छह साल में एक ही परिवार ने बनाईं 4 फिल्में, तीन हुईं हिट, दो बन गईं कालजयी मूवी, छोड़ी अमिट छाप
Last Updated:
Bollywood Cult Classic Movies : बॉलीवुड में कई परिवार ऐसे हैं जिसके मेंबर्स मिलकर फिल्में बनाते रहे हैं. दिलचस्प बात यह है कि ऐसी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर बेहद सफल रहीं. कुछ परिवार ऐसे भी हैं जिन्होंने ऐसी फिल्में बनाईं जो हिंदी सिनेमा के इतिहास में अमर हो गईं. इन फिल्मों की गिनती महान फिल्मों में होती है. ऐसी कल्ट क्लासिक मूवी में हिंदी सिनेमा के इतिहास में फिर देखने को नहीं मिली. कुछ फिल्में इतनी सफल रहीं कि इनसे इंस्पायर्ड होकर कई सुपरहिट फिल्में बनाई गईं. बॉलीवुड की यह फैमिली कौन सी है और वो कल्ट हिट फिल्में कौन सी हैं, आइये जानते हैं……

यह कहानी उस फैमिली की है जिसने बॉलीवुड में दो दशकों तक राज किया. हिंदी सिनेमा को कई ऐसी फिल्में दीं जो आज क्लासिक मानी जाती हैं. इनमें से एक फिल्म तो हिंदी सिनेमा की सार्वकालिक महान फिल्म में शामिल है. हम बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार देवानंद और उनके भाई केतन आनंद-विजय आनंद की बात कर रहे हैं. विजय आनंद को इनसाइक्लोपीडिया ऑफ सिनेमा भी कहा जाता है. विजय आनंद को गोल्डी नाम से जाना जाता है जो कि प्रसिद्ध भारतीय फिल्म डायरेक्टर, प्रोड्यूसर, राइटर, एडिटर और एक्टर थे. उन्होंने अपनी फिल्मों में गहरी मानवीय भावनाओं, मॉडर्न एप्रोच और स्टाइलिश सीन्स का अद्भुत मिश्रण दर्शकों के सामने पेश किया. उन्होंने पांच साल के अंतराल में ऐसी फिल्में बनाई जो भारतीय सिनेमा पर अमिट छाप छोड़ गईं. ये फिल्में थीं : हम दोनों, गाइड, और ज्वेल थीफ. आइये जानते हैं इन फिल्मों से जुड़े दिलचस्प तथ्य…..

स्टोरी, स्क्रीनप्ले, डायलॉग, एक्शन, एडिटिंग, सॉन्ग सिलेक्शन, बैकग्राउंड म्यूजिक, डायरेक्शन और फिल्म मेकिंग के हर पहलू के मास्टर विजय आनंद बॉलीवुड के सुपरस्टार देवानंद के छोटे भाई थे. विजय आनंद का जन्म 22 जनवरी 1934 को पंजाब के गुरुदासपुर में हुआ था. पिता किशोरीलाल आनंद फेमस एडवोकेट थे और 8 भाषाओं के ज्ञाता थे. उनकी 9 संताने थीं. पहली पत्नी की मौत के बाद उन्होंने अपनी साली से दूसरी शादी की थी. गोल्डी परिवार में सबसे छोटे थे. गोल्डी बचपन से ही अपने भाइयों को डायलॉग-स्क्रिप्ट लिखने में मदद करने लगे थे. गोल्डी जब पढ़ाई कर रहे थे तो उन्होंने पहली फिल्म टैक्सी ड्राइवर लिखी थी. केतन आनंद ने यह फिल्म बनाई थी. गोल्डी कभी फिल्म की शूटिंग पर नहीं आए, वो उन दिनों पढ़ाई कर रहे थे. यह फिल्म सफल रही. आगे चलकर विजय आनंद ने ऐसी फिल्में बनाई जिसकी बदौलत हिंदी सिनेमा हमेशा उनका ऋणी हो गया.

