कौन है 25 साल का यह गेंदबाज, जिसने रोहित शर्मा को पहली गेंद पर भेजा पवेलियन, पिता बेचते हैं दूध

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बागेश्वर: उत्तराखंड के बागेश्वर जिले से निकलकर राष्ट्रीय क्रिकेट में अपनी जगह बनाने वाले तेज गेंदबाज देवेन्द्र सिंह बोरा आज राज्य के उभरते सितारों में से एक हैं. 6 दिसंबर 2000 को जन्मे देवेन्द्र ने सीमित संसाधनों, कठिन परिस्थितियों और पहाड़ी चुनौतियों के बीच क्रिकेट के सपने को साकार किया है. दिसंबर 2025 तक घरेलू क्रिकेट में उनके शानदार प्रदर्शन ने न सिर्फ उत्तराखंड, बल्कि पूरे क्रिकेट जगत का ध्यान उनकी ओर खींचा है.

देवेन्द्र बोरा ने विजय हजारे ट्रॉफी 2025-26 के दौरान एक ऐसा कारनामा कर दिखाया, जिससे वे सुर्खियों में आ गए. उन्होंने भारतीय टीम के दिग्गज बल्लेबाज रोहित शर्मा को उनकी पारी की पहली ही गेंद पर ‘गोल्डन डक’ पर आउट कर सभी को चौंका दिया. यह विकेट उनके करियर का बड़ा मील का पत्थर माना जा रहा है, जिसने उनकी प्रतिभा और आत्मविश्वास को साबित किया.

ऐसा रहा सक्सेस रेट

घरेलू क्रिकेट में देवेन्द्र का प्रदर्शन लगातार प्रभावशाली रहा है. उन्होंने अब तक 15 प्रथम श्रेणी (रणजी ट्रॉफी) मैच खेले हैं, जिनमें 30 विकेट अपने नाम किए हैं. उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन बंगाल के खिलाफ रहा, जहां उन्होंने 79 रन देकर 6 विकेट झटके. 19 जनवरी 2024 को पुडुचेरी के खिलाफ उन्होंने अपना प्रथम श्रेणी पदार्पण किया था, तब से वह चयनकर्ताओं की नजर में बने हुए थे.

उत्तराखंड प्रीमियर लीग (UPL) में ‘देहरादून वॉरियर्स’ के लिए खेलते हुए भी देवेन्द्र ने शानदार छाप छोड़ी थी. उन्होंने 6 मैचों में 10 विकेट लेकर अपनी उपयोगिता साबित की, जिसके बाद उन्हें राज्य की सीनियर टीम में जगह मिली. दाएं हाथ के मध्यम गति के गेंदबाज देवेन्द्र अपनी सटीक लाइन-लेंथ और अनुशासित गेंदबाजी के लिए जाने जाते हैं.

दिन में नौकरी, रात में अभ्यास

शनिवार को जब लोकल 18 की टीम उनके गांव छतीना (बागेश्वर) पहुंची, तो घर में खुशी का माहौल देखने को मिला. घर में मौजूद माता-पिता और पत्नी ने एक-दूसरे को मिठाई खिलाकर अपनी खुशी जाहिर की. देवेन्द्र की मां नीमा बोरा ने बताया कि बचपन से ही उन्हें क्रिकेट खेलने का जुनून था. एक समय ऐसा भी आया जब देवेन्द्र दिन में नौकरी करते और रात में क्रिकेट का अभ्यास करते थे.

इस दौरान बागेश्वर के क्रिकेट कोच हैरी कर्म्याल ने उन्हें भरपूर सहयोग दिया. वो बताती हैं कि एक बार देवेंद्र ने नौ हजार का जूता खरीदने की बात की थी, लेकिन मां ने कहा कि बेटा इसमें तो हमारा पूरे महीने का खर्चा चल जाएगा. अपनी तैयारी के लिए उन्होंने घर से आर्थिक रूप से कोई मदद नहीं ली. उन्होंने खुद से संघर्ष कर आज इस मुकाम को हासिल किया है.

पिता बेचते थे दूध

पिता बलवंत सिंह बोरा ने बताया कि हमारे गांव में आज भी सड़क की सुविधा नहीं है. देवेन्द्र रोज सुबह तीन से चार बजे उठकर करीब तीन से छह किलोमीटर पैदल चलकर मैदान तक जाता था. परिवार की आजीविका के लिए मैं मेहनत-मजदूरी करता था और गाय का दूध बेचता था. भाई संदीप बोरा भी निजी नौकरी करते हैं. देवेन्द्र की पत्नी हेमा बोरा ने कहा कि वह बेहद मेहनती हैं और आज उन पर गर्व है. परिवार को विश्वास है कि देवेन्द्र आगे चलकर उत्तराखंड और देश का नाम और ऊंचा करेंगे. जीवन की इतनी कठिनाईयों के बावजूद भी देवेंद्र ने कभी हार नहीं मानी, वे लगातार संघर्ष करते रहे.

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