न विरोध न टकराव मगर खींच दी बड़ी लकीर, नुसरत परवीन का एक फैसला और तीन संदेश, समाज के लिए बनी मिसाल
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AYUSH Doctor Nusrat Parveen Joins Duty : जब किसी विवाद का शोर थमने लगता है, तब असली फैसले की आवाज सुनाई देती है. आयुष चिकित्सक डॉ. नुसरत परवीन ने ठीक वही किया. 23 दिनों की खामोशी, बहसों और सियासी शोर के बाद मंगलवार को पटना के गर्दनीबाग स्थित सिविल सर्जन कार्यालय में योगदान देकर डॉ. नुसरत परवीन ने सिर्फ एक पद ग्रहण नहीं किया, बल्कि समाज के सामने एक बड़ी लकीर खींच दी और एक पॉजिटिव मैसेज दिया.
नुसरत परवीन ने हिजाब विवाद पर चुप्पी साधी, करियर को प्राथमिकता (AI जेनरेटेड)पटना. बीते 15 दिसंबर को बिहार के मुख्यमंत्री सचिवालय में नियुक्ति पत्र वितरण कार्यक्रम के दौरान सीएम नीतीश कुमार हिजाब हटाने को लेकर उठा विवाद अचानक डॉ. नुसरत परवीन को राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना गया. सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हुआ, बयानबाज़ी हुई, आरोप-प्रत्यारोप चले. कुछ ने इसे महिला सम्मान से जोड़ा तो कुछ ने इसे राजनीति का हथियार बना लिया. इन सबके बीच जो विवाद की केंद्र बिंदु रहीं वर बिल्कुल खामोश रहीं. नुसरत परवीन ने इस मुद्दे पर न कोई उग्र बयान दिया, न कोई भावनात्मक प्रतिक्रिया दी और न ही किसी पर कोई आरोप ही लगाए. वह विवाद के केंद्र में तो हर वक्त रहीं, लेकिन उन्होंने खुद को सियासत के मचाए जाने वाले शोर से पूरी तरह अलग रखा. संभवत: अंत में यही उनके फैसले की सबसे बड़ी ताकत भी रही.
महिला सम्मान और नुसरत की समझदारी
जानकारों की नजर में इस हिजाब प्रकरण से नुसरत परवीन आहत तो अवश्य हुईं लेकिन उनका पूरा रुख महिला सम्मान के इर्द-गिर्द रहा. उन्होंने न तो किसी भी प्रकार की कट्टरता को हवा दी और न ही सांप्रदायिक राजनीति का हिस्सा बनीं. इस बीच उन्होंने यह संदेश दिया कि एक महिला अपने आत्मसम्मान, अपनी पहचान और अपने करियर-तीनों को साथ लेकर चल सकती हैं. आज जब बहस अक्सर दो ध्रुवों में बंट जा या करती हैं, ऐसे में नुसरत परवीन का यह संतुलन भरा आचरण समाज और नई पीढ़ी के लिए एक सीख है. खास संदेश सत्ता के लिए भी है कि ऐसे मामलों में संवेदनशीलता और संतुलन कितनी जरूरी है.
करियर को प्राथमिकता, समाज को संदेश
23 दिन तक नौकरी ज्वाइन न करना कई सवाल खड़े करता रहा. कुछ रिपोर्टों में उनकी नाराजगी की बातें भी सामने आईं. लेकिन अंत में जब उन्होंने सेवा में योगदान दिया तो उन तमाम अटकलों पर विराम लग गया. सदर पीएचसी में तैनाती के साथ उन्होंने यह साफ कर दिया कि उनका रास्ता सेवा, चिकित्सा और प्रोफेशनल जिम्मेदारी से होकर जाता है. यह फैसला उन युवाओं के लिए भी संदेश है जो किसी एक घटना के बाद भावनाओं में बहकर अपने भविष्य को दांव पर लगा देते हैं.
डॉ. नुसरत परवीन ने हिजाब विवाद में संयम दिखाया, करियर को प्राथमिकता दी और समाज को महिला सम्मान व प्रोफेशनलिज़्म का संदेश दिया.
कट्टरता और राजनीति-दोनों को आईना
नुसरत परवीन का कदम उन लोगों को भी आईना दिखाता है जो हर महिला को किसी प्रतीक के रूप में इस्तेमाल करना चाहते हैं. यह फैसला उन ताकतों के लिए भी जवाब है जो धर्म के नाम पर समाज को बांटने में लगे रहते हैं. नुसरत ने न किसी को चुनौती दी, न किसी से टकराव किया. उन्होंने बस अपना स्वयं का रास्ता चुना और वही सबसे मजबूत जवाब बन गया. यह कदम उन लोगों के लिए आईना है, जो हर मुद्दे को धर्म और कट्टरता के चश्मे से देखने के आदी हो चुके हैं.
सियासी शोर में समाज के लिए बड़ी बात
राजकीय तिब्बी कॉलेज से एमडी पीजी कर रही एक युवा डॉक्टर का यह फैसला बताता है कि बदलाव नारे से नहीं आचरण से आता है. डॉ. नुसरत परवीन ने यह साबित किया कि असली साहस विवाद में उलझना नहीं, बल्कि उससे ऊपर उठकर अपने कर्तव्य को निभाना है. नौकरी ज्वाइन कर उन्होंने अपने करियर को भी तवज्जो दी और समाज को भी एक सकारात्मक संदेश दिया कि सम्मान, पहचान और प्रोफेशनलिज़्म साथ-साथ चल सकते हैं.
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