Aravali Hills News | Aravalli Range Mining Ban | अरावली पर्वत श्रेणी बचाने को मोदी सरकार का बड़ा एक्शन, नई माइनिंग पर लगाया टोटल बैन, मगर कांग्रेस ने उठाए सवाल | Aravalli News: Complete Ban Of New Mining Leases In The Mountains, Govt Decision

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नई दिल्ली: न्यूज़18 इंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट का एक बार फिर बड़ा असर हुआ है. अरावली की पहाड़ियों को छलनी करने वालों पर केंद्र सरकार ने हंटर चला दिया है. सरकार ने पूरी अरावली रेंज में नए माइनिंग लीज (Mining Lease) देने पर ‘कंप्लीट बैन’ लगा दिया है. यह आदेश अवैध खनन और माफिया राज पर अब तक का सबसे कड़ा प्रहार है. पर्यावरण मंत्रालय ने राज्य सरकारों को दो टूक कह दिया है. अब अरावली के किसी भी हिस्से में खनन की नई मंजूरी नहीं मिलेगी. यह नियम पूरे लैंडस्केप पर समान रूप से लागू होगा. इसका मकसद अनियंत्रित खुदाई को हमेशा के लिए खत्म करना है. सरकार ने साफ कर दिया है कि पर्यावरण और गिरते जलस्तर से कोई समझौता नहीं होगा. न्यूज18 इंडिया ने लगातार दिखाया था कि कैसे अरावली को अवैध रूप से खोदा जा रहा है. इस रिपोर्ट के बाद सरकार ने यह ऐतिहासिक कदम उठाया है. अब अरावली में खनन माफिया के लिए ‘नए खेल’ की कोई गुंजाइश नहीं बची है.

इस फैसले के बीच राजनीति भी गरमा गई है. कांग्रेस ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं. पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने आरोप लगाया है कि सरकार अरावली की ‘परिभाषा’ बदलकर लोगों को गुमराह कर रही है. एक तरफ सरकार माइनिंग रोक रही है, तो दूसरी तरफ विपक्ष का कहना है कि सरकार की नीतियां ही स्पष्ट नहीं हैं.

केंद्र का फरमान: अब अरावली में नहीं होगी नई खुदाई, राज्यों को सख्त निर्देश

केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) ने सभी संबंधित राज्यों को निर्देश जारी कर दिए हैं. आदेश के मुताबिक, अरावली के पूरे लैंडस्केप में किसी भी नए खनन पट्टे को मंजूरी नहीं दी जाएगी.

इसका मकसद अरावली को एक ‘निरंतर भूवैज्ञानिक रिज’ (Continuous Geological Ridge) के रूप में बचाना है. सरकार चाहती है कि दिल्ली-एनसीआर से गुजरात तक फैली यह पर्वत श्रृंखला टूटे नहीं. अवैध और अनियंत्रित खनन ने इसे काफी नुकसान पहुंचाया है.

सरकार ने साफ किया है कि यह प्रतिबंध पूरे अरावली क्षेत्र पर समान रूप से लागू होगा. यानी अब पहाड़ों को चीरकर नए खदान बनाने की इजाजत नहीं मिलेगी.

वैज्ञानिक बनाएंगे प्लान, तय होंगे ‘नो-गो जोन’

  • सिर्फ प्रतिबंध ही नहीं, मंत्रालय ने ‘इंडियन काउंसिल ऑफ फॉरेस्ट्री रिसर्च एंड एजुकेशन’ (ICFRE) को एक बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है. ICFRE को पूरे अरावली क्षेत्र में ऐसे अतिरिक्त इलाकों की पहचान करनी होगी जहां खनन पूरी तरह वर्जित (Prohibited) होना चाहिए.
  • यह काम इकोलॉजी और जियोलॉजी को ध्यान में रखकर किया जाएगा. ICFRE एक व्यापक और विज्ञान पर आधारित ‘सस्टेनेबल माइनिंग मैनेजमेंट प्लान’ (MPSM) तैयार करेगा.
  • इस प्लान में यह देखा जाएगा कि पर्यावरण कितना बोझ झेल सकता है. संवेदनशील इलाकों की पहचान की जाएगी. खास बात यह है कि इस प्लान को जनता के सामने भी रखा जाएगा ताकि लोग अपनी राय दे सकें. इसका मकसद उन जगहों को बढ़ाना है जहां खनन बिल्कुल नहीं हो सकता.

