Explainer: अगर बीच हवा में विमान का इंजन फेल हो जाए, तो क्यों होता है और फिर क्या होता है?
22 दिसंबर को दिल्ली से मुंबई जाने वाले एयर इंडिया विमान का एक इंजन हवा में फेल हो गया. विमान को वापस दिल्ली लौटना पड़ा. आखिर हवा में प्लेन के इंजन फेल हो जाते हैं और जब ऐसा होता है तो क्या होता है. हालांकि ऐसे ज्यादातर मामलों में कोई हादसा नहीं होता, क्योंकि विमान सुरक्षित कहीं ना कहीं उतार लिया जाता है.
पूरी दुनिया में रोज़ औसतन 5 से 10 विमान ऐसे होते हैं, जिनमें उड़ान के दौरान कम से कम एक इंजन बंद हो जाता है. इनमें से 90फीसदी से ज़्यादा मामले तो यात्रियों को पता भी नहीं चलते. 99% मामलों में विमान सुरक्षित लैंड कर जाता है. पूरी दुनिया में रोजाना करीब 1 लाख से 1.1 लाख कमर्शियल फ्लाइट्स हवा में होती हैं. हवा में उड़ने वाले ज्यादातर विमान दो इंजन वाले होते हैं.
सवाल – क्या उड़ान के दौरान इंजन फेल होना आम बात है?
– आम तो नहीं है लेकिन जैसा आपने ऊपर पढ़ा होगा कि दुनिया में रोजाना ऐसे औसतन 5-6 मामले होते हैं. लिहाजा ये कम होता है लेकिन होता है. आधुनिक एविएशन में इंजन फेल्योर को स्वाभाविक रिस्क यानी ऐसा हो सकता है. अहम बात ये है कि इंजन फेल होने का मतलब विमान का गिरना नहीं होता. आज के कमर्शियल विमान इस स्थिति को ध्यान में रखकर ही बनाए जाते हैं.
सवाल – इंजन फेल होने की सबसे आम वजह क्या होती है?
– सबसे आम वजह है बर्ड स्ट्राइक यानी उड़ते समय किसी पक्षी का इंजन में घुस जाना. टेकऑफ और लैंडिंग के समय यह खतरा ज्यादा रहता है, क्योंकि तब विमान कम ऊंचाई पर होता है. इंजन के अंदर घूमने वाले टरबाइन ब्लेड बेहद तेज गति से चलते हैं. अगर बड़ा पक्षी टकरा जाए, तो इंजन के सेंसर तुरंत खतरे को पहचान लेते हैं और ऑटोमैटिक सिस्टम इंजन को बंद कर देता है. यह फेल्योर नहीं, बल्कि एक सेफ्टी ऐक्शन होता है.
सवाल – क्या फ्यूल खत्म हो जाने से भी इंजन बंद हो सकता है?
– ऐसा हो सकता है लेकिन उड़ान के दौरान ऐसा होना इसलिए असंभव है क्योंकि विमान की उड़ान से पहले फ्यूल की मात्रा की जांच कई स्तरों पर की जाती है – पायलट, ग्राउंड इंजीनियर और सिस्टम तीनों द्वारा.
फिर भी इतिहास में कुछ घटनाएं हुई हैं, जैसे 1983 का “गिमली ग्लाइडर” मामला, जब यूनिट कन्वर्ज़न की गलती से विमान हवा में ही फ्यूल से खाली हो गया था और विमान हादसे का शिकार हो गया लेकिन आज के डिजिटल सेंसर और क्रॉस-चेक सिस्टम ने इस खतरे को करीब खत्म कर दिया है.
सवाल – किन स्थितियों में हवाई जहाज के इंजन का प्रेसर जीरो हो जाता है?
