दोस्ती, दगा और फिर खून… बेल्लारी में रेड्डी बनाम रेड्डी की अदावत, जो था कभी ‘दाहिना हाथ’, अब उसका बेटा बना काल-reddy brothers vs reddy rivalry-ballari relationship-business-mines-partner-history dispute-shooting-bellary-politics crime story
कहानी एक राजनेता की दोस्ती, दगा और अदावत की:-
कर्नाटक का बेल्लारी जिला, जिसे कभी ‘रेड्डी ब्रदर्स का गणराज्य’ कहा जाता था. एक बार फिर से अपनी पुरानी पहचान की ओर लौटता दिख रहा है. कर्नाटक की राजनीति में 1 जनवरी 2026 को नए साल के जश्न के बीच हुई फायरिंग की घटना और एक कार्यकर्ता की मौत ने एक नए विवाद को जन्म दिया है. इस विवाद के केंद्र में दो नाम हैं. एक हैं ‘माइनिंग किंग’ के नाम से मशहूर गली जनार्दन रेड्डी और दूसरे हैं बेल्लारी सिटी के युवा कांग्रेस विधायक नारा भरत रेड्डी. गला जनार्दन रेड्डी जहां बीजेपी विधायक हैं वही भरत रेड्डी कांग्रेस के विधायक हैं. नए साल के जश्न में बल्लारी में जो शूटिंग की घटना हुई थी, उससे दोनों की अदावत फिर सामने आ गई है. असल में यह दो राजनेताओं के बीच की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह उस भरोसे के टूटने की कहानी है, जिसके बल पर कभी रेड्डी ब्रदर्स बेल्लारी में राज करते थे.
कौन है रैड्डी ब्रदर्स से दुश्मनी करने वाला नारा भरत रेड्डी?
35 वर्षीय नारा भरत रेड्डी वर्तमान में बल्लारी सिटी विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के विधायक हैं. साल 2023 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने एक ऐसी जीत दर्ज की, जिसने जनार्दन रेड्डी के राजनीतिक दबदबे को हिला कर रख दिया. भरत रेड्डी ने जनार्दन रेड्डी की पत्नी अरुणा लक्ष्मी को भारी मतों के अंतर से हराया था. पेशे से व्यवसायी और कृषि क्षेत्र से जुड़े भरत रेड्डी, कांग्रेस के दिग्गज नेता और ग्रेनाइट कारोबारी नारा सूर्यनारायण रेड्डी के बेटे हैं. भरत रेड्डी ने अपनी राजनीति की शुरुआत स्थानीय स्तर पर की थी, लेकिन उनकी असली पहचान जनार्दन रेड्डी के खिलाफ एक मजबूत विकल्प के रूप में बनी.
जनार्दन रेड्डी और भरत रेड्डी का पारिवारिक नाता
भरत रेड्डी और जनार्दन रेड्डी के बीच कोई खून का रिश्ता नहीं है, लेकिन उनके परिवारों का संबंध किसी सगे रिश्तेदारी से कम नहीं था. भरत रेड्डी के पिता, नारा सूर्यनारायण रेड्डी, गली जनार्दन रेड्डी के सबसे पुराने और भरोसेमंद सहयोगियों में से एक थे. 1990 के दशक के उत्तरार्ध और 2000 के शुरुआती दशक में जब जनार्दन रेड्डी बेल्लारी में अपने माइनिंग साम्राज्य की नींव रख रहे थे, तब सूर्यनारायण रेड्डी उनके ‘दाहिने हाथ’ माने जाते थे. दोनों परिवारों ने मिलकर न केवल माइनिंग के व्यवसाय में अरबों रुपये कमाए, बल्कि राजनीति में भी एक-दूसरे का साथ दिया.
