जयपुर में चित्तौड़गढ़ के हलवाई कोल्हू तकनीक से तिलकुट्टा हलवा
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जयपुर की सड़कों पर इस सर्दी तिलकुट्टा हलवे का जादू! चित्तौड़गढ़ से आए हलवाई पुराने कोल्हू की तकनीक को आधुनिक ट्विस्ट देते हुए मोटरसाइकिल से तिल पिस रहे हैं. दादी-नानी के जमाने का यह देशी हलवा अब पोषण और शुद्ध तेल के साथ बच्चों और बुजुर्गों के बीच लोकप्रिय हो रहा है.
जयपुर. सर्दियों का सीजन चरम पर है और हर साल इस मौसम में लोग तिलकुट्टा हलवे को खूब पसंद करते हैं. इसी वजह से सर्दियों के सीजन में चित्तौड़गढ़ से लोग जयपुर आते हैं और यह खास हलवा तैयार करते हैं. वर्तमान में जयपुर के विभिन्न विंटर फेयरों और सड़कों पर हलवाई तिलकुट्टा तैयार कर रहे हैं, लेकिन कुछ हलवाईयों का खास अंदाज लोगों को बहुत भा रहा है. जयपुर में चित्तौड़गढ़ से आए हलवाई प्राचीन समय के कोल्हू की बैल वाली तकनीक से तिल की पिसाई कर रहे हैं. यह प्रक्रिया देखने के लिए लोगों की भीड़ जुट जाती है, राजस्थान में कोल्हू के बैल की कहावत बहुत प्रसिद्ध है.
पुराने समय में बैलों का इस्तेमाल कृषि कार्यों के अलावा कुएं से पानी निकालने और अनाज पिसने में भी किया जाता था. बैल दिन भर एक निश्चित वृत्त में चलते थे, इसलिए आज भी राजस्थान में लोग आम बोलचाल की भाषा में इस कहावत का प्रयोग करते हैं. आज के समय में लोग कोल्हू के बैल को ऐसे काम करते नहीं देखते, लेकिन चित्तौड़गढ़ से आए हलवाईयों ने कोल्हू की प्राचीन तकनीक को तिलकुट्टा हलवे के लिए तिल की पिसाई में अपनाया है. बैल की जगह उन्होंने मोटरसाइकिल का उपयोग किया है, जिससे तिल की पिसाई होती है. इसे देखकर लोग आश्चर्यचकित रह जाते हैं.
कोल्हू के बैल नहीं, अब है मोटरसाइकिल बैल की तकनीक
लोकल-18 ने तिलकुट्टा तैयार करने वाले हलवाईयों से बात की, उन्होंने बताया कि तिलकुट्टा बनाने के लिए पुराने समय में लोग तिल की पिसाई हाथों से करते थे. लेकिन समय बदलने के साथ मशीनों ने यह काम आसान कर दिया. उनके पास तिल पीसने के लिए मशीन नहीं है, इसलिए उन्होंने पुराने समय की प्रसिद्ध कोल्हू बैल की पद्धति अपनाते हुए मोटरसाइकिल को इसमें जोड़ दिया. हलवाई कहते हैं, “इस तकनीक से तिल की पिसाई देखने वालों को बहुत अच्छा लगता है, क्योंकि सिर्फ हमारे दादा-नानाओं के जमाने में ही बैल काम करते थे. आज के लोग बैल को कुएं से पानी निकालते या खेत जोतते हुए नहीं देखते, इसलिए लोग हमारी तिल पिसाई की प्रक्रिया देखने के लिए रुकते हैं.” हलवाई यह भी कहते हैं कि चाहे मशीन से तिल पिसाई हो या हमारी इस तकनीक से, तिलकुट्टा हलवे की पिसाई बेहतर और 100% शुद्ध तेल प्रदान करती है, जिसे लोग खूब खरीदते हैं.
सर्दियों में जयपुर में तिलकुट्टा हलवे की डिमांड
सर्दियों में लोग गाजर का हलवा और विभिन्न प्रकार के लड्डू भी पसंद करते हैं. लेकिन तिलकुट्टा हलवा की मांग सबसे ज्यादा रहती है, इसलिए जयपुर में चित्तौड़गढ़ से आए हलवाई अलग-अलग जगहों पर यह हलवा तैयार कर रहे हैं. तिलकुट्टा हलवा खासतौर पर सर्दियों का मेवा कहा जाता है. यह दादी-नानी के जमाने का देशी हलवा है, जो पोषण और ऊर्जा से भरपूर होता है. यह हलवा विशेष रूप से बच्चों और बुजुर्गों के लिए फायदेमंद है और गुड़, तिल और विभिन्न ड्राईफ्रूट्स से तैयार किया जाता है. सर्दियों में तिल, मूंगफली, सोयाबीन जैसे तिलहन से प्राप्त उच्चतम क्वालिटी के तेल की भी डिमांड रहती है. यह तेल 100% शुद्ध होता है और मिलावटी तेल के बजाय ज्यादा पसंद किया जाता है.
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