बड़े भाई ने खोली नाई की दुकान, छोटे भाई ने किया बॉलीवुड पर राज, एक झटके में बदल गई थी पूरे परिवार की जिंदगी
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Mohammed Rafi Untold Story: आज से 101 साल पहले यानी 24 दिसबंर 1924 को दिग्गज प्लेबैक सिंगर मोहम्मद रफी साहब का जन्म हुआ था. आज अगर वह जीवित होते तो वह 101 साल के होते, लेकिन 56 साल की आयु में साल 1980 में उनका निधन हो गया था. आज उनकी जयंती पर हम आपको रफी की जिंदगी से जुड़ी कुछ ऐसी बात बताने जा रहे हैं, जिससे शायद आप भी अनजान होंगे. रफी साहब ने अपने लगभग 40 साल के करियर में हजारों गाने गाए और कहा जाता है कि उनके द्वारा गाए गए गानों की संख्या 25,000 से भी अधिक है, जो खुद में ही एक बहुत बड़ा रिकॉर्ड है.

नई दिल्ली. आज की दौर में जब एक सिंगर उभरता है, तो दूसरा इंडस्ट्री से गायब होने लगता है, लेकिन मोहम्मद रफी एक ऐसे गायक थे जिन्होंने अपनी शानदार आवाज से बॉलीवुड में 50 से लेकर 70 के दशक तक राज किया. इस दौरान उन्होंने एक से बढ़कर एक गाने गाए, जिनमें से कुछ गाने तो आज भी लोगों के बीच काफी मशहूर हैं. रफी साहब द्वारा गाए गए कुछ गाने जो कालजयी साबित हुए. कहा जाता है कि उनकी आवाज में एक जादुई खूबी थी जो लोगों को मोह लेती थी.

आज हम आपको मोहब्बत रफी से जुड़ी कुछ ऐसी बातें बताने जा रहे हैं, जिससे आप भी अनजान होंगे. मोहम्मद रफी का जन्म 24 दिसंबर 1924 को अमृतसर के पास कोटला सुल्तान सिंह में हुआ था. आरंभिक स्कूली पढ़ाई कोटला सुल्तान सिंह में हुई. विकिपीडिया के अनुसार, जब मोहम्मद रफी करीब 7 साल के हुए तब उनका परिवार रोजगार के सिलसिले में लाहौर आ गया. इनके परिवार का संगीत से कोई खास सरोकार नहीं था. जब रफी छोटे थे तब इनके बड़े भाई की नाई की दुकान थी, रफी का काफी वक्त वहीं पर गुजरता था.

कहा जाता है कि रफी जब 7 साल के थे तो वे अपने बड़े भाई की दुकान से होकर गुजरने वाले एक फकीर का पीछा किया करते थे जो उधर से गाते हुए जाया करता था. उसकी आवाज रफी को पसंद आई और रफी उसकी नकल किया करते थे. उनकी नकल में अव्वलता को देखकर लोगों को उनकी आवाज भी पसंद आने लगी. लोग नाई की दुकान में उनके गाने की प्रशंशा करने लगे. इनके बड़े भाई मोहम्मद हमीद ने इनके संगीत के प्रति इनकी रुचि को देखा और उन्हें उस्ताद अब्दुल वाहिद खान के पास संगीत शिक्षा लेने को कहा.
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एक बार आकाशवाणी (उस समय ऑल इंडिया रेडियो) लाहौर में उस समय के मशहूर गायक-अभिनेता कुंदन लाल सहगल परफॉर्म करने आए हुए थे. इसको सुनने के लिए मोहम्मद रफी और उनके बड़े भाई भी गए थे. तभी बिजली गुल हो जाने की वजह से सहगल ने गाने से मना कर दिया. रफी के बड़े भाई ने आयोजकों से निवेदन किया की भीड़ को शांत करने के लिए मोहम्मद रफी को गाने का मौका दिया जाए.

इस दौरान आयोजकों द्वारा उनको अनुमति मिल गई और 13 वर्ष की आयु में मोहम्मद रफी का ये पहला मौका था जब उन्होंने लोगों के बीच गाना गाया था. ऑडियंस के बीच वहां श्याम सुंदर भी मौजूद थे, जो उस समय के मशहूर संगीतकार थे. उन्होंने भी वहीं रफी साहब को सुना और उनकी आवाज से काफी प्रभावित हुए. इसके बाद उन्होने मोहम्मद रफी को अपने लिए गाने का न्यौता दिया. फिर क्या था, इसके बाद एक झटके में रफी के पूरे परिवार की किस्मत बदल गई.

मोहम्मद रफी का पहला गाना एक पंजाबी फिल्म ‘गुल बलोच’ के लिए था, जिसे उन्होंने श्याम सुंदर के निर्देशन में 1944 में गाया था. 1946 में मोहम्मद रफी ने बंबई (अब मुंबई) आने का फैसला किया. उन्हें संगीतकार नौशाद ने ‘पहले आप’ नाम की फिल्म में गाने का मौका दिया. रफी साहब को बॉलीवुड में पहली बार पहचान 1946 में आई फिल्म ‘अनमोल घड़ी’ के गाने गाने ‘तेरा खिलौना टूटा’ से मिली थी, जो नौशाद द्वारा तैयार किया गया था.

इसके बाद ‘शहीद’, ‘मेला’ और ‘दुलारी’ में भी रफी ने गाने गाए जो काफी पॉपुलर हुए. 1951 में जब नौशाद फिल्म ‘बैजू बावरा’ के लिए गाने बना रहे थे तो उन्होने अपने पसंदीदा गायक तलत महमूद से गवाने की सोची थी. कहा जाता है कि उन्होने एक बार तलत महमूद को धूम्रपान करते देखकर अपना मन बदल लिया और रफी से गाने को कहा. बैजू बावरा के गानों ने रफी को रातोंरात मशहूर बना दिया और यहीं से वह लोगों के बीच मशहूर होते चले गए.

इसके बाद नौशाद ने रफी को अपने निर्देशन में कई गीत गाने को दिए. लगभग इसी समय संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन को उनकी आवाज पसंद आई और उन्होंने भी रफी से गाने गवाना शुरू किया. शंकर जयकिशन उस समय राज कपूर के पसंदीदा संगीतकार थे, पर राज कपूर अपने लिए सिर्फ मुकेश की आवाज पसन्ंद करते थे. बाद में जब शंकर जयकिशन के गानों की मांग बढ़ी तो उन्होंने लगभग हर जगह रफी साहब का प्रयोग किया. यहां तक की कई बार राज कपूर के लिए रफी साहब ने गाया.