SIR: सबूतों की बारूद नहीं जुटा पाया विपक्ष, कैसे हर ‘हाइड्रोजन बम’ फुस्स निकला!

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नौ राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूचियों को दुरुस्त करने के लिए 27 अक्टूबर 2025 से शुरू हुए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) का दूसरा चरण भी खत्म हो गया है. इस मुहिम के तहत करीब 6.59 करोड़ मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से हट गए हैं. यह इन 12 प्रांतों के कुल मतदाताओं का करीब 12.93 फीसदी है. यानी हर 100 वोटर्स पर करीब 13 नाम कट गए. हालांकि हटाए गए नामों को दावे-आपत्तियां पेश करने का मौका दिया गया है और उम्मीद है कि इनमें से कुछ नाम वापस सूचियों में शामिल हो जाएंगे.

सैद्धांतिक तौर पर देखें तो यह विशुद्ध प्रशासनिक मुहिम है, लेकिन हमारे यहां प्रशासनिक कार्य भी राजनीति से मुक्त नहीं रह पाते हैं. मंशाओं पर सवाल उठाए जाते हैं और आरोप-प्रत्यारोप के खेल भी शुरू हो जाते हैं. एसआईआर भी कोई अपवाद नहीं रहा है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसे वोट चोरी और फर्जी वोटिंग के आरोपों के साथ नत्थी करते हुए यह आरोप भी जड़ दिया कि चुनाव आयोग सत्तारूढ़ गठबंधन के दबाव में अनेक मतदाताओं को मताधिकार के उनके वाजिब हक से वंचित कर रहा है. वे बार-बार ‘हाइड्रोजन बम’ फोड़ने की धमकी देते रहे.

राहुल को किस बात की थी जल्दबाजी?
यह सवाल अक्सर उठा है कि अपने इन आरोपों के समर्थन में राहुल गांधी या अन्य विपक्षी नेताओं के पास क्या कोई पुख्ता प्रमाण हैं? जब राहुल गांधी ने हरियाणा के एक कस्बे में एक ही घर पर 501 मतदाता होने पर सवाल उठाते हुए फर्जी वोटर लिस्ट का दावा किया तो कई मीडिया समूहों ने अपने तई पड़ताल की. इसमें पाया गया कि राहुल गांधी ने जिस मकान का जिक्र किया था, वह कोई एक घर नहीं है, बल्कि अनेक छोटे-छोटे मकानों का समूह है, जिनका नंबर एक ही है. इस पर गृह मंत्री अमित शाह ने भी लोकसभा में राहुल की हंसी उड़ाने में देर नहीं की. आखिर राहुल को किस बात की जल्दबाजी थी? आरोप लगाने से पहले वे कांग्रेस की एक टीम भेजकर मामले की जांच नहीं करवा सकते थे? एक राष्ट्रीय पार्टी के लिए तो यह बहुत छोटा-सा काम था. लेेकिन बगैर जांच-पड़ताल या प्रमाण के केवल ऐसे आरोप लगाने भर से न केवल स्वयं की, बल्कि पूरे विपक्ष की विश्वसनीयता कम होती है.

राजद भी कांग्रेस जैसी ही निकली
यह तो केवल एक उदाहरण है. यह बताता है कि हमारे राजनीतिक दल मेहनत से बचते हैं. बिहार में भी हमने देखा कि आरजेडी जैसी बड़ी पार्टियां, जिसका बड़ा जनाधार भी रहा है, ने भी मतदाता पुनरीक्षण सूचियों वाले मामले में जमीनी स्तर पर कुछ भी नहीं किया. उसने बड़ी-बड़ी रैलियां कीं और उनमें 60 लाख वोटरों के नाम कटने के दावे किए, लेकिन वार्ड और बूथ लेवल पर ऐसे वोटरों की पहचान करने की कोई मशक्कत नहीं की. 60 लाख तो छोड़िए, वे ऐसे पांच हजार लोग भी प्रस्तुत नहीं कर पाए, जिनसे वोट देने का हक छीन लिया गया.

