साल 2025: देश की बेटियों के लिए उगा उम्मीद का सूरज | – News in Hindi
‘यह छोटे मुंह बड़ी बात होगी लेकिन मैं अगले एक साल में मैं भारत के एक लाख गांवों को बाल विवाह मुक्त बनाने का वादा करता हूं.’ और 4 दिसंबर की उस दोपहर विज्ञान भवन में खचाखच भरा वो सभागार भुवन ऋभु के लिए तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. मंच पर उपस्थित थीं केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री अन्नपूर्णा देवी, राज्य मंत्री सावित्री ठाकुर और मंत्रालय के सचिव सहित पूरा अमला. और आयोजन था भारत सरकार के बाल विवाह मुक्त भारत अभियान के बेहद कामयाब एक साल पूरे होने पर.
एक लाख गांवों को एक साल में बाल विवाह मुक्त बनाने के वादे पर भुवन ऋभु के लिए बजी तालियां इस बात की गवाही थीं कि ये कोई हल्के में कही गई बात नहीं थी. लोगों को विश्वास था कि लक्ष्य कितना भी बड़ा हो, पूरा होकर रहेगा. बाल अधिकारों के लिए देश के सबसे मुखर पैरोकारों में से एक लेखक व अधिवक्ता भुवन ऋभु पिछले दो दशक से सड़क से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक बच्चों के हक की लड़ाई लड़ रहे हैं. देश में बाल अधिकारों की सुरक्षा व संरक्षण के लिए 250 से भी अधिक नागरिक समाज संगठनों के देश के सबसे नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (जेआरसी) के संस्थापक भुवन ऋभु अर्से से ‘चाइल्ड मैरेज फ्री इंडिया’ अभियान की अगुआई कर रहे हैं. यह बाल विवाह के खिलाफ देश का सबसे जमीनी अभियान है जो उनकी चर्चित किताब ‘व्हेन चिल्ड्रेन हैव चिल्ड्रेन : टिपिंग प्वाइंट टू इंड चाइल्ड मैरेज’ में सुझाई गई पिकेट रणनीति पर आधारित है. पिकेट रणनीति में नीति, निवेश, ज्ञान, तकनीक, संस्थानों के क्षमता निर्माण व एक ईको सिस्टम यानी वह परिवेश जहां बाल विवाह की संभावना ही समाप्त हो जाए, जैसे तत्व शामिल हैं. खास बात ये है कि देश के 450 से भी ज्यादा जिलों में चल रहे इस अभियान की कमान पूरी तरह स्थानीय व जमीनी महिला नेतृत्व के हाथ में है जो स्वयं बाल विवाह की भुक्तभोगी रही हैं.
महज एक साल में एक लाख से ज्यादा बाल विवाह जो रोके गए हैं, वह सरकार की 3 पी यानी प्रिवेंशन, प्रोटेक्शन एंड प्रासिक्यूशन यानी बचाव, सुरक्षा और अभियोजन की रणनीति का नतीजा है. लेकिन इस 3 पी की सफलता के पीछे सरकार व नागरिक समाज के एकजुट प्रयास हैं.
बाल विवाह मुक्त भारत
मंच से अन्नपूर्णा देवी ने कहा, ‘भारत को बाल विवाह मुक्त बनाने के लिए हम पूरी सरकार व समग्र समाज की नीति पर आगे बढ़ रहे हैं. इसमें आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, वन स्टॉप सेंटर्स, आशा कार्यकर्ताओं और नागरिक समाज संगठनों की भूमिका निर्णायक होने जा रही है. समुदायों और लाखों नागरिकों ने अपने समर्थन और समर्पण से इसे जन आंदोलन बनाया है और साबित किया है कि जब जनता का संकल्प और सरकार के प्रयास साथ आगे बढते हैं तो सदियों पुरानी कुरीतियों को मिटाया जा सकता है.’
