India China Relation | India China News | चीनी कंपनियों के लिए खुलेंगे सरकारी ठेकों के द्वार, क्या प्लान कर रही भारत सरकार?
India China Relation: दुनिया ने अब तक भारत और चीन की दुश्मनी देखी है. अब असल में हिंदी-चीनी भाई-भाई की झलक देखेगी. सीमा पर तनाव कमते ही चीन से दुश्मनी अब खत्म होने लगी है. दोनों देशों के बीच अब दोस्ती की नई शुरुआत हो चुकी है. भारत और चीन ने तल्ख रिश्ते को भूलकर अपने कदम आगे बढ़ा दिए हैं. अमेरिका के ट्रंप टैरिफ के बीच भारत और चीन के रिश्तों पर जमी बर्फ अब पिघलने लगी है. यही कारण है कि भारत और चीन अपने कारोबार को नई ऊंचाइयों पर ले जाना चाहते हैं. जी हां, अब चीनी कंपनियों के लिए भारत में सरकारी ठेकों के दरवाजे खुल सकते हैं. भारत सरकार का वित्त मंत्रालय इस प्लान पर काम कर रहा है.
दरअसल, भारत का वित्त मंत्रालय सरकारी कॉन्ट्रैक्ट के लिए बोली लगाने वाली चीनी कंपनियों पर पांच साल पुरानी पाबंदियों को खत्म करने की योजना बना रहा है. माना जा रहा है कि नई दिल्ली सीमा पर कम हुए तनाव के माहौल में कमर्शियल संबंधों को फिर से शुरू करना चाहता है. ऐसे में अब इन चीनी कंपनियों को भारत में सरकारी ठेकों में हिस्सा लेने का मौका मिलेगा.
चीनी कंपनियों के लिए खुलेंगे भारत में दरवाजे
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, भारतीय वित्त मंत्रालय चीनी कंपनियों के लिए सरकारी ठेकों के दरवाजे फिर से खोलने पर विचार कर रहा है. दो सरकारी सूत्रों ने यह जानकारी दी है. सीमा पर तनाव कम होने से दोनों देशों के संबंध बेहतर हो रहे हैं. इससे दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्ते मजबूत होंगे.
किस नियम से चीनी कंपनियों को हटाया गया?
चीनी कंपनियों पर भारत में ठेकों के लिए ये प्रतिबंध 2020 में लगाए गए थे. उस समय भारत और चीन की सेनाओं में गलवान में झड़प हुई थी. इसमें दोनों ओर के कई सैनिक शहीद हुए थे. पहले चीनी कंपनियों को सरकारी ठेकों के लिए रजिस्ट्रेशन कराना पड़ता था. उन्हें राजनीतिक और सुरक्षा मंजूरी भी लेनी होती थी. इन उपायों ने प्रभावी रूप से चीनी कंपनियों को भारतीय सरकारी कॉन्ट्रैक्ट के लिए प्रतिस्पर्धा करने से रोक दिया था. इन नियमों से चीनी कंपनियां सरकारी ठेकों से बाहर रह गईं. सरकारी ठेकों का मूल्य 700 से 750 अरब डॉलर का अनुमान था. चीनी कंपनियां इनमें हिस्सा नहीं ले पाईं. अब वित्त मंत्रालय रजिस्ट्रेशन की जरूरत को हटाने पर काम कर रहा है.
कौन लेगा फाइनल फैसला?
सूत्रों ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कार्यालय ही इस पर अंतिम फैसला लेगा. बहरहाल, वित्त मंत्रालय और पीएमओ ने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की है. समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने सबसे पहले इस खबर को रिपोर्ट किया है. सूत्रों का कहना है कि इन प्रतिबंधों से भारत को नुकसान हुआ है. कई सरकारी विभागों में कमी और देरी हुई है. उदाहरण के लिए 2020 के बाद चीन की सरकारी कंपनी सीआरआरसी को एक ट्रेन बनाने के 216 मिलियन डॉलर के ठेके से बाहर कर दिया गया. अन्य विभागों ने भी चीनी कंपनियों से प्रतिबंध हटाने की मांग की है. कारण कि इससे प्रोजेक्ट समय पर पूरे नहीं हो पाए.
क्यों आई यह नौबत?
पूर्व कैबिनेट सचिव राजीव गौबा की अध्यक्षता वाली एक उच्च-स्तरीय समिति ने भी पाबंदियों में ढील देने की सिफारिश की है. राजीव गौबा एक प्रमुख सरकारी थिंक टैंक के सदस्य हैं. ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की ओर से पाबंदियां लगाने के तुरंत बाद चीनी बोली लगाने वालों को दिए गए नए प्रोजेक्ट का मूल्य एक साल पहले की तुलना में 27% गिरकर 2021 में $1.67 बिलियन हो गया. खास तौर पर पावर सेक्टर के लिए चीन से इक्विपमेंट के इंपोर्ट पर रोक ने अगले दशक में भारत की थर्मल पावर कैपेसिटी को लगभग 307 GW तक बढ़ाने की योजनाओं में रुकावट डाली है.
ट्रंप टैरिफ का काट?
सूत्रों की मानें तो यह बदलाव अमेरिकी टैरिफ से भी जुड़ा है. पिछले साल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय सामानों पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया. इससे भारत को नुकसान हुआ. ट्रंप ने पाकिस्तान से भी संबंध सुधारे. ऐसे में भारत ने चीन से रिश्ते बेहतर करने का रास्ता चुना. पीएम मोदी ने सात साल बाद चीन का दौरा किया. उन्होंने गहरे व्यापारिक संबंध बनाने पर सहमति जताई. इस दौरे के बाद दोनों देशों में सीधी उड़ानें शुरू हुईं. भारत ने चीनी पेशेवरों के लिए बिजनेस वीजा की प्रक्रिया आसान की. बहरहाल, अभी चीनी कंपनियों से विदेशी प्रत्यक्ष निवेश पर प्रतिबंध अभी बने रहेंगे.