भरतपुर की पारंपरिक तिल-गुड़ टिक्की रेसिपी

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Atta Til Gud Tikki Recipe Bharatpur Rajasthan: सर्दियों के मौसम में भरतपुर के ग्रामीण क्षेत्रों में आटा, तिल और गुड़ से बनी पारंपरिक टिक्की काफी लोकप्रिय हो रही है. यह टिक्की न केवल चाय के साथ एक बेहतरीन नाश्ता है, बल्कि औषधीय गुणों से भी भरपूर है. गुड़ और तिल का मिश्रण शरीर को कड़ाके की ठंड में गर्माहट प्रदान करता है और ऊर्जा के स्तर को बनाए रखता है. ग्रामीण क्षेत्रों में इसे बनाने की परंपरा सदियों पुरानी है, जो अब अपनी पौष्टिकता के कारण शहरी इलाकों में भी पसंद की जा रही है. इसे आसानी से घर पर शुद्ध सामग्री के साथ तैयार किया जा सकता है.

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सर्दियों का मौसम आते ही भरतपुर के ग्रामीण इलाकों में सुबह की शुरुआत एक खास देसी स्वाद के साथ होती है. गांवों में चाय के साथ आटा, तिल और गुड़ से बनी पारंपरिक टिक्की लोगों की पहली पसंद बन जाती है. ठंड के दिनों में शरीर को अंदर से गर्म रखने वाली यह टिक्की न सिर्फ स्वाद में लाजवाब होती है, बल्कि सेहत के लिहाज से भी बेहद फायदेमंद मानी जाती है.

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ग्रामीण इलाकों में यह टिक्की वर्षों पुरानी परंपरा का एक अहम हिस्सा रही है. सुबह-सुबह जब घरों में मिट्टी के चूल्हे जलते हैं, तो तिल और गुड़ की भीनी-भीनी खुशबू पूरे माहौल को देसी रंग में रंग देती है. घर की महिलाएं बड़े चाव से आटे में तिल और गुड़ मिलाकर ये टिक्कियां तैयार करती हैं, जिन्हें सीधे चूल्हे की आंच या तवे पर सेंका जाता है. तैयार होने के बाद इसे गर्मागर्म चाय के साथ परोसा जाता है, जो कड़ाके की ठंड में एक अलग ही आनंद देता है. ग्रामीण बुजुर्गों का कहना है कि सर्दियों के दिनों में इस पारंपरिक टिक्की का सेवन न केवल शरीर को भरपूर ऊर्जा देता है, बल्कि यह कड़ाके की सर्दी से लड़ने की प्राकृतिक शक्ति भी प्रदान करता है.

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यह टिक्की ठंड से बचाने में भी बेहद मददगार साबित होती है. तिल में मौजूद प्राकृतिक तेल और गुड़ की गर्म तासीर न केवल शरीर के तापमान को बनाए रखती है, बल्कि शरीर को अंदरूनी ताकत भी प्रदान करती है. यही कारण है कि गांवों में बुजुर्गों से लेकर युवा तक इसे बड़े चाव से खाते हैं. खासकर कड़कड़ाती ठंड में खेतों में काम करने वाले किसान सुबह-सुबह इस टिक्की का सेवन कर दिनभर मेहनत करने के लिए खुद को तरोताजा और ऊर्जावान महसूस करते हैं. ग्रामीण बुजुर्गों का मानना है कि यह पारंपरिक टिक्की पुराने जमाने की ‘देसी हेल्थ डाइट’ का एक अनिवार्य हिस्सा रही है, जो आज भी अपनी पौष्टिकता और स्वाद के कारण उतनी ही लोकप्रिय है.

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जब बाजार के फास्ट फूड का चलन नहीं था, तब गांवों में इसी तरह के पारंपरिक व्यंजन ही लोगों की सेहत का मुख्य आधार हुआ करते थे. आज के दौर में भी सर्दियों का मौसम आते ही इस टिक्की की मांग काफी बढ़ जाती है और कई घरों में तो इसे रोजाना नाश्ते के तौर पर बनाया जाता है. भरतपुर की यह देसी टिक्की सिर्फ एक व्यंजन मात्र नहीं है, बल्कि यह यहाँ की संस्कृति, समृद्ध परंपरा और ग्रामीण जीवनशैली की एक अनूठी पहचान भी है. इसे बनाने के लिए विशेष रूप से बाजरे का आटा, गुड़ और तिल्ली (तिल) का उपयोग किया जाता है. इन सामग्रियों को एक निश्चित अनुपात में मिक्स करने के बाद, टिक्की का आकार देकर तेल में अच्छी तरह तलकर तैयार किया जाता है. जब यह सुनहरी होकर अच्छी तरह पक जाती है, तब इसका असली कुरकुरापन और स्वाद निखरकर सामने आता है.

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जब ये टिक्कियां तेल में अच्छी तरह तलकर सुनहरी और लाल हो जाती हैं, तब इन्हें निकालकर परोसा जाता है. यह खाने में बेहद क्रिस्पी और लाजवाब लगती हैं, जिसके स्वाद के आगे आधुनिक स्नैक्स भी फीके पड़ जाते हैं. आधुनिकता के इस दौर में भी गांवों में इस परंपरा का जीवित रहना यह दर्शाता है कि देसी स्वाद और पारंपरिक खानपान आज भी लोगों के दिलों में अपनी खास जगह बनाए हुए है. सर्दियों की ठंडी सुबह, हाथ में चाय का प्याला और साथ में गरमागरम बाजरा-तिल की टिक्की—यह नजारा भरतपुर के ग्रामीण जीवन की एक बेहद खूबसूरत और जीवंत तस्वीर पेश करता है.

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