‘इसकी उम्मीद नहीं थी’ केरल CM पिनाराई विजयन पर क्यों भड़के सिद्धारमैया, लेफ्ट सरकार को खूब सुनाई खरी-खोटी
न्यूज18 कन्नड़
बेंगलुरु: कर्नाटक और केरल के बीच भाषा को लेकर एक बार फिर सियासी तनाव गहराता दिख रहा है. केरल सरकार के प्रस्तावित भाषा विधेयक ने कर्नाटक की राजनीति में हलचल मचा दी है. इस विधेयक के तहत केरल के कन्नड़ माध्यम के स्कूलों में मलयालम को पहली भाषा के तौर पर अनिवार्य करने का प्रावधान है. इसी मुद्दे पर कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया खुलकर केरल की लेफ्ट सरकार पर बरस पड़े हैं.
सिद्धारमैया ने न सिर्फ इस प्रस्ताव पर आपत्ति जताई, बल्कि केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन से विधेयक को तुरंत वापस लेने की मांग भी कर डाली. उन्होंने साफ कहा कि लेफ्ट सरकार से इस तरह के कदम की उम्मीद नहीं थी और यह भाषाई अल्पसंख्यकों के मौलिक अधिकारों पर सीधा हमला है.
क्या है पूरा मामला?
केरल सरकार ने एक प्रस्तावित भाषा विधेयक लाया है. इसके तहत राज्य के कन्नड़ माध्यम के स्कूलों में मलयालम को पहली भाषा के रूप में पढ़ाना अनिवार्य किया जाएगा. इस फैसले का सीधा असर केरल के सीमावर्ती जिले कासरगोड में रहने वाले कन्नड़ भाषी छात्रों पर पड़ने वाला है, जहां बड़ी आबादी कन्नड़ भाषा और संस्कृति से जुड़ी हुई है.
सिद्धारमैया क्यों हुए नाराज?
कासरगोड को लेकर क्या बोले मुख्यमंत्री?
सिद्धारमैया ने कासरगोड को भावनात्मक रूप से कर्नाटक से जुड़ा हुआ बताया. उन्होंने कहा कि भले ही कासरगोड प्रशासनिक रूप से केरल का हिस्सा हो, लेकिन वहां के लोग कन्नड़ भाषा, संस्कृति और साहित्य से गहराई से जुड़े हैं. उनका कहना था कि कासरगोड के लोग कर्नाटक के कन्नड़वासियों से कम नहीं हैं और उनके हितों की रक्षा करना कर्नाटक सरकार की जिम्मेदारी है.
मातृभाषा पर जोर क्यों?
मुख्यमंत्री ने जोर देते हुए कहा कि मातृभाषा सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि पहचान का आधार होती है. वैज्ञानिक रूप से यह साबित हो चुका है कि बच्चे अपनी मातृभाषा में बेहतर और तेजी से सीखते हैं. उन्होंने कहा कि कासरगोड में कई पीढ़ियों से छात्र कन्नड़ माध्यम में पढ़ते आ रहे हैं और वहां के करीब 70 प्रतिशत छात्र कन्नड़ भाषा में ही शिक्षा चाहते हैं.
संविधान का हवाला क्यों दिया गया?
सिद्धारमैया ने अपने बयान में संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 का हवाला दिया, जो नागरिकों को उनकी भाषा, लिपि और संस्कृति की रक्षा का अधिकार देते हैं. इसके अलावा अनुच्छेद 350(क) प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की गारंटी देता है, जबकि 350(ख) अल्पसंख्यकों के संरक्षण की बात करता है.
क्या यह किसी भाषा के खिलाफ है?
मुख्यमंत्री ने साफ किया कि यह विरोध मलयालम भाषा के खिलाफ नहीं है. उन्होंने कहा कि जैसे कर्नाटक में कन्नड़ भाषा का संरक्षण किया जाता है, वैसे ही केरल सरकार को भी मलयालम भाषा के विकास का पूरा अधिकार है. लेकिन किसी एक भाषा को दूसरी भाषा पर थोपना उचित नहीं है.
आगे क्या चेतावनी दी?
सिद्धारमैया ने चेताया कि अगर केरल सरकार इस विधेयक को लागू करती है, तो कन्नड़ भाषी लोग एकजुट होकर इसका विरोध करेंगे. उन्होंने भरोसा दिलाया कि कर्नाटक सरकार कासरगोड के कन्नड़ भाषी लोगों के साथ खड़ी है और उनकी भाषाई स्वतंत्रता की रक्षा के लिए हर संभव कदम उठाएगी.