Umar Khalid- Sharjeel Imam Bail: उमर-शरजील कब तक रहेंगे तिहाड़ में… क्या बाहर आने के सारे रास्ते अब हो गए बंद? _ how long will jnu umar khalid and sharjeel imam remain in tihar jail delhi riots case all avenues to release from jail are closed experts opinion
नई दिल्ली. सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगा मामले में जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व नेता उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इंकार कर दिया. साल 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट का ऐसा फैसला आया जिसने कानूनी हलकों में नई बहस छेड़ दी है. जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने इस मामले में सात मुख्य आरोपियों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए 5 मुस्लिम आरोपियों को जमानत दे दी, जबकि उमर खालिद और शरजील इमाम को जेल की सलाखों के पीछे ही बिताना होगा? कब तक दोनों तिहाड़ में रहेंगे? दोनों के पास क्या-क्या विकल्प बचते हैं?
दिल्ली दंगा मामले में सोमवार को सुप्रीम कोर्ट का आया फैसला समानता के अधिकार और अपराध की गंभीरता के बीच एक महीन कानूनी रेखा खींचता है. ऐसे में बड़ा सवाल जिन पांच शख्स को जमानत मिली है, उसके आधार पर क्या उमर खालिद और शरजील इमाम फिर से सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकते हैं? क्या सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद दिल्ली हाईकोर्ट या सेशन कोर्ट में उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत पर सुनवाई करेगी? कानून के जानकारों की राय क्या है?
क्या विकल्प बचते हैं अब उमर और शरजील के पास?
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को जिन पांच लोगों को जेल से बाहर आने का रास्ता साफ किया, वे पिछले करीब 6 साल से जेल में बंद थे. इनके नाम हैं गुलफिशा फातिमा, जो एक छात्रा और सामाजिक कार्यकर्ता है. इन पर विरोध प्रदर्शनों के दौरान भीड़ जुटाने का आरोप था. दूसरा शख्स मीर हैदर जामिया मिल्लिया इस्लामिया का छात्र था और आरजेडी युवा इकाई का नेता था. तीसरा शख्स शिफा-उर-रहमान था, जो जामिया समन्वय समिति का सदस्य है. चौथा मोहम्मद सलीम खान नाम का शख्स है, जो साजिश के मामले में एक अन्य आरोपी है. पांचवां शख्स शादाब अहमद है, जो दंगों के दौरान स्थानीय स्तर पर सक्रिय था.
कौन हैं वो पांच खुशनसीब, जिनको मिली आजादी
इन पांचों पर दिल्ली पुलिस ने आरोप लगाया था कि इन्होंने विरोध प्रदर्शनों के नाम पर चक्का जाम किया और हिंसा के लिए भीड़ को संगठित किया. हालांकि, कोर्ट ने इन्हें राहत देते हुए माना कि इनका लंबा जेल प्रवास और ट्रायल की धीमी गति इनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है.
उमर और शरजील से अलग क्यों है इनका मामला?
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से ‘पदानुक्रम’ यानी Hierarchy of Participation का जिक्र किया. सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, उमर खालिद और शरजील इमाम का मामला अन्य पांचों से ‘गुणात्मक रूप से भिन्न’ है. अदालत ने माना कि दिल्ली पुलिस की चार्जशीट के अनुसार उमर और शरजील ‘बौद्धिक मास्टरमाइंड’ थे. उनके भाषण और गुप्त बैठकें केवल स्थानीय विरोध तक सीमित नहीं थीं, बल्कि उनका उद्देश्य भारत सरकार की छवि खराब करना और ‘सत्ता परिवर्तन’ जैसी वैश्विक साजिश का हिस्सा होना था.
कोर्ट ने रिपोर्ट को दिल्ली पुलिस कमिश्नर के पास भेज दिया है. (फाइल फोटो)
पुलिस के वो आरोप जिन्होंने जमानत रोकी
कोर्ट ने कहा कि उमर खालिद की 8 जनवरी 2020 की मीटिंग और शरजील इमाम के भड़काऊ भाषणों ने हिंसा को एक रणनीतिक दिशा दी, जबकि बाकी 5 आरोपी उस रणनीति को केवल जमीन पर लागू करने वाले एक सहयोगी थे. दिल्ली पुलिस की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और एएसजी एस.वी. राजू ने दलील दी कि यूएपीए (UAPA) की धारा 43D(5) के तहत, यदि अदालत को लगता है कि आरोप ‘प्रथम दृष्टया’ सही हैं, तो जमानत नहीं दी जा सकती.
दिल्ली पुलिस ने दावा किया कि उमर खालिद ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की यात्रा के दौरान दंगों की योजना बनाई थी ताकि इसे ‘भारत में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार’ के रूप में दिखाया जा सके. वहीं, शरजील इमाम पर ‘चक्का जाम’ को हथियार बनाकर देश के एक हिस्से को काटने के आह्वान का आरोप लगाया गया.
क्या उमर और शरजील दोबारा कोर्ट जा सकते हैं?
कानूनी रूप से, अब वे दिल्ली हाई कोर्ट वापस नहीं जा सकते क्योंकि सुप्रीम कोर्ट अंतिम अपील अदालत है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें एक ‘विंडो’ दी है. कोर्ट ने कहा कि वे एक साल बाद या ‘प्रोटेक्टेड विटनेस’ यानी सुरक्षित गवाहों की गवाही पूरी होने के बाद, जो भी पहले हो, ट्रायल कोर्ट में दोबारा जमानत याचिका लगा सकते हैं.
अदालत में सुनवाई के दौरान शरजील इमाम के कई भाषण चलाए गए.
कानून के जानकारों की राय
कानून के विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य के यूएपीए मामलों के लिए नजीर बनेगा. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि ‘देरी’ हमेशा जमानत के लिए ‘ट्रंप कार्ड’ नहीं हो सकती, खासकर तब जब मामला देश की सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़ा हो. उमर के वकील सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल और शरजील के वकील सिद्धार्थ दवे ने दलील दी थी कि बिना ट्रायल के 6 साल जेल में रखना ‘सजा से पहले सजा’ है. लेकिन कोर्ट ने ‘राष्ट्रीय एकता’ के विधायी निर्णय को प्राथमिकता दी.
ऐसे में अब सबकी नजरें इस बात पर हैं कि क्या दिल्ली पुलिस अगले एक साल में मुख्य गवाहों की गवाही पूरी कर पाएगी, जिससे इन दोनों के बाहर आने का रास्ता साफ हो सके. अगर ऐसा होता है तो शायद उमर खालिद और शरजील इमाम को लंबे समय तक तिहाड़ जेल में बिताना पड़ सकता है.