– हवाई जहाज के इंजन में “प्रेशर ज़ीरो हो जाना” कोई एक चीज़ नहीं होती. एविएशन में पायलट आमतौर पर तीन अलग-अलग “प्रेशर” देखते हैं. हर एक के ज़ीरो होने के अलग कारण और अलग खतरे होते हैं. अगर ऑयल प्रेशर जीरो हुआ तो ये सबसे गंभीर संकेत है. इंजन के घूमते हिस्सों को चिकनाई देने वाला तेल अगर प्रेशर खो दे, तो इंजन कुछ ही मिनटों में जाम हो सकता है. ऑयल लीक या पाइप फटने से भी प्रेशर जीरो हो सकता है और तीसरा होता है ऑयल पंप फेल, जो मैकेनिकल खराबी से होता है. इंजन चल भी रहा हो, तब भी प्रेशर ज़ीरो दिख सकता है. लेकिन बैकअप सिस्टम तुरंत काम संभाल लेते हैं.
सवाल – क्या इंजन के मैकेनिकल पार्ट्स अचानक खराब हो सकते हैं?
– हां, लेकिन यह भी बहुत कम होता है। इंजन के अंदर हजारों पुर्जे होते हैं – टरबाइन ब्लेड, बियरिंग, शाफ्ट, गियर बॉक्स. इनमें से किसी एक में भी मेटल फटीग आ जाए, तो समस्या पैदा हो सकती है. इसीलिए हर पार्ट की तय लाइफ लिमिट होती है. तय समय या उड़ान घंटों के बाद उसे बदला ही जाता है. इसके बावजूद जीरो परसेंट जोखिम कभी नहीं हो सकता.
सवाल – क्या कभी इंजन बिना खराब हुए भी बंद हो जाता है?
– हां, ऐसा हो सकता है. कई बार इंजन खुद को बचाने के लिए बंद हो जाता है. इसे ऑटो प्रोटेक्टिव शटडाउन कहा जाता है. अगर सेंसर यह महसूस करें कि
तापमान बहुत ज्यादा हो गया है
वाइब्रेशन असामान्य है
ऑयल प्रेशर गिर रहा है
तो सिस्टम इंजन को बंद कर देता है ताकि बड़ा नुकसान न हो. तकनीकी भाषा में इसे फेल्योर नहीं, बल्कि सेफ्टी फीचर माना जाता है.
सवाल – मौसम भी इंजन फेल होने की वजह बन सकता है?
– हां, कुछ विशेष परिस्थितियों में मौसम बड़ी भूमिका निभा सकता है, तब भी इंजन फेल हो सकता है.
भारी ओले से इंजन इनलेट और ब्लेड को नुकसान
अत्यधिक बारिश से पुराने इंजनों में फ्लेम-आउट
ज्वालामुखी राख इंजन के लिए सबसे खतरनाक
2010 में आइसलैंड के ज्वालामुखी विस्फोट के बाद यूरोप की हवाई सेवाएं इसी वजह से बंद कर दी गई थीं. क्योंकि राख इंजन को स्थायी नुकसान पहुंचा सकती है.
सवाल – क्या मेंटेनेंस की गलती से भी इंजन फेल हो सकता है?
– हां, इसकी भी गुंजाइश रहती है. हालांकि आजकल कंप्युटराइज जमाने में ऐसा होना दुर्लभ है लेकिन कभी-कभी हो सकता है. इनकी वजहें ये हो सकती हैं – गलत इंस्टॉलेशन, मेंटेनेंस में चूक और मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट. ऐसी घटनाओं के बाद पूरी दुनिया में उस मॉडल के इंजनों की जांच होती है. जरूरत पड़े तो विमान ग्राउंड कर दिए जाते हैं.
सवाल – अगर हवा में एक इंजन बंद हो जाए तो पायलट सबसे पहले क्या करते हैं?
– पायलटों के लिए यह घबराने की स्थिति नहीं होती, क्योंकि इसकी ट्रेनिंग उन्हें बार-बार दी जाती है. ऐसे में पायलट ये काम करते हैं
विमान का कंट्रोल स्थिर रखना
ऑटो-पायलट का सही इस्तेमाल
लिखी हुई इंजन फेल्योर चेकलिस्ट को फॉलो करना
इंजन को रीस्टार्ट करने की कोशिश
नजदीकी सुरक्षित एयरपोर्ट की ओर डायवर्ट
सवाल – क्या विमान एक इंजन पर उड़ सकता है?