दोस्ती में दरार और साम्राज्य का बिखराव
सूर्यनारायण रेड्डी खुद जेडीएस (JDS) के विधायक रह चुके थे और उन्होंने जनार्दन रेड्डी को जिले की राजनीति में स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई थी. उस दौर में बल्लारी में यह कहावत मशहूर थी कि रेड्डी बंधुओं और सूर्यनारायण रेड्डी की मर्जी के बिना वहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता. इस प्रगाढ़ रिश्ते में दरार साल 2011 में आनी शुरू हुई, जब सीबीआई ने अवैध माइनिंग घोटाले में गली जनार्दन रेड्डी को गिरफ्तार कर लिया. जनार्दन रेड्डी के जेल जाने के बाद उनका विशाल कारोबार और राजनीतिक ढांचा चरमराने लगा. इसी दौरान सूर्यनारायण रेड्डी और जनार्दन रेड्डी के बीच व्यापारिक हितों और संपत्तियों के बंटवारे को लेकर मतभेद पैदा हो गए. जनार्दन रेड्डी के समर्थकों का आरोप था कि मुश्किल वक्त में उनके सबसे करीबियों ने ही उनका साथ छोड़ दिया और उनके व्यापार पर कब्जा करने की कोशिश की.
रेड्डी ब्रदर्स का बेल्लारी में कभी हुआ करता था जलवा (फोटो-x)
कब हुई दोनों में दुश्मनी?
दूसरी ओर, सूर्यनारायण रेड्डी के खेमे का मानना था कि जनार्दन रेड्डी के कानूनी पचड़ों की वजह से उनके अपने व्यवसाय को नुकसान हो रहा था. धीरे-धीरे यह व्यापारिक दूरी एक गहरी राजनीतिक खाई में बदल गई. जब जनार्दन रेड्डी जमानत पर बाहर आए, तो उन्होंने देखा कि जिस बल्लारी पर कभी उनका एकछत्र राज था, वहां अब सूर्यनारायण रेड्डी के बेटे भरत रेड्डी एक नई ताकत के रूप में उभर चुके हैं.
कब लगी दुश्मनी पर मुहर?
साल 2023 का चुनाव इस अदावत का निर्णायक मोड़ साबित हुआ. जनार्दन रेड्डी ने अपनी नई पार्टी ‘कल्याण राज्य प्रगति पक्ष’ (KRPP) बनाई और अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए अपनी पत्नी को बल्लारी सिटी से मैदान में उतारा. वहीं कांग्रेस ने भरत रेड्डी पर दांव लगाया. यह चुनाव व्यक्तिगत प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गया. भरत रेड्डी ने चुनाव प्रचार के दौरान जनार्दन रेड्डी के ‘आतंक के राज’ और ‘भ्रष्टाचार’ को मुद्दा बनाया, जबकि जनार्दन रेड्डी ने भरत के परिवार को ‘विश्वासघाती’ करार दिया. भरत रेड्डी की जीत ने जनार्दन रेड्डी के अहंकार को गहरी चोट पहुंचाई और तभी से दोनों परिवारों के बीच टकराव की स्थिति बनी हुई है.
क्या है ताजा विवाद और क्यों चली गोलियां?
1 जनवरी 2026 की घटना इसी लंबी दुश्मनी का ताजा अध्याय है. विवाद महर्षि वाल्मीकि की प्रतिमा के अनावरण के लिए लगाए गए बैनरों को लेकर शुरू हुआ. भरत रेड्डी के समर्थकों द्वारा जनार्दन रेड्डी के घर के पास लगाए गए पोस्टरों को कथित तौर पर फाड़े जाने के बाद दोनों गुट सड़कों पर उतर आए. जनार्दन रेड्डी का दावा है कि भरत रेड्डी के गनमैन ने उन पर जानलेवा हमला करने के इरादे से फायरिंग की, जिसमें एक कार्यकर्ता मारा गया. वहीं भरत रेड्डी का कहना है कि जनार्दन रेड्डी ने जानबूझकर शांति भंग करने के लिए उपद्रव करवाया.
बेल्लारी का असली किंग कौन?
