दिल्ली और आगरा में होती थी हाड़ कंपाने वाली ठंड…मुगल क्या खा-पीकर करते थे उसका सामना
300 से 400 साल पहले दिल्ली में हाड़ कंपाने वाली ठंड पड़ती थी. तब ग्लोबल वार्मिंग जैसा कुछ नहीं था. तापमान आमतौर पर अब 1 से 2 डिग्री सेंटीग्रेड नीचे ही रहता था. इस दौर में मुगल बादशाह दिल्ली और आगरा में रहते थे. गर्मी से बचने के लिए तो वो कश्मीर की ओर कूच कर जाते थे लेकिन ठंड का सामना तो उन्हें यहीं रहकर करना होता था. इस ठंड से बचाव के लिए मुगल बादशाहों ने कई जतन किए थे, जो उनके खान-पान से लेकर महलों की बनावट और पहनने वाले कपड़ों तक होते थे.
वैसे सबसे पहले ये जान लेते हैं कि उस दौर में जो विदेशी यात्री भारत आए उन्होंने यहां की ठंड के बारे में क्या कहा. तब उत्तर भारत में ठंड खासी तेज और लंबी होती थी. दिसंबर से फरवरी तक कड़ाके की ठंड पड़ती थी. राल्फ फिच 1585 में आगरा आया. उसने लिखा यहां सर्दियों में पाला पड़ता था. नदियों का पानी बर्फ की तरह ठंडा हो जाता था. 1656 से अगले 12 सालों तक दिल्ली में रहे फ्राँस्वा बर्नियर ने दिल्ली की सर्दियों को “कष्टदायक ठंड” बताया. जॉन फ़्रायर (1670 के दशक) ने लिखा, आगरा में “इतनी ठंड पड़ती थी कि कि पानी जम जाता” था.
वैसे ऐतिहासिक डेटा बताता है कि दिल्ली-आगरा क्षेत्र में दिसंबर-जनवरी में न्यूनतम तापमान कभी-कभी हिमांक (0°C) के करीब चला जाता था, खासतौर पर रातों में.
शाही रसोई में बनते लगते थे गर्म तासीर वाले व्यंजन
इतिहासकार अबुल फजल ने ‘आइन-ए-अकबरी’ में ठंड के मौसम में शाही रसोई में बनने वाले खाने का जिक्र किया है. सर्दियों में भारी मात्रा में मांस जैसे पाया, निहारी और गरम मसालों का सेवन किया जाता था. मेवों का बहुत इस्तेमाल होता था. खुबानी, बादाम, पिस्ता और अखरोट जैसे सूखे मेवे अफगानिस्तान से मंगाए जाते थे.
खाने में ज़फ़रान, दालचीनी, अदरक, और बादाम का भरपूर उपयोग होता था. बिरयानी और हलीम जैसे गर्म व्यंजन सर्दियों में लोकप्रिय थे. मुगल इस मौसम में कई तरह के सूप पिया करते थे, जो मांसाहारी होते थे. जड़ी-बूटियों से बने गर्म अर्क और कहवा का सेवन आम था. कहवा में दालचीनी, इलायची और बादाम होते थे.
मुगल रसोइए सर्दियों में ऐसे भोजन तैयार करते थे, जिनकी तासीर गर्म हो.सर्दियों की सुबह की शुरुआत अक्सर निहारी से होती थी. इसे रात भर धीमी आंच पर पकाया जाता था. इसमें इस्तेमाल होने वाले मसाले जैसे सोंठ, पीपल और काली मिर्च शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते थे और अंदरूनी गर्माहट देते थे.
दालों, अनाज और मांस को घंटों तक घोटकर हलीम और खिचड़ा बनाया जाता था. ये व्यंजन प्रोटीन और कैलोरी का पावरहाउस होता था, जो कड़ाके की ठंड से लड़ने की ताकत देता था.
केसर का इस्तेमाल केवल रंग के लिए नहीं, बल्कि इसके औषधीय गुणों के लिए किया जाता था. सर्दियों में पुलाव, मांस और यहाँ तक कि दूध में भी भारी मात्रा में केसर डाला जाता था.
गजक से लेकर सोहन हलवा
मुगलों को कुरकुरे और मेवेदार व्यंजन पसंद थे. ‘सोहन हलवा’ जिसे आज भी दिल्ली में पसंद किया जाता है, उसकी जड़ें मुगल काल से जुड़ी हैं. इसमें घी और मेवों की प्रचुरता होती थी. याकुती एक शाही मीठा व्यंजन था जो बसंती रंग का होता था, जिसमें पिसा हुआ मांस, मोती की राख और केसर मिलाया जाता था ताकि वह शरीर को ऊर्जा दे सके.
शाही हकीमों की भूमिका
शाही हकीम बादशाह के खान-पान पर कड़ी नजर रखते थे. वे सर्दियों में ‘माजून’ खाने की सलाह देते थे, जो एक प्रकार का औषधीय पेस्ट होता था, जिसमें शहद, मेवे और जड़ी-बूटियां होती थीं.
