Explainer: क्यों अब भारत में ज्यादातर जगहों पर नलों में आने लगा दूषित पानी, घरों में लगे RO

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देश के सबसे साफसुथरे शहर इंदौर में दूषित पेयजल हादसे ने जाहिर किया है कि पाइपलाइन से घरों में पहुंचने वाला पानी अब खतरे की वजह भी बन रहा है. आमतौर पर ज्यादातर जगहों पर अब नल का पानी सीधा पीने लायक नहीं रह गया है. बगैर घरों में आरओ लगाए पीने का पानी नहीं मिल पा रहा है. हम यहां सवाल जवाब के जरिए जानेंगे कि क्यों पेयजल इंफ्रास्ट्रक्चर चरमराने लगा है.

देश के ज्यादातर शहरों में पुरानी पेयजल पाइपलाइनें एक बड़ी समस्या हैं. जिसकी वजह से घरों में पहुंचने वाला पानी आमतौर पर पीने लायक नहीं रह गया है. लेकिन कई बार ये इतना दूषित हो जाता है कि इंदौर जैसे हादसे हो जाते हैं.

सवाल – ज्यादातर शहरों या जगहों पर लोग नल के पानी पर भरोसा नहीं करते, क्या वो वास्तव में पीने लायक नहीं रहता?

– बात काफी हद तक सही है कि नलों से जो पानी घरों तक पहुंच रहा है वो अब सीधे पीने लायक तो नहीं रह गया है. पुरानी पाइपलाइंस या उनकी खराब हालत की वजह से बेशक नगर निगम के ट्रीटमेंट प्लांट पानी को साफ करते हैं लेकिन ये घर तक पहुंचते-पहुंचते दूषित हो जाता है.

सवाल – पाइपलाइन अब क्यों पेयजल के दूषित होने की वजह बन रही हैं?

– पाइपलाइन पुरानी होने के कारण उनमें दरारें आ जाती हैं, जिससे आस-पास की मिट्टी और सीवेज का पानी रिसकर पीने वाले पानी में मिल जाता है. पुराने लोहे के पाइपों से लेड और जंग के कण पानी में घुल जाते हैं.
कई जगह जहां पानी बहुत गहराई से निकालकर पाइप लाइन से भेजा जाता है, उसमें कैल्शियम, मैग्नीशियम और फ्लोराइड जैसे मिनरल्स की मात्रा बहुत ज्यादा बढ़ गई है. साधारण फिल्टर इस खारेपन को कम नहीं कर पाते.

हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत के कई हिस्सों में पानी में आर्सेनिक, यूरेनियम, और नाइट्रेट जैसे खतरनाक तत्व पाए गए हैं. ये तत्व उद्योगों के कचरे या खेती में इस्तेमाल होने वाले कीटनाशकों से पानी में मिलते हैं.

नदियों और झीलों में बिना साफ किया हुआ कचरा और फैक्ट्रियों का केमिकल गिराया जाता है. म्युनिसिपल प्लांट्स अक्सर पानी से बैक्टीरिया तो मार देते हैं, लेकिन घुले हुए रसायनों को पूरी तरह साफ नहीं कर पाते.

सवाल – क्या ट्रीटमेंट प्लांट्स पानी को पूरी तरह साफ नहीं कर पा रहे हैं?

– ये स्थिति शहरों में लगे उन वाटर ट्रीटमेंट प्लांट्स की है, जो पुरानी तकनीक पर चल रहे हैं, ये भारी धातुओं या सूक्ष्म रसायनों को पूरी तरह साफ नहीं कर पाते.

सवाल – बड़े पैमाने पर घरों में लोग आरओ क्यों लगा रहे हैं क्या उनसे पानी बेहतर मिलने लगता है?

– म्युनिसिपल सप्लाई की पाइपलाइनों के पुराने और जर्जर होने के कारण लोगों को नल के पानी पर भरोसा नहीं रहा, इसलिए वे खुद की सुरक्षा के लिए आरओ को एक बीमा की तरह देखने लगे हैं. बड़े पैमाने पर लोगों द्वारा आरओ यानि रिजर्व ओस्मोसिस लगाने के पीछे ठोस वजहें तो हैं लेकिन क्या यह हमेशा पानी को “बेहतर” बनाता है. ये जरूर बहस का विषय है.

भारत के कई हिस्सों में भूजल में आर्सेनिक, लेड, फ्लोराइड और नाइट्रेट जैसे जहरीले तत्व पाए जाते हैं. साधारण फिल्टर इन्हें नहीं हटा सकते, लेकिन आरओ की ‘सेमी-परमेबल मेंब्रेन’ 99फीसदी तक भारी धातुओं को छान देती है. खारे पानी यानि ऊंचे टीडीएस वाले पानी को पीने योग्य और मीठा बनाने के लिए आरओ सबसे प्रभावी तकनीक है. यह पानी के स्वाद को बेहतर बनाता है. ये सूक्ष्म बैक्टीरिया, वायरस और सिस्ट को पूरी तरह खत्म कर देता है, जिससे टाइफाइड, हैजा और पेचिश जैसी बीमारियों का खतरा न्यूनतम हो जाता है.

सवाल – क्या नल में आया पानी उबालने से बेहतर नहीं हो जाता?

– साधारण उबालने या कैंडल फिल्टर से नल के जरिए आए पेयजल के अनफिल्टर्ड जहरीले तत्व खत्म नहीं होते, इनके लिए RO की मेंब्रेन तकनीक जरूरी हो जाती है.

