गुड़, आटा, चावल, बेसन से बनती है यह देसी बिहारी मिठाई, मूंगफली की तरह खाते हैं लोग, कहते टाइमपास, नाम है
भोजपुर. बिहार की मिट्टी में स्वाद भी बसता है और परंपरा भी. इन्हीं परंपरागत स्वादों में से एक है गुड़ से बना लकठो, जिसे लोग प्यार से बिहार का देसी टाइमपास भी कहते हैं, तो कोई इसे गुड़ की मिठाई के नाम से जानता है. शाहाबाद क्षेत्र के चारों जिले भोजपुर, रोहतास, बक्सर और कैमूर, साथ ही पटना में लकठो कभी बेहद लोकप्रिय रहा है. एक समय ऐसा भी था जब भोजपुर जिले से बनकर लकठो बिहार के अलग-अलग इलाकों में सप्लाई किया जाता था. मेलों, हाट-बाजारों और गांव की गलियों में लकठो बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक की पहली पसंद हुआ करता था, आज भी है.
गुड़ का खास स्वाद
गुड़ की खुशबू, हाथ से बने लकठो के टुकड़े और पुराने दिनों की यादें. लकठो न सिर्फ मिठास देता है, बल्कि बचपन की यादों को भी ताजा कर देता है. हालांकि समय के साथ बाजार में चॉकलेट, टॉफी और पैकेट वाले स्नैक्स आ गए, जिससे लकठो का क्रेज पहले जैसा नहीं रहा, लेकिन आज भी सच्चाई यही है कि लकठो बिहार की एक पारंपरिक देसी मिठाई है, जिसे खासकर शाहाबाद क्षेत्र में गुड़ से बनाया जाता है.
गुड़ ना लगे कढ़ाही में, इसका रखा जाता ध्यान
इसका स्वाद जितना सरल होता है, बनाने की प्रक्रिया उतनी ही मेहनत भरी और पारंपरिक होती है. लकठो बनाने के लिए सबसे पहले शुद्ध देसी गुड़ लिया जाता है और उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़कर कढ़ाही में डाला जाता है. इसमें थोड़ा पानी मिलाकर धीमी आंच पर गरम किया जाता है, ताकि गुड़ पूरी तरह पिघल जाए. इस दौरान कढ़ाही को लगातार चलाया जाता है, जिससे गुड़ तले में न लगे. गुड़ बनाने के पहले बेसन, आटा, चावल से आटा गूंथा जाता है और एक सांचे से छोटे टुकड़े काटकर तेल की कढ़ाही में तला जाता है. नमक पारे जैसे शेप के ये लकठो फिर गुड़ की चाशनी में डाले जाते हैं.
ऐसे साफ होती है गंदगी
जब गुड़ उबलने लगता है, तो उसके ऊपर झाग और मैल आने लगता है. इस गंदगी को हटाने के लिए इसमें थोड़ा नींबू का रस या फिटकरी का हल्का पानी डाला जाता है. इसके बाद ऊपर आई गंदगी को सावधानी से निकाल दिया जाता है. यह प्रक्रिया लकठो को साफ, चमकदार और स्वाद में बेहतर बनाती है.
मैल हटने के बाद गुड़ की चाशनी को तेज आंच पर पकाया जाता है और लगातार चलाया जाता है, ताकि वह गाढ़ी होती जाए. सही अवस्था की पहचान यह होती है कि चाशनी कढ़ाही छोड़ने लगे और ठंडे पानी में डालने पर तुरंत सख्त होकर टूट जाए.
ठंडा होने पर काटा जाता है
चाशनी तैयार होने के बाद कढ़ाही को आंच से उतार लिया जाता है. पहले से घी लगी हुई थाली या पत्थर की स्लैब पर गर्म चाशनी को फैलाया जाता है और कुछ देर ठंडा होने दिया जाता है. जब चाशनी हाथ लगाने लायक हो जाती है, तब हाथों में थोड़ा घी लगाकर इसे लंबे, पतले या चौकोर टुकड़ों में काटा जाता है या खींचकर आकार दिया जाता है. पूरी तरह ठंडा होने पर यह सख्त, कुरकुरा और चमकदार हो जाता है. यही गुड़ से बना पारंपरिक लकठो है, जो न सिर्फ एक मिठाई है, बल्कि बिहार की लोक-संस्कृति और देसी स्वाद की पहचान भी है.
जिसने एक बार लकठो खा लिया, उसका स्वाद कभी नहीं भूलता. आज भी गांव-कस्बों में कुछ कारीगर परंपरागत तरीके से लकठो बना रहे हैं. सीमित मात्रा में सही, लेकिन लोगों की पसंद में लकठो अब भी शामिल है. यह सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि बिहार की लोक-संस्कृति और देसी पहचान का स्वाद है. जरूरत है तो बस इसे फिर से पहचान देने की, ताकि आने वाली पीढ़ी भी जान सके कि बिहार का असली टाइमपास क्या होता है.