देवानंद ने 1950 की फिल्म अफसर से अपना बैनर नवकेतन फिल्म्स शुरू किया था. फिर तो वह हर साल एक फिल्म अपने बैनर के लिए बनाते थे. 1960 में इसी बैनर की एक फिल्म ‘काला बाजार’ आई थी. नवकेतन फिल्म्स में उस समय निर्मल सरकार नाम का युवक काम कर रहा था. उसी की कहानी पर ‘हम दोनों’ फिल्म बनाई गई जो एक जैसे चेहरे वाले फौजी की थी. यह फिल्म 4 फरवरी 1961 को रिलीज हुई थी. देवानंद ने गोल्डी से फिल्म डायरेक्ट करने को कहा लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया. उन्होंने अपने दोस्त अमरजीत को डायरेक्टर बनाया लेकिन असल में फिल्म को गोल्डी ने डायरेक्ट किया. पूरी स्क्रिप्ट भी उन्होंने ही लिखी थी. म्यूजिक जयदेव थे. गीतकार साहिर लुधियानवी ने लिखे थे. फिल्म में देवानंद, नंदा, साधना लीड रोल में थे. फिल्म का म्यूजिक कालजयी था. फिल्म के सदाबहार गानों में ‘अभी ना जाओ छोड़कर कि दिल अभी भरा नहीं’ और ‘मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया’ शुमार हैं. फिल्म की शूटिंग के दौरान देवानंद और गोल्डी में अनबन भी हुई थी. यह फिल्म आज भारतीय सिनेमा की कल्ट क्लासिक फिल्म में शुमार है. यह इकलौती फिल्म है जिसमें नंदा और साधना में काम किया. 40 लाख के बजट में बनी इस फिल्म ने 80 लाख का नेट कलेक्शन किया था. यह एक हिट फिल्म साबित हुई थी.
Add News18 as
Preferred Source on Google

इस लिस्ट में दूसरी क्लासिक फिल्म ‘गाइड’ शामिल है जो कि 2 अप्रैल 1965 को रिलीज हुई थी. देवानंद की 1961 की फिल्म ‘हम दोनों’ बर्लिन फिल्म फेस्टिवल के लिए चुनी गई थी. यहां पर देवानंद की मुलाकात दुनियाभर के दिग्गज फिल्मकारों से हुई. बर्लिन में ही देवानंद ने आरके नारायण की बुक ‘गाइड’ खरीदी थी. गाइड बुक को साहित्य अकादमी का पुरस्कार पंडित नेहरू ने दिया था. गाइड बुक को पढ़ने के बाद देवानंद आनंद ने उस पर फिल्म बनाने का फैसला किया. उन्होंने गोल्डी से उपन्यास पढ़ने के लिए कहा लेकिन वो इंटरेस्टेड नहीं थे. गोल्डी ने नॉवेल पढ़ा लेकिन उन्हें पसंद नहीं आया. यह फिल्म दो भाषाओं इंग्लिश और हिंदी में बन रही थी. यूएस वर्जन के प्रोड्यूसर टैड डेनियलवस्की थे. गोल्डी को उनका रवैया पसंद नहीं आया. उन्होंने फिल्म छोड़ने का मन बना लिया.

देवानंद गुस्सा हो गए और दोनों के बीच बातचीत बंद हो गई. देवानंद ने यह फिल्म राज खोसला के साथ बनाने का प्लान बनाया लेकिन वहीदा ने उनके साथ काम करने से इनकार कर दिया. देवानंद ने बड़े भाई चेतन आनंद के साथ फिल्म बनाना चाही लेकिन बात नहीं बन पाई. थक-हारकर देवानंद फिर से गोल्डी के पास आए. गोल्डी ने साफ-साफ कहा कि टैड का रवैया मुझे पसंद नहीं है. वो अपनी फिल्म पहले बना लें, मैं हिंदी के लिए अलग से शूटिंग करूंगा. स्क्रिप्ट में भी बदलाव करूंगा. कुछ गाने भी फिल्म में रखूंगा. देवानंद को भाई गोल्डी की बात जम गई. टैड ने छह हफ्ते में पानी की तरह पैसा बहाकर फिल्म बना ली. गोल्डी ने इस दौरान मुंबई के खंडाला में 18 दिन में होटल में रुककर गाइड फिल्म की स्क्रिप्ट लिखी. उन्होंने स्टोरी में कई बदलाव किए.

