कभी चखा लहसुन की पत्तियों का नमक? रूखे-सूखे खाने को बना देगा लजीज, खुशबूदार और सबसे अलग – Uttarakhand News
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Garlic leaf salt recipe : रसोई में इस्तेमाल होने वाला सामान्य नमक अगर स्वादहीन लगने लगे, तो लहसुन के पत्तों से तैयार यह खास नमक एक बेहतरीन विकल्प बन सकता है. आज भी पहाड़ों के ग्रामीण इलाकों में इसे सहेजकर रखा जाता है और खास मेहमानों के सामने परोसा जाता है. यह नमक दाल, सब्जी, रायता, फल, सलाद और पराठों पर डालते ही स्वाद बदल देता है. लोग इसे एक बार खाओ, बार-बार मांगों वाला नमक कहते हैं.

बागेश्वर समेत कुमाऊं के पहाड़ी इलाकों में लहसुन के पत्तों से बना नमक सदियों से रसोई का अहम हिस्सा रहा है. यह केवल स्वाद बढ़ाने वाला मसाला नहीं, बल्कि स्थानीय खानपान और जीवनशैली से गहराई से जुड़ा है. पुराने समय में जब बाजार के मसाले आसानी से उपलब्ध नहीं होते थे, तब लोग अपने खेतों और आंगन में उगने वाली चीजों से ही स्वाद तैयार करते थे. लहसुन के हरे पत्ते, नमक और मिर्च मिलाकर बनाया गया यह नमक दाल-भात से लेकर सादी रोटी तक को खास बना देता है.

इस नमक की सबसे बड़ी खासियत इसकी सरलता है. इसे बनाने के लिए किसी महंगे मसाले या जटिल विधि की जरूरत नहीं होती. लहसुन के ताजे पत्ते, सामान्य नमक और हरी मिर्च बस यही तीन सामग्री काफी हैं. पहले पत्तों को साफ कर हल्का सुखाया जाता है ताकि नमी निकल जाए. इसके बाद सिलबट्टे या मिक्सर में इन्हें नमक और मिर्च के साथ पीसा जाता है. तैयार मिश्रण को धूप में सुखाकर लंबे समय तक इस्तेमाल किया जा सकता है. यही सरल प्रक्रिया इसे हर घर की पहुंच में लाती है और पहाड़ी रसोई की पहचान बनाती है.

जो लोग एक बार लहसुन पत्ते का नमक चख लेते हैं, उन्हें साधारण नमक फीका लगने लगता है. इसमें लहसुन की हल्की तीखापन, मिर्च की चटपटाहट और नमक का संतुलन ऐसा बनता है कि हर निवाला खास हो जाता है. यह नमक दाल, सब्जी, रायता, फल, सलाद और पराठों पर डालते ही स्वाद बदल देता है. खासतौर पर पहाड़ी मडुए की रोटी या झंगोरे के भात के साथ इसका स्वाद और भी निखर जाता है. यही वजह है कि लोग इसे एक बार खाओ, बार-बार मांगो वाला नमक कहते हैं.
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यह नमक केवल स्वाद तक सीमित नहीं है, बल्कि सेहत के लिए भी लाभकारी माना जाता है. आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. ऐजल पटेल बताते हैं कि लहसुन के पत्तों में पाचन सुधारने वाले तत्व पाए जाते हैं. यह गैस, अपच और भूख न लगने जैसी समस्याओं में मदद करता है. लहसुन रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक होता है. सर्दी-जुकाम के मौसम में इसका सेवन शरीर को गर्माहट देता है. यही कारण है कि पहाड़ों में इसे औषधीय मसाले के रूप में भी देखा जाता है और रोजमर्रा के भोजन में शामिल किया जाता है.

आज के समय में भले ही बाजार में कई तरह के फ्लेवर्ड नमक उपलब्ध हों, लेकिन लहसुन पत्ते का नमक अपनी अलग पहचान बनाए हुए है. शहरों में रहने वाले पहाड़ी लोग भी इसे अपने साथ ले जाते हैं. आधुनिक रसोई में इसे सलाद, फ्रूट चाट और स्नैक्स पर छिड़ककर इस्तेमाल किया जा रहा है. कई लोग इसे हेल्दी विकल्प मानते हैं क्योंकि इसमें कोई केमिकल या प्रिजर्वेटिव नहीं होता. पारंपरिक स्वाद और प्राकृतिक सामग्री का मेल इसे आज की लाइफस्टाइल में भी खास बना रहा है.

इस नमक को तैयार करने में पहाड़ी महिलाओं की अहम भूमिका रहती है. खेतों से लहसुन के पत्ते तोड़ना, उन्हें साफ करना, सुखाना और पीसना यह सब काम महिलाएं ही करती हैं. यह हुनर पीढ़ी दर पीढ़ी चलता आ रहा है. कई गांवों में महिलाएं इसे बनाकर स्थानीय हाट-बाजार में भी बेच रही हैं, जिससे उन्हें अतिरिक्त आमदनी हो रही है. इस तरह लहसुन पत्ते का नमक स्वाद के साथ-साथ आत्मनिर्भरता का भी प्रतीक बन रहा है.

लहसुन के पत्तों का नमक केवल एक मसाला नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति का हिस्सा है. शादी-ब्याह, त्योहार या सामूहिक भोज में इसे खास तौर पर परोसा जाता है. यह पहाड़ी खानपान की सादगी और प्रकृति से जुड़ेपन को दर्शाता है. जब लोग शहरों से गांव लौटते हैं, तो इस नमक का स्वाद उन्हें बचपन और मिट्टी की याद दिला देता है. यही भावनात्मक जुड़ाव इसे साधारण मसाले से कहीं ऊपर ले जाता है.

अगर इसे सही तरीके से पैकिंग और ब्रांडिंग के साथ बाजार में उतारा जाए, तो लहसुन पत्ते का नमक एक बेहतरीन लोकल प्रोडक्ट बन सकता है. इससे न केवल पहाड़ी स्वाद को पहचान मिलेगी, बल्कि स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिलेगा. आज जब लोग ऑर्गेनिक और देसी उत्पादों की ओर लौट रहे हैं, तब यह नमक बड़ी संभावनाएं रखता है. स्वाद, सेहत और परंपरा तीनों का संगम इसे खास बनाता है और भविष्य में बागेश्वर की पहचान भी बन सकता है.