विपक्ष के पास केवल बातें, स्पष्ट प्रमाण नहीं
कांग्रेस ने भी बिहार चुनावों से पहले वोट अधिकार यात्रा निकाली. एक अनुमान के मुताबिक इस पर 89 करोड़ रुपए खर्च हुए. इस अधिकार यात्रा का मकसद मतदाता सूचियों में कथित हेराफेरी को उजागर करना और प्रत्येक नागरिक के मताधिकार की रक्षा करना था. लेकिन इससे कोई राजनीतिक फायदा नहीं हुआ. फायदा तब होता, जब जमीन पर काम होता. किस विधानसभा क्षेत्र या गांव के किस बूथ के वोटर को वोट देने के अधिकार से वंचित किया गया, अगर पार्टी मय सबूत के यह तथ्य सामने लाती तब लोगों को भी एहसास होता कि मसला वाकई गंभीर है और उन्हें जानबूझकर उनके मताधिकार से वंचित किया जा रहा है.

कांग्रेस और राजद ही नहीं, जिन नौ राज्यों व तीन केंद्रशासित प्रदेशों में मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण का काम हुआ है, वहां इंडिया गठबंधन के अन्य दलों जैसे समाजवार्टी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस ने भी कोरी लफ्फाजी की, आरोप लगाए, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई प्रयास नहीं किए. न उन्होंने ऐसी कोई कमेटियां बनाईं, जो नीचे तक जाकर उन लोगों को चिह्नित करतीं और उन्हें जनता के सामने लातीं, जिनसे वास्तव में मत देने का संवैधानिक अधिकार छीन लिया गया. क्योंकि सबूतों के आधार पर ही कहा जा सकता है कि एसआईआर की पूरी प्रक्रिया में ही खामी है और इसकी कुमंशा केवल उन जायज मतदाताओं को उनके हक से वंचित करना है, जो सत्तारूढ़ गठबंधन की निगाह में उसके मतदाता नहीं हैं. केवल आरोप लगाने से जनता प्रभावित नहीं होती, क्योंकि एसआईआर के पक्ष में भी निर्वाचन आयोग लगातार दलीलें दे रहा है कि इसका मकसद डुप्लीकेट, स्थानांतरित और मृतक वोटों के नामों को फिल्टर करना है. इससे आम लोगों को तो यही लगता है कि चुनाव आयोग ठीक काम कर रहा है और विपक्ष चुनावी हार के लिए सिर्फ बहानों की तलाश में लगा है.

चुनाव प्रबंधन साल भर चलने वाला काम
कांग्रेस इस हकीकत को समझ नहीं पा रही है कि चुनाव प्रबंधन केवल चुनाव के दौरान 15-20 दिनों का काम नहीं होता है, बल्कि इसे पूरे पांच साल तक करना होता है और तभी नतीजे आपके पक्ष में आते हैं. भाजपा और कांग्रेस व अन्य विपक्षी दलों के बीच शायद यही सबसे बड़ा अंतर है. कांग्रेस के साथ तो और भी विडंबनाएं जुड़ी हुई हैं. इसमें कोई दो राय नहीं है कि तमाम दिक्कतों के बावजूद कांग्रेस के पास अच्छा-खासा पैसा है. माना जाता है कि 2024 के चुनावों में उसने करीब 700-800 करोड़ रुपए खर्च किए थे. लेकिन समस्या यह है कि विगत कुछ वर्षों से उसने चुनाव प्रबंधन का काम एजेंसियों के हवाले कर रखा है, जिन पर खूब पैसा भी लुटाया जाता है. कांग्रेस जैसी सबसे पुरानी पार्टी के लिए क्या यह बेहतर नहीं होगा कि वो खुद यह काम करे.

हमारे देश में ऐसी युवा प्रतिभाओं की कमी नहीं है, जो राजनीति से जुड़ना चाहती हैं. इनमें वकील, पत्रकार, आईटी सेक्टर के प्रोफेशनल्स जैसे अनेक युवा आकांक्षी हैं. अगर राजनीतिक दल उन्हें आकर्षक वेतन-भत्तों पर चुनाव प्रबंधन के काम में रखें तो यह एक अच्छा प्रयोग होगा. ऐसे लोग जमीनी स्तर पर काम करके दलों के लिए डेटा और इनसाइट जुटा सकेंगे. विपक्ष को इसी से भाजपा की काट भी मिल पाएगी. अन्यथा चुनाव-दर-चुनाव पराजय के लिए सिर्फ बहानेबाजी चलती रहेगी.

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