सवाल – क्या RO का पानी हमेशा सही है?

– विशेषज्ञों और WHO की रिपोर्ट्स के अनुसार, RO पानी को इतना ज्यादा साफ कर देता है कि वह शरीर के लिए जरूरी मिनरल्स जैसे कैल्शियम और पोटैशियम को भी निकाल देता है. इसलिए एक्सपर्ट ये भी सुझाव देते हैं कि अगर आपके यहां आ रहे पानी में टीडीएस 300-500 से कम है तो आपको शायद RO की जरूरत नहीं है, एक साधारण UV फिल्टर भी काम कर सकता है. वैसे आजकल कई RO मशीनों में ‘मिनिरल कंट्रोलर’ या ‘MTDS’ बटन होता है, जिससे पानी में मिनरल्स को संतुलित रख सकते हैं.

सवाल – क्या ऐसी कोई रिपोर्ट के आंकड़ें हैं कि महानगरों में कितने लोग आरओ या वाटर प्युरीफायर अपना रहे हैं?

– 2024-25 की एक रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में भी लगभग 60% से अधिक आबादी अब किसी न किसी प्रकार के वाटर प्यूरीफायर पर निर्भर है.

सवाल – भारत में किस शहर के नल में आया पानी बिल्कुल शुद्ध है, जिसको सीधे पीया जा सकता है?

– भारत में पुरी ऐसा पहला शहर है जिसने सीधे नल से पीने लायक पानी की आपूर्ति शुरू की है. यहां नल का पानी भारतीय मानकों को पूरा करता है. यहां लोगों को अब RO या वॉटर फिल्टर की जरूरत नहीं पड़ती. यहां के हर घर और सार्वजनिक स्थानों पर लगे नलों से 24 घंटे पीने योग्य शुद्ध पानी उपलब्ध रहता है.
पुरी की सफलता के बाद ओडिशा के अन्य शहरों जैसे भुवनेश्वर और कटक में भी इस मिशन को तेजी से लागू किया गया है. BIS यानि भारतीय मानक ब्यूरो की पिछली रिपोर्टों और 2025 के डेटा के अनुसार, कुछ अन्य शहरों ने भी नल के पानी की शुद्धता में उच्च स्कोर हासिल किया है
– मुंबई नगर निगम द्वारा आपूर्ति किया जाने वाला पानी पारंपरिक रूप से भारत के महानगरों में सबसे सुरक्षित माना जाता रहा है.
– मिजोरम और सिक्किम में प्राकृतिक स्रोतों और कम औद्योगीकरण के कारण नल के पानी की गुणवत्ता सबसे अधिक (90+ स्कोर) पाई गई.
– केरल और गोवा ने भी ‘हर घर जल’ मिशन के तहत पानी की शुद्धता बनाए रखने में बेहतरीन निवेश किया है.

सवाल – ‘ड्रिंक फ्रॉम टैप’ का क्या मतलब है, जो सुविधा पुरी के नलों में है?

– इस मिशन के तहत नलों से मिलने वाले पानी में क्लोरीनीकरण और ओजोनीकरण होता है यानि बैक्टीरिया और वायरस को मारने के लिए उन्नत तकनीकों का उपयोग किया जाता है. पानी की गुणवत्ता की रियल-टाइम जांच के लिए सेंसर लगे होते हैं. बाहरी गंदगी को अंदर आने से रोकने के लिए हाई-प्रेशर पाइपलाइन सिस्टम का उपयोग होता है.

सवाल – क्या भारत की कोई नदी ऐसी है जिसका पानी सीधे पीने लायक है?

– वैज्ञानिक ऐसी स्थिति को नदी का क्लास ए पानी कहते हैं, वही “सीधे पीने लायक” होता है.
– मेघालय की उमंगोट नदी को भारत की ही नहीं, बल्कि एशिया की सबसे स्वच्छ नदियों में गिना जाता है. इसका पानी इतना पारदर्शी है कि नाव चलाने पर ऐसा लगता है जैसे वह हवा में तैर रही हो. स्थानीय लोग और पर्यटक कई जगहों पर इसका पानी सीधे इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि यहां प्रदूषण न के बराबर है.

– मध्य प्रदेश और राजस्थान की चंबल नदी देश की उन चुनिंदा बड़ी नदियों में है जो काफी हद तक प्रदूषण मुक्त है. इसे गंदा नहीं किया गया है.
– सिक्किम में तीस्ता नदी का ऊपरी बहाव क्षेत्र बहुत ही स्वच्छ है. ग्लेशियर से निकलने के कारण और पहाड़ी इलाकों में आबादी कम होने की वजह से लाचेन और लाचुंग जैसे क्षेत्रों में इसका पानी बेहद शुद्ध रहता है.

– ऋषिकेश और गंगोत्री के बीच गंगा नदी का पानी भी ऐसा है, जो बहुत साफ है और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से क्लास ए पानी है. उत्तराखंड के ऊपरी हिस्सों गंगोत्री, हर्षिल और देवप्रयाग में गंगा का पानी अब भी बहुत शुद्ध है. रिपोर्टों में अक्सर ऋषिकेश से ऊपर के गंगा के पानी को ‘क्लास ए’ या ‘क्लास बी’ श्रेणी में रखा जाता है, जो ट्रीटमेंट के बाद या सीधे पीने के लिए सबसे सुरक्षित माना जाता है.हालांकि उसके बाद गंगा का पानी प्रदूषित होता जाता है और पीने लायक नहीं रहता.

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