UP Board Exam: यूपी बोर्ड परीक्षा केंद्र घर से कितनी दूर होगा? नकल रोकने के लिए बने सख्त नियम
नई दिल्ली (UP Board Exam Center Policy). दुनिया की सबसे बड़ी परीक्षा संस्थाओं में से एक, उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद (UPMSP) के लिए लाखों परीक्षार्थियों की परीक्षा आयोजित करना किसी चुनौती से कम नहीं है. हर साल यूपी बोर्ड परीक्षा शुरू होने से पहले छात्रों और अभिभावकों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि उनका परीक्षा केंद्र कहां बनेगा. यूपी बोर्ड परीक्षा प्रणाली में ‘परीक्षा केंद्र निर्धारण’ की प्रक्रिया पारदर्शी रखी जाती है. इससे नकल माफिया पर लगाम लगाने में मदद मिलती है.
यूपी बोर्ड परीक्षा केंद्र का चयन कैसे होता है?
यूपी बोर्ड परीक्षा केंद्रों का निर्धारण अब पूरी तरह से ‘सेंट्रलाइज्ड ऑनलाइन सिस्टम’ के माध्यम से किया जाता है. इससे मानवीय हस्तक्षेप और भ्रष्टाचार की गुंजाइश खत्म होती है.
ऑनलाइन डेटा और जियो-टैगिंग का खेल
सबसे पहले, जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS) के माध्यम से सभी स्कूलों से उनके रिसोर्सेस का डेटा मांगा जाता है. इसमें कमरों की संख्या, बैठने की क्षमता, बिजली-पानी की व्यवस्था और स्कूल की भौगोलिक स्थिति (Latitude/Longitude) शामिल होती है. बोर्ड इन स्कूलों की जियो-टैगिंग करता है. इससे सुनिश्चित होता है कि स्कूल वास्तव में उसी स्थान पर है और परीक्षार्थियों के लिए वहां तक पहुंचना आसान है.
सीसीटीवी और वॉयस रिकॉर्डर अनिवार्य
आज के दौर में ‘बिना तीसरी आंख’ के यूपी बोर्ड की परीक्षा संभव नहीं है. केंद्र बनने के लिए स्कूल के हर कमरे, एंट्री गेट और लॉकर रूम में सीसीटीवी कैमरे और वॉयस रिकॉर्डर होना अनिवार्य है. बोर्ड की नीति के अनुसार, इन कैमरों का सीधा लिंक लखनऊ और प्रयागराज स्थित कंट्रोल रूम से होता है, जहां से लाइव वेबकास्टिंग के जरिए निगरानी की जाती है.
बुनियादी सुविधाओं की कसौटी
यूपी बोर्ड परीक्षा केंद्र में केवल सीसीटीवी होना ही काफी नहीं है. बोर्ड यह भी देखता है कि स्कूल के पास परीक्षार्थियों के लिए पक्की छत वाले कमरे हैं या नहीं. टिन शेड या कच्ची छतों वाले स्कूलों को केंद्र नहीं बनाया जाता. इसके अलावा, स्कूल के चारों तरफ चारदीवारी (Boundary Wall), डबल लॉक वाली अलमारी (प्रश्नपत्र रखने के लिए) और परीक्षार्थियों के लिए शौचालय और पीने के पानी की पर्याप्त व्यवस्था होना जरूरी है.
दूरी और ट्रांसपोर्टेशन का मानक
बोर्ड परीक्षार्थियों की सुविधा का भी ध्यान रखता है. सामान्य तौर पर छात्राओं के लिए सेल्फ सेंटर या उनके स्कूल के 5 किलोमीटर के दायरे में केंद्र बनाने की कोशिश की जाती है. वहीं, लड़कों के लिए यह सीमा 10 से 12 किलोमीटर तक हो सकती है. दिव्यांग छात्रों को विशेष प्राथमिकता देते हुए उनके नजदीकी स्कूलों को केंद्र के रूप में अलॉट किया जाता है.
दागी स्कूलों पर ‘ब्लैकलिस्ट’ की गाज
जिन स्कूलों का रिकॉर्ड खराब रहा है या जहां पहले कभी सामूहिक नकल की शिकायतें मिली हैं, उन्हें बोर्ड सीधे तौर पर ब्लैकलिस्ट कर देता है. ऐसे स्कूलों को केंद्र निर्धारण प्रक्रिया से बाहर रखा जाता है. राजकीय और सहायता प्राप्त स्कूलों को केंद्र बनाने में पहली प्राथमिकता दी जाती है, जबकि निजी स्कूलों का चयन केवल जरूरत पड़ने पर ही किया जाता है.