इंग्लिश फिल्म का प्रीमियर न्यूयॉर्क में हुआ. देवानंद इसमें शामिल हुए. फिल्म फ्लॉप साबित हुई. इसका असर हिंदी फिल्म पर पड़ा. डिस्ट्री ब्यूटर्स चाहते थे कि राजू गाइड को फिल्म को जिंदा दिखाया जाए, लेकिन गोल्डी नहीं माने. विजय आनंद का कहना था कि राजू अब माया मोह से ऊपर उठ गया है. अचानक फिल्म ट्रेड में गाइड को लेकर खबरें छपने लगीं. मराठा मंदिर में प्रीमियर रखा गया. गाइड रिलीज हुई. 10 हफ्ते निकल गए. सबको लग रहा था कि फिल्म फ्लॉप हो गई. बारिश नहीं हो रही थी. गर्मी से बुरा हाल था, ऐसे में देवानंद ने अखबारों में विज्ञापन दिया कि ‘गाइड प्रे फॉर रेन’. इत्तफाक से बारिश हो गई. धीरे-धीरे गाइड की स्टोरी दर्शकों को पंसद आने लगी. फिर तो चमत्कार हो गया.

गाइड 1965 की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों की लिस्ट में 5वें नंबर पर थी. फिल्म का बजट 85 लाख था और नेट कलेक्शन 1.75 करोड़ रुपये रहा था. फिल्म हिट साबित हुई लेकिन गुजरते समय के साथ इसका महत्व दर्शकों को समझ में आया. रिपीट रन में फिल्म हाउसफुल रही. गाइड मूवी आगे चलकर भारतीय सिनेमा की कल्ट क्लासिक मूवी में शामिल हो गई. गाइड फिल्म का म्यूजिक एसडी बर्मन ने तैयार किया था. फिल्म का म्यूजिक सुपरहिट था. आज भी इस फिल्म के गाने रेडियो-टीवी-सोशल मीडिया पर खूब सुने-देखे जाते हैं. फिल्म के सुपरहिट गानों में ‘आज फिर जीने के तमन्ना है’, ‘पिया तोसे नैना लागे रे’ ‘वहां कौन है तेरा’ शुमार हैं. गीतकार शैलेंद्र थे. 14वें फिल्मफेयर अवॉर्ड में गाइड को 9 नॉमिनेशन मिले थे जिनमें से यह फिल्म 7 अवॉर्ड जीतने में कामयाब रही थी. यह उस साल की सबसे ज्यादा अवॉर्ड पाने वाली फिल्म थी.

गाइड फिल्म की अपार सफलता के बाद नवकेतन फिल्म्स की ओर से एक और फिल्म बनाई गई. विजय आनंद इसके डायरेक्टर थे. नाम था : ज्वेल थीफ. यह फिल्म 27 अक्टूबर 1967 को रिलीज हुई थी. फिल्म में अशोक कुमार, देवानंद, वैजयंती माला और तनूजा लीड रोल में थे. गोल्डी ने एक बार फिर से लीक से हटकर फिल्म बनाने का फैसला किया. फिल्म की कहानी के राइटर केए राइटर थे. स्क्रीनप्ले, डायलॉग और डायरेक्शन विजय आनंद का था. म्यूजिक एसडी बर्मन थे. गीतकार शैलेंद्र-मजरूह सुल्तानपुरी थे. फिल्म का एक गाना ‘ओठों पर ऐसी बात, दबा के चली आई’ शैलेंद्र ने लिखा था जो कि आज भी सुनने को मिलता है. इस फिल्म में लंबे समय बाद मोहम्मद रफी-लता साथ में आए थे. फिल्म के सुपरहिट गानों में ‘रात अकेली है, बुझ गए दीये’, ‘आसमा के नीचे, हम आज अपने पीछे, प्यार का जहां बसा के चले’ शामिल थे.

प्रोड्यूसर देवानंद थे. पूरी फिल्म में ऐसी कहानी-सिचुएशन हैं जिसे पुलिस -दर्शक खोजते रहते हैं लेकिन बात में पता चलता है कि वो आदमी कभी था ही नहीं. कहानी का मेन कैरेक्टर ही विलेन निकलता है. इस फिल्म में देवानंद ने एक खास तरह की कैप भी पहनी थी. फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक आरडी बर्मन ने तैयार किया था. ज्वेल थीफ हिंदी सिनेमा की बेस्ट सस्पेंस थ्रिलर फिल्म में शामिल है. फिल्म 1967 की फिल्मों में छठे नंबर पर थी. फिल्म अपने समय से बहुत आगे की थी.