सर्दियों में गरमा-गरम कोटा की कचोरी: परंपरा, स्वाद और भरोसे का लाजवाब मज़ा, लोगों की पहली पसंद!
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सर्दियों में कोटा की गलियों में गरमा-गरम कचोरी की खुशबू लोगों को सुबह-सवेरे ही अपनी ओर खींच लेती है. नरसिंह कचोरी एवं नमकीन भंडार में मूंग दाल की कचोरी, हरी और मीठी चटनी के साथ, पारंपरिक मसालों और खास स्वाद के कारण हर उम्र के लोगों की पहली पसंद बन चुकी है. यह सिर्फ नाश्ता नहीं, बल्कि शहर की पारंपरिक खाद्य संस्कृति और भरोसे का प्रतीक भी है.
कोटा. शहर में सर्दी का असर बढ़ते ही खान-पान के बाजार में भी रौनक लौट आई है, ठंड के मौसम में गरमा-गरम खाने की चीजों की मांग स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है, और ऐसे में कचोरी, समोसे, जलेबी और नमकीन लोगों की पहली पसंद बन गई हैं. सुबह होते ही लोग घरों से निकलकर कचोरी की दुकानों पर पहुंच रहे हैं और दिन की शुरुआत स्वादिष्ट नाश्ते के साथ कर रहे हैं. कोटा की कचोरी पहले से ही अपने खास स्वाद और गुणवत्ता के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध रही है. यहां बनने वाली मूंग दाल की कचोरी का स्वाद अन्य जगहों से अलग माना जाता है, कचोरी बनाने में खड़े मसालों का उपयोग किया जाता है, जिन्हें बारीकी से काटकर पारंपरिक तरीके से तैयार किया जाता है.
यही वजह है कि कोटा की कचोरी का स्वाद लोगों को बार-बार अपनी ओर आकर्षित करता है. शहर के कुन्हाड़ी क्षेत्र में प्रताप चौक स्थित नरसिंह कचोरी एवं नमकीन भंडार इन दिनों कचोरी का प्रमुख ठिकाना बन गया है. सुबह-सुबह यहां सैकड़ों की संख्या में लोग कचोरी खाने पहुंचते हैं. दुकान के बाहर खड़ी भीड़ इस बात का प्रमाण है कि सर्दी के मौसम में यहां की कचोरी लोगों के बीच कितनी लोकप्रिय हो चुकी है. स्थानीय लोगों के साथ-साथ दूर-दराज से आने वाले ग्राहक भी यहां स्वाद लेने आते हैं.
ठंड के मौसम में गर्म और ताजा खाना शरीर के लिए फायदेमंद
ग्राहकों का कहना है कि ठंड के मौसम में गर्म और ताजा खाना शरीर के लिए फायदेमंद होता है. बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी को गरमा-गरम कचोरी पसंद है, परिवार के साथ लोग सुबह नाश्ते के लिए कचोरी लेने पहुंचते हैं. कई लोग तो खासतौर पर सिर्फ कचोरी खाने के लिए आते हैं. नरसिंह कचोरी एवं नमकीन भंडार के संचालक गोपाल दाधीच ने बताया कि सर्दियों में कचोरी, समोसे और दूध-जलेबी की मांग सामान्य दिनों की तुलना में काफी बढ़ जाती है. उन्होंने बताया कि उनका यह व्यवसाय पैतृक है, जिसकी शुरुआत वर्ष 1971 में हुई थी. पहले परिवार द्वारा रेस्टोरेंट का संचालन किया जाता था, बाद में सरोवर पार्किंग क्षेत्र में कचोरी की दुकान शुरू की गई.
समय के साथ ग्राहकों के भरोसे और प्यार के कारण व्यवसाय का विस्तार हुआ, और इसके बाद प्रताप चौक, कुन्हाड़ी में दूसरी दुकान शुरू की गई. आज यह दुकान शहर में अपनी एक अलग पहचान बना चुकी है. गोपाल दाधीच का कहना है कि वर्षों से लोगों का जो विश्वास उन्हें मिला है, उसी कारण आज उनका व्यवसाय लगातार आगे बढ़ रहा है. उन्होंने बताया कि कोटा की कचोरी का स्वाद चंबल के पानी की वजह से और भी खास हो जाता है. इसके साथ ही यहां परोसी जाने वाली हरी चटनी और मीठी चटनी का स्वाद भी अन्य जगहों से अलग है, जो कचोरी के स्वाद को दोगुना कर देता है। यही वजह है कि लोग एक बार यहां कचोरी खाने के बाद बार-बार आते हैं.
सर्दी के मौसम में कचोरी और नमकीन का कारोबार काफी बढ़ जाता है, जिससे छोटे व्यापारियों को भी अच्छा लाभ मिलता है. इससे न केवल रोजगार के अवसर बढ़ते हैं, बल्कि शहर की पारंपरिक खाद्य संस्कृति को भी बढ़ावा मिलता है. कुल मिलाकर कहा जाए तो बढ़ती सर्दी के साथ कोटा की कचोरी एक बार फिर चर्चा में है. खासतौर पर कचोरी एवं नमकीन का स्वाद, परंपरा और भरोसे का प्रतीक बनकर लोगों की पसंद बनी हुई है. ठंड के इस मौसम में गरमा-गरम कचोरी का स्वाद लेने के लिए लोगों की भीड़ लगातार बढ़ती जा रही है, और आने वाले दिनों में यह रुझान और तेज होने की उम्मीद है.
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