Men ear piercing astrology। पुरुषों का कान छिदवाना

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Should Men Ear Piercing: आज के समय में कान छिदवाना ज्यादातर लोग महिलाओं से जोड़कर देखते हैं. जैसे ही किसी पुरुष के कान में बाली या ईयररिंग दिखती है, तो इसे फैशन या मॉडर्न सोच से जोड़ दिया जाता है, लेकिन अगर हम पुराने समय, धार्मिक मान्यताओं और ज्योतिष की बात करें, तो तस्वीर इससे काफी अलग नजर आती है. हिंदू धर्म में शरीर से जुड़े कई संस्कार बताए गए हैं, जिनका मकसद सिर्फ बाहरी रूप नहीं बल्कि अंदरूनी ऊर्जा, सोच और सेहत से जुड़ा होता है. इन्हीं संस्कारों में से एक है कर्णवेध संस्कार यानी कान छिदवाना. पुराने समय में राजा-महाराजा, योद्धा, साधु और ऋषि तक कान छिदवाते थे. रामायण और महाभारत काल में भी पुरुषों के कान छिदवाने के उल्लेख मिलते हैं. भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण के कर्णवेध संस्कार की कथाएं धार्मिक ग्रंथों में मिलती हैं. उस दौर में इसे सिर्फ गहना पहनने के लिए नहीं किया जाता था, बल्कि इसे दिमागी संतुलन, सोच की स्पष्टता और शरीर की ऊर्जा से जोड़कर देखा जाता था. आज सवाल यह उठता है कि क्या मौजूदा समय में भी पुरुषों को कान छिदवाना चाहिए या ये परंपरा अब सिर्फ बीते दौर तक ही सीमित रह गई है. ज्योतिष इसे सिर्फ फैशन नहीं मानता, बल्कि ग्रहों के असर और शरीर में ऊर्जा के प्रवाह से जोड़कर देखता है. यही वजह है कि इसके कुछ नियम, सही समय और सही तरीका बताए गए हैं, जिनका ध्यान रखना जरूरी माना जाता है. इस विषय में अधिक जानकारी दे रहे हैं भोपाल निवासी ज्योतिषी एवं वास्तु सलाहकार पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा.

हिंदू धर्म में कर्णवेध संस्कार का महत्व
हिंदू धर्म में 16 संस्कार बताए गए हैं, जिनमें कर्णवेध भी शामिल है. मान्यता है कि कान छिदवाने से शरीर में पॉजिटिव ऊर्जा का फ्लो बेहतर होता है. पुराने समय में बच्चों का कर्णवेध बचपन में ही कर दिया जाता था, ताकि उनकी सेहत मजबूत रहे और दिमागी विकास अच्छा हो. ये संस्कार सिर्फ लड़कियों तक सीमित नहीं था. लड़कों के लिए भी इसे उतना ही शुभ माना गया है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कान के कुछ खास बिंदुओं पर छिदवाने से शरीर की नसें एक्टिव होती हैं, जिससे ध्यान लगाने की क्षमता बढ़ती है और चिड़चिड़ापन कम होता है.

ज्योतिष के अनुसार पुरुषों का कान छिदवाना
ज्योतिष शास्त्र में कान को राहु और केतु ग्रह से जोड़कर देखा जाता है. ये दोनों ग्रह जीवन में उलझन, भ्रम और मानसिक तनाव का कारण बन सकते हैं. मान्यता है कि सही समय और सही विधि से कान छिदवाने पर इन ग्रहों का नेगेटिव असर कम हो सकता है. ज्योतिष मानता है कि कान छिदवाने से इंसान की सोच साफ होती है, निर्णय लेने की ताकत बढ़ती है और मन ज्यादा स्थिर रहता है. यही वजह है कि पहले समय में योद्धा और राजा कान में कुंडल पहनते थे, ताकि वे युद्ध या शासन के समय सही फैसले ले सकें.

राहु-केतु का असर क्यों होता है कम
राहु और केतु को छाया ग्रह कहा जाता है. इनका असर इंसान की सोच, डर और भ्रम से जुड़ा माना जाता है. ज्योतिष के मुताबिक जब कान के सही बिंदु पर छिदवाया जाता है, तो वहां से गुजरने वाली ऊर्जा राहु-केतु के प्रभाव को बैलेंस करने में मदद करती है. इससे इंसान ज्यादा फोकस्ड रहता है, बेवजह के डर कम होते हैं और जीवन में स्थिरता आती है. हालांकि इसके लिए सही दिन और सही उम्र का ध्यान रखना जरूरी बताया गया है.

सोना या चांदी की बाली क्यों शुभ मानी जाती है
पुरुषों के लिए ज्योतिष में सोना और चांदी दोनों को शुभ धातु माना गया है. सोना सूर्य और गुरु ग्रह से जुड़ा माना जाता है, जो आत्मविश्वास, नेतृत्व और सोच की मजबूती से जुड़ा है. वहीं चांदी चंद्रमा से जुड़ी होती है, जो मन को शांत रखने और भावनाओं को संतुलित करने में मदद करती है. इसी वजह से कहा जाता है कि पुरुष अगर कान छिदवाएं, तो सोने या चांदी की हल्की बाली पहनना बेहतर रहता है. लोहे या सस्ती धातुओं से बनी बालियों से बचने की सलाह दी जाती है.

कान छिदवाते समय किन बातों का रखें ध्यान
मान्यता है कि सिर्फ एक कान छिदवाना कुछ परंपराओं में ठीक नहीं माना जाता. दोनों कान छिदवाना संतुलन के लिए जरूरी बताया गया है. शनिवार और रविवार को कान छिदवाने से बचने की बात कही जाती है, अगर कुंडली में मंगल या शनि कमजोर हो, तो पहले किसी जानकार से सलाह लेना बेहतर माना जाता है. साफ-सफाई का भी खास ध्यान रखना चाहिए, ताकि इंफेक्शन न हो.

आज के समय में पुरुषों के लिए क्या सही है?
आज के दौर में कान छिदवाना निजी पसंद का मामला है. कोई इसे आस्था, कोई परंपरा और कोई फैशन से जोड़कर देखता है, लेकिन अगर इसे सही जानकारी, सही समय और सही तरीके से किया जाए, तो ज्योतिष और परंपरा दोनों ही इसे नकारात्मक नहीं मानते.

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