आज बल्लारी दो धड़ों में बंटा हुआ है. पुलिस ने दोनों पक्षों के खिलाफ मामला दर्ज किया है, लेकिन जिस तरह से एक समय के ‘व्यापारिक पार्टनर’ आज एक-दूसरे की जान के दुश्मन बने बैठे हैं, उसने कर्नाटक की राजनीति को हिलाकर रख दिया है. यह लड़ाई अब केवल सत्ता की नहीं, बल्कि उस वर्चस्व की है जिसे जनार्दन रेड्डी वापस पाना चाहते हैं और भरत रेड्डी खोना नहीं चाहते.
इस घटना के बाद जनार्दन रेड्डी ने खुद की जान को खतरा बताते हुए Z श्रेणी की सुरक्षा मांगी है.
रेड्डी को मिलेगा जेड प्लस सुरक्षा?
इस घटना के बाद जनार्दन रेड्डी ने खुद की जान को खतरा बताते हुए Z श्रेणी की सुरक्षा मांगी है. गली जनार्दन रेड्डी को कर्नाटक की राजनीति में ‘किंगमेकर’ और ‘माइनिंग किंग’ के रूप में जाना जाता है. एक पुलिस कांस्टेबल के बेटे जनार्दन रेड्डी का उदय 1999 के लोकसभा चुनाव के दौरान हुआ, जब उन्होंने बल्लारी में सुषमा स्वराज के चुनाव अभियान की कमान संभाली थी. हालांकि सुषमा स्वराज सोनिया गांधी से चुनाव हार गईं, लेकिन रेड्डी भाइयों जनार्दन, करुणाकर और सोमशेखर ने जिले पर अपनी पकड़ इतनी मजबूत कर ली कि बल्लारी को ‘रेड्डी ब्रदर्स का किला’ कहा जाने लगा.
रेड्डी ब्रदर्स का बीजेपी के साथ रिश्ता
2008 में जब कर्नाटक में पहली बार बीजेपी की सरकार बनी, तो जनार्दन रेड्डी उसके मुख्य सूत्रधार थे. उन्होंने ‘ऑपरेशन कमल’ के जरिए सरकार बनवाने में अहम भूमिका निभाई और खुद कैबिनेट मंत्री बने. उस दौर में बल्लारी में कानून नहीं, बल्कि रेड्डी भाइयों का हुक्म चलता था, जिसे तत्कालीन लोकायुक्त संतोष हेगड़े ने अपनी रिपोर्ट में ‘बल्लारी रिपब्लिक’ करार दिया था. लेकिन जनार्दन रेड्डी की ताकत पर ग्रहण तब लगा जब 2011 में सीबीआई ने उन्हें करोड़ों रुपये के अवैध माइनिंग घोटाले में गिरफ्तार कर लिया. वह सालों तक जेल में रहे और सुप्रीम कोर्ट ने उनके बल्लारी जिले में प्रवेश पर पाबंदी लगा दी. जब जनार्दन रेड्डी जेल में थे, तब उनके बड़े भाई करुणाकर रेड्डी और छोटे भाई सोमशेखर रेड्डी बीजेपी में ही बने रहे.
2023 के विधानसभा चुनाव से पहले जनार्दन रेड्डी ने अपनी नई पार्टी ‘कल्याण राज्य प्रगति पक्ष’ (KRPP) बनाई. यह उनके परिवार के लिए एक बड़ा झटका था क्योंकि उनके भाई अभी भी बीजेपी में थे. जनार्दन रेड्डी गंगावती से चुनाव जीत गए, लेकिन उनकी पत्नी अरुणा लक्ष्मी बल्लारी शहर से चुनाव हार गईं. उन्हें हराने वाले कोई और नहीं, बल्कि कांग्रेस के युवा नेता नारा भरत रेड्डी थे. यहीं से जनार्दन रेड्डी और भरत रेड्डी के बीच एक नई और खतरनाक दुश्मनी की शुरुआत हुई. मार्च 2024 में जनार्दन रेड्डी दोबारा बीजेपी में शामिल हो गए, लेकिन बल्लारी की सत्ता पर उनकी पुरानी पकड़ अब कमजोर पड़ चुकी थी.