Fish without kanta: कांटे के कारण नहीं खाते मछली, तो खाएं ये वाली Fish, गले में कांटा फंसने का भूल जाएं टेंशन
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Kis machli me kanta nahi hota: नॉनवेज में काफी लोग चिकन, मटन की बजाय मछली खाना पसंद करते हैं, लेकिन कुछ लोग मछली की तरफ देखते भी नहीं. ऐसा इसलिए क्योंकि इसमें छोटे-छोटे इतने कांटे होते हैं कि ये गले में जाकर फंस जाते हैं. ऐसे में इस कांटे को निकालना बहुत मुश्किल काम हो जाता है. मछली काफी हेल्दी होती है, इसमें ढेरों पोषक तत्व होते हैं जैसे प्रोटीन, ओमेगा-3 फैटी एसिड, विटामिन्स. कांटे की वजह से आप मछली खाने से परहेज करते हैं, तो कई ऐसी मछलियां हैं, जिनमें कांटे बिल्कुल नहीं होते. चीन ने एक ऐसी मछली डेवलप की है, जिसमें कांटे बिल्कुल नहीं होंगे. जानिए इस मछली के बारे में यहां.

आजकल चिकन और मटन से ज्यादा लोग मछली खाना पसंद करते हैं, क्योंकि मछली में फैट नहीं होता. इसमें प्रोटीन, ओमेगा-3 फैटी एसिड, विटामिन्स और दूसरे पोषक तत्व भरपूर होते हैं. ये पोषक तत्व बच्चों की सेहत और विकास के लिए बड़ों से भी ज्यादा जरूरी हैं. फिर भी, मछली में कांटे होने के डर से कई माता-पिता बच्चों को मछली देने से हिचकिचाते हैं. कुछ बड़े भी कांटे की वजह से मछली ज्यादा नहीं खाते. मछली के कांटे से डर लगता है, लेकिन दूसरी तरफ गले में कांटा फंसना भी एक आम समस्या है.

इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए, चीन में बिना कांटे वाली एक मछली बनाई गई है. Aquaculture नाम की मेडिकल जर्नल में छपे एक रिव्यू में बताया गया है कि ये कैसे संभव हुआ. इसके मुताबिक, RunX2b नाम के जीन को एडिट करके, किबेल केंडाई मछली में बिना कांटे वाली (सिर्फ हड्डी वाली) मछली तैयार की गई है.

यह जीन में बदलाव मछलियों के बढ़ने के समय उनमें बनने वाली छोटी हड्डी (कांटा) बनने से रोकता है. चीनी विज्ञान अकादमी के वैज्ञानिकों ने जीन एडिटिंग तकनीक (CRISPR/Cas9) का इस्तेमाल करके पूरी तरह से बिना कांटे वाली इस तरह की केंडई मछली (Crucian Carp) बनाई है.
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इन नई किस्म की मछलियों को Zhongke No. 6 नाम दिया गया है. रिसर्च में बताया गया है कि इसका स्वाद, खुशबू और पोषक तत्व बिल्कुल आम मछलियों जैसे ही हैं. आम मछलियों के मुकाबले केंडई मछलियों की जीन संरचना काफी जटिल होती है. क्योंकि इनमें कई लेयर वाले क्रोमोसोम्स होते हैं, इसलिए कांटे के लिए जिम्मेदार खास जीन (runx2b gene) को सही तरीके से पहचानकर बदलने में काफी समय लगा है. इसी वजह से ये रिसर्च 6 साल तक चली है.

आमतौर पर एक केंटई मछली में करीब 80 से ज्यादा छोटे कांटे (इंटरमस्क्युलर बोन्स) होते हैं, लेकिन इस नई किस्म में सिर्फ बड़ी हड्डी ही होती है. मांस में परेशान करने वाले छोटे कांटे बिल्कुल नहीं होते. जेनेटिकली मॉडिफाइड होने की वजह से मछली के शरीर में छोटे कांटे पूरी तरह गायब हो जाते हैं. फिर भी, मछली की बाकी जरूरी हड्डियों (स्केलेटन) पर कोई असर नहीं पड़ता, ऐसा कहा जाता है.

एक शोधकर्ताओं के अनुसार, ये मछलियां 25% ज्यादा तेजी से बढ़ती हैं, इसलिए कम समय में ज्यादा फायदा मिल सकता है. इसके अलावा, आम मछलियों के मुकाबले इन मछलियों को कम चारा देना पड़ता है, जिससे किसानों का खर्च भी कम होता है. गहरे तालाबों में भी ये मछलियां बीमारियों का सामना करके अच्छी तरह बढ़ती हैं, क्योंकि इनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है.

इन मछलियों को दूसरी जंगली मछलियों के साथ मिलकर प्रजनन न करें और पर्यावरण में बदलाव न आए, इसलिए इन्हें बांझ (Sterile) बनाया गया है. ये कब बाजार में आएंगी इसकी पूरी जानकारी नहीं है. वैसे हमारे यहां मिलने वाली सूरा मछली, काला मछली, कानांगौथी, वावल मछली जैसी मछलियां खा सकते हैं. इनमें कांटे बहुत कम होते हैं.