इस अभियान की सफलता इसी में है. आज सरकार, समाज, न्यापालिका सभी साथ हैं. महज एक साल में एक लाख से ज्यादा बाल विवाह जो रोके गए हैं, वह सरकार की 3 पी यानी प्रिवेंशन, प्रोटेक्शन एंड प्रासिक्यूशन यानी बचाव, सुरक्षा और अभियोजन की रणनीति का नतीजा है. लेकिन इस 3 पी की सफलता के पीछे सरकार व नागरिक समाज के एकजुट प्रयास हैं. मंत्रालय की कुशल रणनीति है जो इस लड़ाई को स्कूलों, पंचायतों और उन घरों तक ले गई जिनके बच्चे वाकई बाल विवाह के खतरे में थे. सरकार के सहयोग से जेआरसी ने पढ़ाई छोड़ चुकी 6,30,000 लड़कियों का दोबारा स्कूलों में दाखिला कराया. हम सब जानते हैं कि हमारे गांवों और कस्बों में कोई बच्ची पढ़ाई छोड़ दे तो मां-बाप कहते हैं, घर बैठ के क्या करेगी…शादी कर देते हैं इसकी. ये बच्चियां बाल विवाह से सिर्फ इसलिए बच गईं कि ये दोबारा स्कूल में पहुंच गईं. जेआरसी के सहयोगी संगठनों के प्रयासों से सभी धर्मों के तीन लाख से ज्यादा पंडित, मौलवी, पादरी और ग्रंथी इस अभियान से जोड़े गए हैं.
आज बाल विवाह रोकने के लिए निषेधाज्ञाएं यानी इंजक्शन जारी किए जा रहे हैं, कानून तोड़ने वालों को जेल भेजा जा रहा है और पंडित व मौलवी बाल विवाह संपन्न कराने से इनकार कर रहे हैं. अब कानून पर अमल होने लगा है. देश में पहली बार 36,000 से ज्यादा बाल विवाह निषेध अधिकारी (सीएमपीओ) नियुक्त हुए हैं. जुवेनाइल एक्ट में संशोधन हुआ है.
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे का आंकड़ा
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे -5 (2019-21) के आंकड़ों के अनुसार देश में 20–24 आयु वर्ग की 23.3% युवतियों का 18 वर्ष से पहले ही विवाह हो जाता है. लेकिन सेंटर फॉर लीगल एक्शन एंड बिहैवियर चेंज फॉर चिल्ड्रेन (सी–लैब) की असम, बिहार, कर्नाटक, महाराष्ट्र और राजस्थान में किए गए हालिया सर्वे की रिपोर्ट ‘टिपिंग प्वाइंट टू जीरो: एविडेंस टुवार्ड्स ए चाइल्ड मैरेज फ्री इंडिया’ बताती है कि 2022 से 2025 के बीच 18 वर्ष से कम की लड़कियों के बाल विवाह में 69% गिरावट आई जबकि 21 वर्ष से कम आयु के लड़कों के विवाह में 72% की गिरावट आई है.
कानून पर अमल
यह सुप्रीम कोर्ट के फैसले, सरकार के संकल्प और जेआरसी जैसे नागरिक समाज संगठनों की अथक मेहनत से संभव हुआ है. आज बाल विवाह रोकने के लिए निषेधाज्ञाएं यानी इंजक्शन जारी किए जा रहे हैं, कानून तोड़ने वालों को जेल भेजा जा रहा है और पंडित व मौलवी बाल विवाह संपन्न कराने से इनकार कर रहे हैं. अब कानून पर अमल होने लगा है. देश में पहली बार 36,000 से ज्यादा बाल विवाह निषेध अधिकारी (सीएमपीओ) नियुक्त हुए हैं. जुवेनाइल एक्ट में संशोधन हुआ है.
यह नया भारत है जिसमें आज कोई बेटी जब आवाज उठाती है तो वो अकेली नहीं होती. एक शिक्षक या एक धर्मगुरु, एक पुलिस अफसर या एक सीएमपीओ और एक सामुदायिक कार्यकर्ता उसके साथ खड़ा होता है. कोई भी बच्ची अकेले बाल विवाह की बेड़ियों से आजाद नहीं हो सकती. वह आजाद होती है क्योंकि भारत उसके साथ खड़ा है. देश को सदियों से इस पल की प्रतीक्षा थी. आज वह हमारे सामने है.