26 जनवरी 1950: विदेशी घोड़ों ने खींची बग्घी, 31 तोपों की हुई सलामी, जानिए कैसा था पहले गणतंत्र का नजारा | January 26 1950 first president Carriages pulled by foreign horses 31-gun salute know what happened in first Republic Day
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24 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान को अंतिम रूप देने के बाद भारत के पहले राष्ट्रपति का चुनाव पूरा कर लिया गया था. इसके बाद, अब बारी थी उस सपने के पूरा होंगे की, जिसका इंतजार पूरा देश दशकों से कर रहा था. 25 जनवरी 1950 की सुबह से लेकर 26 जनवरी 1950 की देर शाम तक देश की राजधानी दिल्ली में क्या-क्या खास हुआ और कैसा था हमारा पहला गणतंत्र दिवस समारोह, आइए सबकुछ जानें…
25 जनवरी को कोई बड़ा संवैधानिक कार्यक्रम तो नहीं था, लेकिन उस दिन दिल्ली की हलचल किसी त्योहार से कम नहीं थी. गवर्नमेंट हाउस (मौजूदा राष्ट्रपति भवन) के दरबार हॉल को किसी दुल्हन के लिए सजाया गया था. वहीं, देश के पहले राष्ट्रपति को सलामी देने के लिए 21 नहीं, बल्कि 31 तोपों को तैनात किया गया था. सेना के मुख्यालय में रिहर्सल का दौर लगातार जारी था. घुड़सवार राष्ट्रपति बॉडीगार्ड, पैदल टुकड़ियां, बैंड, तोपखाने को कब क्या करना है, यह सबकुछ सेकंड के हिसाब से तय किया जा रहा था. दोपहर की परेड के लिए एक-एक कदम नापा जा रहा था. इस तरह देश के पहले गणतंत्र दिवस की तैयारियों में 25 जनवरी 1950 का दिन गुजर गया.
प्रथम राष्ट्रपति की बग्घी काे खींचने के लिए ऑस्ट्रेलियाई घोड़े लाए गए थे.
26 जनवरी 1950 की वह तारीख जब भारत को मिली पूरी आजादी
- तारीख: 25 जनवरी 1950, दिन: गुरुवार, कड़ाके की ठंड के बीच गवर्नमेंट हाउस के दरबार हॉल में मेहमानों की आवाजाही शुरू हो चुकी थी. मंत्री, जज, विदेशी मेहमान, सेना के बड़े अधिकारी सब अपनी-अपनी जगह पर आकर बैठ चुके थे.
- सुबह ठीक 10 बजकर 18 मिनट पर वह ऐलान हुआ, जिसका इंतजार सदियों से था. भारत को आधिकारिक रूप से ‘सॉवरेन डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ इंडिया’ घोषित कर दिया गया.
- छह मिनट बाद 10 बजकर 24 मिनट पर डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भारत के पहले राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली. तत्कालीन गवर्नर जनरल सी. राजगोपालाचारी ने पहले घोषणा पढ़ी और फिर शपथ दिलवाई.
- शपथ पूरी होते ही आसमान तोपों की सलामी से गूंज उठा. एक-एक कर 31 तोपों की सलामी दी गई. यह सिर्फ सलामी नहीं थी, यह दुनिया को संदेश था कि भारत अब अपने फैसले खुद करेगा.
- डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने पहले हिंदी में, और फिर अंग्रेज़ी में छोटा सा भाषण दिया. उन्होंने देश की एकता, विविधता और लोकतंत्र की बात की. 10:35 बजे के आसपास यह समारोह खत्म हो गया.
- दोपहर ठीक 2 बजकर 30 मिनट पर गवर्नमेंट हाउस के फोरकोर्ट में हलचल एक बार फिर बढ़ गई. एक खास स्टेट कोच तैयार था. करीब 35 साल पुराने इस बग्धी को नए गणराज्य के लिए नए सिरे से सजाया गया. आज उस पर पहली बार भारत का राष्ट्रीय प्रतीक ‘अशोक स्तंभ’ उस पर चमक रहा था.
- छह ऑस्ट्रेलियाई घोड़े उसे खींचने के लिए तैयार थे. साथ में राष्ट्रपति बॉडीगार्ड की घुड़सवार टुकड़ी भी थी. जैसे ही कोच आगे बढ़ा, सड़क के दोनों ओर खड़ी भीड़ ने नारे लगाना शुरू करि दया. लोग पेड़ों पर चढ़े हुए थे, छतों से झांक रहे थे. हर कोई आजाद भारत की ताकत और अपने पहले राष्ट्रपति देख रहा था.
- पहले गणतंत्र दिवस समारोह की परेड राष्ट्रपति भवन से शुरू होकर संसद भवन के पास से गुजरा. फिर संसद मार्ग, आउटर कनॉट सर्कल, बाराखंभा रोड से होते हुए काफिला भगवंदास रोड की तरफ मुड़ गया. करीब सवा घंटे की यात्रा के बाद दोपहर करीब 3 बजकर 45 मिनट पर राष्ट्रपति का काफिला इरविन स्टेडियम पहुंचा, जिसे आज नेशनल स्टेडियम के नाम से जाना जाता है.
नेशनल स्टेडियम में आयोजित पहले गणतंत्र दिवस समारोह के दौरान परेड से सलामी लेते प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद.
इरविन स्टेडियम में उमड़ पड़ा था लोगों का हुजूम
देश के पहले गणतंत्र दिवस पर स्टेडियम के अंदर का दृश्य अविस्मरणीय था. हजारों लोग खड़े हो गए. राष्ट्रपति ने हाथ जोड़कर अभिवादन किया. गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया. सात मास्ड बैंड देशभक्ति धुनें बजा रहे थे. फिर शुरू हुई सैन्य परेड. थलसेना, नौसेना और वायुसेना की तीनों की टुकड़ियां अनुशासित कदमों के साथ सलामी देते हुए मंच के सामने गुजरीं. समारोह के दौरान सबसे रोमांचक पल आया ‘फ्यू द जोआ’ का था. ‘फ्यू द जोआ’ के दौरान बंदूकों की पिकली आग, फायरिंग की गूंज, बैंड की धुन और लोगों की तालियां ने स्टेडियम में अलग ही माहौल बना दिया.
तब के राजपथ और आज के कर्यव्य पथ से गुजरती पहले गणतंत्र दिवस की परेड़.
1947-48 युद्ध के शूरमाओं को दिया गया सम्मान
भारत के पहले गणतंत्र दिवस समारोह के दौरान मुख्य अतिथि के तौर पर इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो मौजूद थे. उनकी मौजूदगी में 1947-48 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में बहादुरी की अद्भुत प्रदर्शन करने वाले शूरमाओं को सम्मानित किया गया. समारोह के दौरान पहली बार, परमवीर चक्र, महावीर चक्र, वीर चक्र सहित अन्य पदकों से भारतीय सेना के बहादुरों को सम्मानित किया गया.
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Anoop Kumar Mishra is associated with News18 Digital for the last 6 years and is working on the post of Assistant Editor. He writes on Health, aviation and Defence sector. He also covers development related to …और पढ़ें