पुराने खदानों का क्या होगा? क्या वे चलते रहेंगे?

सरकार ने फिलहाल चल रही खदानों को तुरंत बंद करने का आदेश नहीं दिया है, लेकिन उन पर लगाम कस दी है. आदेश में कहा गया है कि जो खदानें अभी ऑपरेशन में हैं, राज्य सरकारें वहां पर्यावरण के नियमों का सख्ती से पालन कराएंगी.

सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के मुताबिक ही काम होगा. मौजूदा माइनिंग एक्टिविटीज पर अतिरिक्त प्रतिबंध लगाए जाएंगे ताकि पर्यावरण को कम से कम नुकसान हो. सरकार का दावा है कि वह अरावली के इकोसिस्टम को बचाने के लिए प्रतिबद्ध है क्योंकि यह रेगिस्तान को बढ़ने से रोकता है और वाटर रिचार्ज में मदद करता है.

कांग्रेस का हमला: ‘मंत्री जी झूठ बोल रहे हैं, परिभाषा में ही खोट है’

सरकार के इस फैसले के बाद कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने मोर्चा खोल दिया है. उन्होंने पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव पर जनता को गुमराह करने का आरोप लगाया है.

जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा, ‘यह साफ हो गया है कि अरावली मुद्दे पर केंद्रीय मंत्री सच नहीं बता रहे हैं.’ उनका कहना है कि सरकार अरावली की परिभाषा (Definition) में जो बदलाव कर रही है, उसमें बड़ी खामियां हैं.

कांग्रेस का दावा है कि भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI), सुप्रीम कोर्ट की कमेटी और न्याय मित्र (Amicus Curiae) ने इस नई परिभाषा का विरोध किया था. फिर भी सरकार इसे क्यों थोप रही है?

भूपेंद्र यादव का पलटवार: सिर्फ 0.19% हिस्से में है माइनिंग

इससे पहले सोमवार को भूपेंद्र यादव ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज किया था. उन्होंने कहा था कि कांग्रेस ‘गलत सूचना’ फैला रही है. यादव ने तर्क दिया था कि अरावली पर्वत श्रृंखला के केवल 0.19 प्रतिशत हिस्से में ही कानूनी रूप से खनन हो रहा है.

उन्होंने कहा कि मोदी सरकार अरावली की सुरक्षा और उसे फिर से हरा-भरा करने के लिए पूरी तरह गंभीर है. सरकार का कहना है कि वह नियमों को आसान नहीं बल्कि सख्त कर रही है ताकि अवैध खनन को रोका जा सके.

विवाद की असली जड़ यह है कि ‘अरावली’ किसे माना जाए? विपक्ष का आरोप है कि सरकार परिभाषा बदलकर अरावली का दायरा कम कर रही है ताकि बाकी जगहों पर प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी जा सके, जबकि सरकार इसे संरक्षण की दिशा में उठाया गया कदम बता रही है.

क्यों जरूरी है अरावली?

अरावली पर्वत श्रृंखला को उत्तर-पश्चिम भारत का ‘फेफड़ा’ और ‘दीवार’ माना जाता है. यह थार रेगिस्तान को पूर्व की ओर (दिल्ली और उत्तर प्रदेश की तरफ) बढ़ने से रोकती है. यह भूजल (Groundwater) रिचार्ज करने में अहम भूमिका निभाती है और दिल्ली-एनसीआर को धूल भरी आंधियों से बचाती है. अगर अरावली खत्म हुई, तो दिल्ली और आसपास का इलाका रेगिस्तान में बदल सकता है.

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