बनकर उभरता है. यह कीट दिखने में भले ही छोटा और मुलायम होता है. इसका नुकसान बेहद बड़ा होता है. हरे, पीले या काले-भूरे रंग के ये कीट झुंड बनाकर पौधों पर हमला करते हैं

सरसों की खेती करने वाले किसानों के लिए लाही कीट एक गंभीर चुनौती बनकर उभरता है. यह कीट दिखने में भले ही छोटा और मुलायम होता है. इसका नुकसान बेहद बड़ा होता है. हरे, पीले या काले-भूरे रंग के ये कीट झुंड बनाकर पौधों पर हमला करते हैं. पंखयुक्त और पंखविहीन दोनों अवस्थाओं में पाए जाने वाले लाही का प्रकोप खासकर तब बढ़ जाता है जब मौसम में अधिक नमी, घूँघ जैसी स्थिति और कम तापमान रहता है. ऐसी परिस्थितियों में यदि किसान सतर्क न रहें तो पूरी फसल खतरे में पड़ सकती है.
लाही कीट का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इसके शिशु और वयस्क दोनों ही पौधों के कोमल भागों से रस चूसते हैं। पत्तियाँ, टहनियां, तना, पुष्पक्रम और फलियाँ इसके शिकार बनते हैं प्रभावित पौधों की पत्तियाँ मुड़ जाती हैं और धीरे-धीरे पीली पड़ने लगती हैं. जब पुष्पक्रम पर लाही का अधिक प्रकोप होता है तो फलियां बनना बंद हो जाती हैं या फिर उनमें दाने सिकुड़ जाते हैं। इससे न केवल पैदावार घटती है, बल्कि फसल की गुणवत्ता पर भी असर पड़ता है.
लाही के प्रकोप से सरसों की उपज में आती है कमी
लाही द्वारा स्रावित मधुरस पर काली फफूंद विकसित हो जाती है, जिसे किसान आमतौर पर पत्तियों पर काली परत के रूप में देखते हैं.यह फफूंद पौधों में प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया को बाधित कर देती है, जिससे पौधे कमजोर हो जाते हैं. विशेषज्ञों के अनुसार यदि समय रहते नियंत्रण नहीं किया जाए तो लाही के प्रकोप से सरसों की उपज में 20 से 50 प्रतिशत तक की भारी कमी आ सकती है.यही कारण है कि इस कीट की समय पर पहचान और प्रबंधन बेहद जरूरी है.लाही से बचाव के लिए किसानों को समन्वित कीट प्रबंधन अपनाना चाहिए. समय पर बुवाई, संतुलित उर्वरकों का प्रयोग और नाइट्रोजन की अधिकता से बचाव इसके शुरुआती उपाय हैं. खेत में पक्षियों के बैठने के लिए T-आकार के खंभे लगाना और लेडीबर्ड बीटल व क्राइसोपर्ला जैसे मित्र कीटों का संरक्षण भी कारगर साबित होता है. प्रारंभिक अवस्था में नीम आधारित कीटनाशी (Azadirachtin 1500 ppm) का छिड़काव लाभकारी है. अधिक प्रकोप की स्थिति में इमिडाक्लोप्रिड, एसिटामिप्रिड या थायोमेथोक्साम जैसे अनुशंसित कीटनाशकों का सही मात्रा में उपयोग कर किसान अपनी सरसों की फसल को सुरक्षित रख सकते हैं.