कहा जाता है कि मुगल रानियां अपनी त्वचा को ठंड से बचाने के लिए चंदन, केसर और मलाई के लेप का इस्तेमाल करती थीं, जो हमाम में स्नान के बाद लगाया जाता था.
इमारतों को कैसे गर्म रखते थे
मुगल इमारतों में ठंड से बचाव के लिए दीवारें मोटी बनाई जाती थीं. खिड़कियाँ अपेक्षाकृत छोटी रखी जाती थीं ताकि हवा कम आए. आवासीय भवनों में बंद आंगन होते थे, जो ठंडी हवाओं से सुरक्षा देते थे.
शाही महलों में “शीतकालीन कक्ष” यानि विंटर चेंबर होते थे, जिन्हें धूप अधिक मिलने वाली दिशा में बनाया जाता था. गर्मी बनाए रखने के लिए डिज़ाइन किया जाता था. फर्श पर मोटे दरी-गद्दे बिछाए जाते थे, और दीवारों पर कालीन लगाए जाते थे.
कमरे गर्म रहें इसके लिए अंगीठियों में कोयला या लकड़ी जलाकर गर्मी पैदा की जाती थी. अमीर घरों में सुगंधित अंगीठियां होती थीं. कोयले पर केसर या गुलाब जल छिड़ककर जब उन्हें जलाते थे तो माहौल में सुगंध भर देती थीं. रात में बिस्तर गर्म करने के लिए तांबे के तावे में गर्म पानी भरकर रखा जाता था.
मुगलों के गरम हम्माम
मुगलों ने तुर्की और फारसी शैली के हम्माम बनवाए थे. ये केवल स्नानघर नहीं थे, बल्कि हीटिंग सिस्टम से लैस कमरे थे. फर्श के नीचे गर्म पानी या भाप की पाइपलाइनें बिछी होती थीं, जो पूरे कमरे को गर्म रखती थीं. आगरा के लाल किले और फतेहपुर सीकरी में इसके अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं.
एक मानक हमाम तीन हिस्सों में बंटा होता था –
शीत कक्ष – यहां कपड़े बदले जाते थे
गुनगुना कक्ष -शरीर को तापमान के अनुकूल बनाने के लिए
गर्म कक्ष – मुख्य स्नान क्षेत्र जहां भाप और गर्म पानी होता था
फर्श के नीचे खाली जगह छोड़ी जाती थी, जहां भट्टियों से निकलने वाली गर्म हवा और धुआं घुमता था, इससे फर्श हमेशा गर्म रहता था. दीवारों के भीतर तांबे की पाइपलाइन बिछी होती थी, जिससे गर्म पानी की सप्लाई होती थी. छतों में छोटे-छोटे रोशनदान होते थे जिनमें रंगीन कांच लगे होते थे, ताकि रोशनी अंदर आए लेकिन गर्मी बाहर न जाए.
पश्मीना शॉल से लेकर मखमली लिबास
मुगल बादशाह और अमीर वर्ग पश्मीना शॉल, कश्मीरी दुशाले और मखमल के लिबास पहनते थे. आम जनता ऊनी कपड़ों और रजाइयों का उपयोग करती थी. सर्दियों में ‘लबादा’ या ‘चोगा’ पहना जाता था, जिसमें रुई भरी होती थी. रेशम के बीच में रुई की परत लगाकर बनाए गए ये कपड़े बहुत गर्म होते थे.
अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फजल ने “आइन-ए-अकबरी” में लिखा है कि सर्दियों में विशेष प्रकार की टोपियां पहनी जाती थीं. शाही परिवार चमड़े या मखमल के दस्ताने और ऊनी मोजे पहनते थे. मध्य एशिया में समरकंद से ताल्लुक रखने के कारण मुगलों को चमड़े और फर के इस्तेमाल का अच्छा ज्ञान था. वे अपने कोट के कॉलर और अंदरूनी हिस्सों में कीमती फर का उपयोग करते थे.
अकबरनामा के अनुसार, अकबर को कश्मीर की ‘पश्मीना’ और ‘तूस’ शॉल बहुत पसंद थी. वह अक्सर दो शॉल एक साथ ओढ़ते थे, जिसे दो-शाला कहा जाता था.
सोर्स
1. आइन-ए-अकबरी (अबुल फजल)
2. तुजुक-ए-जहांगीरी (जहांगीर की आत्मकथा)
3. फ्रांस्वा बर्नियर की यात्राएं – 17वीं सदी के इस फ्रांसीसी यात्री ने मुगलों की विलासिता और उनके मौसम से बचने के तरीकों का आंखों देखा हाल लिखा है.
4. बादशाहनामा” (अब्दुल हमीद लाहौरी)
6. “डोमेस्टिकलिटी एंड पावर इन अर्ली मुगल इंडिया” (रोशन तमकून)
7. फ्रेंच यात्री जीन-बैप्टिस्ट टैवर्नियर ने 17वीं शताब्दी में मुगल सर्दियों में कश्मीरी शॉल और रेशम के कपड़े पहनते थे और अंगीठियों का उपयोग करते थे.