– हां, यही आधुनिक एविएशन की सबसे बड़ी ताकत है. लगभग सभी कमर्शियल जेट एक इंजन पर सुरक्षित उड़ान और लैंडिंग में सक्षम होते हैं. लेकिन ऐसा जब भी होता है तब लंबी उड़ानों में एविएशन के नियम होते हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि विमान तय समय के भीतर किसी भी हालत में नजदीकी एयरपोर्ट तक पहुंच सके.
सवाल – दोनों इंजन एक साथ फेल होने की आशंका कितनी हो सकती है?
– ना के बराबर या कहें बहुत दुर्लभ। यह तभी हो सकता है
जब पक्षियों का बड़ा झुंड दोनों इंजनों में घुस जाए.
विमान ज्वालामुखी राख में चला जाए.
फ्यूल बुरी तरह दूषित हो
2009 में हडसन नदी में सुरक्षित लैंडिंग इसी श्रेणी का उदाहरण है. इसी वजह से पायलटों को दोनों इंजन फेल्योर की भी ट्रेनिंग दी जाती है.
सवाल – क्या यात्रियों को इंजन फेल होने का पता चल जाता है?
– अधिकतर मामलों में नहीं. कई बार इंजन बंद हो जाता है, लेकिन विमान सामान्य तरीके से उड़ता रहता है. यात्री इसे महसूस भी नहीं कर पाते. अक्सर यात्रियों को तब पता चलता है जब विमान वैकल्पिक एयरपोर्ट पर उतरता है.
सवाल – आखिर हवाई यात्रा इतनी सुरक्षित कैसे है?
– क्योंकि पूरी एविएशन इंडस्ट्री एक ही सिद्धांत पर बनी है – अगर कुछ गलत हो जाए तो क्या. इसी वजह से हर सिस्टम का बैकअप होता है.हर स्थिति की लिखित चेकलिस्ट होती है. पायलटों की नियमित सिम्युलेटर ट्रेनिंग होती है ताकि एक गलती से पूरा सिस्टम फेल न हो. इसी वजह से इंजन फेल होना खबर बनता है, हादसा नहीं.
सवाल – क्या कभी ऐसा हुआ कि हवा में उड़ते समय एक के बाद दूसरा इंजन भी फेल हो जाए. ऐसे में विमान को कैसे संभालते हैं?
– हां, ऐसा हुआ है, लेकिन यह एविएशन की सबसे दुर्लभ आपात स्थिति होती है. इसे तकनीकी भाषा में ड्यूल इंजन फेल्योर या आल इंजन फ्लेम आउट कहते हैं. इसका प्रसिद्ध मामला वर्ष 2009 का यूएस एयरवेज फ्लाइट 1549 का है, जब कनाडा गीज बर्ड्स का झुंड विमान के दोनों इंजनों में घुस गया. तब विमान को आपात स्थितियों में न्यूयॉर्क की हडसन नदी में उतारना पड़ा. ऐसे में विमान को ग्लाइड करते हुए भी रनवे पर उतारने की कोशिश की जाती है. ये ध्यान रखें कि दोनों इंजन बंद हो जाने पर भी विमान तुरंत नहीं गिरता है. इंजन बंद हो जाते हैं लेकिन लिफ्ट बनी रहती है तब विमान एक विशाल ग्लाइडर बन जाता है. अगर विमान 35,000 फीट की ऊंचाई पर हो और ऐसा हो जाए तो विमान 100–120 किलोमीटर तक ग्लाइड कर सकता है यानि 15–20 मिनट हवा में गुजार सकता है. तब तक पायलट के पास सोचने और निर्णय लेने का वक्त होता है.
ऐसे में पायलट इंजन री-स्टार्ट करने की कोशिश करते हैं. कई मामलों में इंजन वापस चालू भी हो जाते हैं या फिर नजदीकी सुरक्षित जगह पर लैंडिंग की कोशिश की जाती है. पहले नजदीक के एयरपोर्ट, फिर मिलिट्री स्ट्रिप और सबसे आखिर में नदी या समुद्र. तब पायलटों की ट्रेनिंग ही असली इंजन बन जाती है
सवाल – क्या दोनों इंजन फेल होने पर बिजली भी चली जाती है?
– नहीं ऐसा नहीं होता. हवा से चलने वाला छोटा प्रोपेलर. बेसिक कंट्रोल्स और इंस्ट्रूमेंट्स को बिजली देता है.