‘सामग्री तैयार है, आगे बढ़िए’, नरसिम्हा राव की वो सलाह और वाजपेयी का ‘अटल’ फैसला, जिसने हिला दी थी पूरी दुनिया
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Atal Bihari Vajpayee Birthday Special: 11 मई 1998 को राजस्थान के पोखरण में हुए परमाणु परीक्षण ने भारत को दुनिया के शक्तिशाली देशों की कतार में खड़ा कर दिया. तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में ऑपरेशन शक्ति को इतनी गोपनीयता से अंजाम दिया गया कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए (CIA) को भनक तक नहीं लगी. डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और उनकी टीम ने सेना की वर्दी पहनकर दुनिया की नजरों में धूल झोंकी। इस ऐतिहासिक कदम ने भारत को सामरिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया और पूरी दुनिया को कड़ा संदेश दिया कि भारत अपनी संप्रभुता से समझौता नहीं करेगा.
भारत को अटल ने परमाणु शक्ति बनाया. नई दिल्ली. तारीख थी 11 मई 1998. घड़ी में दोपहर के ठीक 3 बजकर 45 मिनट हुए थे. राजस्थान के पोखरण की तपती रेत के नीचे एक ऐसी हलचल हुई जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया. यह सिर्फ एक धमाका नहीं था बल्कि भारत के सोए हुए स्वाभिमान की ललकार थी. प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भारत ने वह कर दिखाया था जिसके बारे में सोचने से भी पिछली सरकारें डरती थीं. अमेरिका और उसकी खुफिया एजेंसियां आसमान से नजर गड़ाए बैठी थीं लेकिन भारत ने उनकी नाक के नीचे परमाणु परीक्षण कर डाला. यह घटना सिर्फ एक वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं थी बल्कि भारत की सामरिक आत्मनिर्भरता का ऐलान थी.
वाजपेयी का वो ‘कठिन’ फैसला जिसने बदल दी देश की तकदीर
25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर में जन्मे अटल बिहारी वाजपेयी को उनके कड़े फैसलों के लिए याद किया जाता है. 1998 का परमाणु परीक्षण कोई साधारण फैसला नहीं था. उस वक्त भारत पर दुनिया भर की नजरें थीं. ‘न्यूक्लियर हब’ माने जाने वाले देश नहीं चाहते थे कि भारत परमाणु शक्ति बने. दबाव बहुत ज्यादा था. आलोचना का डर था. प्रतिबंधों का खतरा था. लेकिन वाजपेयी ने इन सब की परवाह किए बिना भविष्य को चुना. यह परीक्षण भारत के आत्मसम्मान और संप्रभुता की घोषणा थी. वाजपेयी जानते थे कि अगर भारत को सुरक्षित रहना है, तो उसे शक्तिशाली बनना ही होगा.
जब नरसिम्हा राव ने वाजपेयी से कहा- ‘सामग्री तैयार है, आप आगे बढ़ें’
इस ऐतिहासिक घटना के पीछे एक दिलचस्प किस्सा भी है. 1998 में जब वाजपेयी सत्ता में लौटे तो उनकी सरकार 13 पार्टियों के गठबंधन से बनी थी. शपथ ग्रहण के कुछ ही दिनों बाद पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव उनसे मिलने आए. राव ने वाजपेयी से कहा, “सामग्री तैयार है, आप आगे बढ़ सकते हैं.” यह इशारा परमाणु बम की तैयारी की ओर था. वाजपेयी ने एक पल की भी देरी नहीं की. उन्होंने तुरंत डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और डॉ. आर. चिदंबरम को बुलाया और तैयारी शुरू करने का निर्देश दे दिया. वाजपेयी को अपनी पिछली 13 दिनों की सरकार के अनुभव से पता था कि समय बहुत कीमती है.
कलाम बने ‘मेजर पृथ्वीराज’, सेना की वर्दी में वैज्ञानिकों ने दिया चकमा
इस मिशन को ‘ऑपरेशन शक्ति’ नाम दिया गया था. सबसे बड़ी चुनौती थी अमेरिकी जासूसी उपग्रहों (Spy Satellites) से बचना. इसके लिए गजब की रणनीति बनाई गई. वैज्ञानिक कभी भी एक साथ सफर नहीं करते थे. डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और उनकी टीम ने मिलिट्री की वर्दी पहनी ताकि किसी को शक न हो. उन्हें कोड नेम दिए गए. कलाम का कोड नेम ‘मेजर जनरल पृथ्वीराज’ था, जबकि डॉ. चिदंबरम ‘नटराज’ बने थे.
निर्माण का सारा काम रात के अंधेरे में होता था. जैसे ही सुबह होती, सब कुछ ऐसे ढक दिया जाता था जैसे वहां कुछ हुआ ही नहीं. भारतीय सेना की 58वीं इंजीनियर्स रेजिमेंट ने इसमें पूरा साथ दिया. यह चूहे-बिल्ली का खेल था जिसमें भारत जीत गया.
बुद्ध पूर्णिमा का दिन और दुनिया को मिला कड़ा संदेश
डॉ. कलाम ने ही सलाह दी थी कि परीक्षण के लिए ‘बुद्ध पूर्णिमा’ का दिन चुना जाए. 11 मई 1998 को वही दिन था. डॉ. कलाम ने एक इंटरव्यू में बताया था कि दबाव बहुत था, लेकिन वाजपेयी जी ने फैसला ले लिया था. दोपहर 3.45 बजे जैसे ही पहला धमाका हुआ, भारत ने दुनिया को बता दिया कि अब वह किसी पर निर्भर नहीं है. इस परीक्षण ने भारत को ‘न्यूक्लियर डिटरेंस’ दिया. इसका मतलब था कि अब कोई भी दुश्मन भारत की तरफ आंख उठाने से पहले सौ बार सोचेगा. यह वाजपेयी की दूरदर्शिता ही थी जिसने भारत को कमजोर राष्ट्र की छवि से बाहर निकालकर एक ग्लोबल पावर बना दिया.
क्या है ‘ऑपरेशन शक्ति’ का महत्व?
1974 में इंदिरा गांधी के समय हुए पहले परमाणु परीक्षण को ‘स्माइलिंग बुद्धा’ नाम दिया गया था. लेकिन 1998 का ‘ऑपरेशन शक्ति’ अलग था क्योंकि इसने भारत को पूरी तरह से हथियार संपन्न राष्ट्र (Weapon State) बना दिया. इसके बाद भारत ने पांच धमाके किए थे. इसी दिन की याद में भारत हर साल 11 मई को ‘राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस’ (National Technology Day) मनाता है. यह दिन भारतीय विज्ञान और राजनीतिक इच्छाशक्ति की जीत का प्रतीक है.
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पत्रकारिता में 14 साल से भी लंबे वक्त से सक्रिय हूं. साल 2010 में दैनिक भास्कर अखबार से करियर की शुरुआत करने के बाद नई दुनिया, दैनिक जागरण और पंजाब केसरी में एक रिपोर्टर के तौर पर काम किया. इस दौरान क्राइम और…और पढ़ें