सिर्फ अरावली ही नहीं, विकास की अंधी दौड़ में लहूलुहान हो रहे देश के ये 5 पहाड़; मिटने की दहलीज पर अस्तित्व!

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नई दिल्‍ली. अरावली की पहाड़ियां सुर्खियों में हैं. सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों और ‘100 मीटर की ऊंचाई’ वाली परिभाषा ने बहस छेड़ दी है कि क्या अरावली का 90% हिस्सा माइनिंग के लिए खुल जाएगा? लेकिन इस शोरगुल के बीच देश के कई ऐसे पहाड़ हैं जो खामोशी से मर रहे हैं. ये वे पहाड़ हैं जो अरावली जितने ग्लैमरस नहीं हैं, जिनकी चर्चा दिल्ली के ड्राइंग रूम में कम होती है लेकिन जिनका वजूद मिटना देश के इकोसिस्टम के लिए अरावली से भी बड़ा खतरा साबित हो सकता है. पश्चिमी घाट से लेकर झारखंड के राजमहल तक और ओडिशा के नियमगिरि से लेकर बुंदेलखंड के विंध्य तक पहाड़ों को विकास के नाम पर बारूद से उड़ाया जा रहा है. कोर्ट में केस चल रहे हैं, ट्रिब्यूनल जुर्माने लगा रहा है लेकिन जमीन पर पहाड़ गायब हो रहे हैं. पेश है देश के लुप्त होते पहाड़ों पर एक विस्तृत रिपोर्ट.

1. पश्चिमी घाट (Western Ghats): भारत का ‘वॉटर टावर’ खतरे में

यूनेस्को (UNESCO) की विश्व धरोहर सूची में शामिल और दुनिया के 8 ‘हॉटेस्ट हॉटस्पॉट्स’ में से एक, पश्चिमी घाट 6 राज्यों (गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु) में फैला है. 2025 की IUCN (इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजरवेशन ऑफ नेचर) की रिपोर्ट ने इसे गंभीर चिंता की श्रेणी में रखा है.

क्या है खतरा?

वायनाड (केरल) में 2024 में हुए विनाशकारी भूस्खलन ने साबित कर दिया कि पश्चिमी घाट अब और बोझ नहीं सह सकता. यहां समस्या सिर्फ माइनिंग नहीं बल्कि अनियोजित इंफ्रास्ट्रक्चर और अवैध पत्थर खदानें हैं.

माधव गाडगिल बनाम कस्तूरीरंगन रिपोर्ट: यह विवाद एक दशक से ज्यादा पुराना है लेकिन आज भी कोर्ट में जिंदा है. गाडगिल समिति ने पूरे पश्चिमी घाट को ‘इको-सेंसिटिव’ (ESZ) घोषित करने की सिफारिश की थी, जिसे राज्यों ने ‘विकास विरोधी’ बताकर खारिज कर दिया. बाद में कस्तूरीरंगन समिति ने केवल 37% हिस्से को बचाने की बात कही. विडंबना यह है कि केंद्र सरकार और राज्य अब तक (2025 तक) अंतिम नोटिफिकेशन जारी नहीं कर पाए हैं.

कोर्ट का रुख: एनजीटी की पुणे बेंच और चेन्नई बेंच ने कई बार महाराष्ट्र और केरल सरकार को फटकार लगाई है. गोवा में अवैध लौह अयस्क (Iron Ore) खनन पर सुप्रीम कोर्ट की रोक के बावजूद, ‘डमपिंग’ और पुराने लीज का मामला अदालतों में पेंडिंग रहता है.

ताजा स्थिति: सह्याद्री की पहाड़ियों में पत्थर तोड़ने वाले क्रशर अवैध रूप से चल रहे हैं. कोंकण क्षेत्र में पहाड़ों को काटकर जो समतलीकरण (leveling) किया जा रहा है, उससे नदियाँ अपना रास्ता बदल रही हैं, जिससे बाढ़ का खतरा बढ़ गया है.

2. पूर्वी घाट और ओडिशा के पहाड़: बॉक्साइट का श्राप

पूर्वी घाट (Eastern Ghats) पश्चिमी घाट की तरह लगातार (continuous) श्रृंखला नहीं है, लेकिन यहाँ के पहाड़ आदिवासियों के देवता और बॉक्साइट (एल्युमीनियम का अयस्क) के भंडार दोनों हैं. यहाँ कॉरपोरेट और आदिवासियों के बीच सीधा युद्ध चल रहा है.

Eastern Ghats

केस स्टडी: माली पर्वत (Mali Parbat) और नियमगिरि

माली पर्वत (कोरापुट): ओडिशा के कोरापुट जिले में स्थित माली पर्वत पर हिंडाल्को (Hindalco) की माइनिंग लीज का विरोध पिछले दो दशकों से चल रहा है. स्थानीय आदिवासियों का आरोप है कि माइनिंग से उनके 36 बारहमासी जल स्रोत सूख जाएंगे.

कानूनी पेंच: यह मामला कई बार उड़ीसा हाईकोर्ट और एनजीटी में गया है. पर्यावरण मंजूरी (Environmental Clearance – EC) को लेकर ग्राम सभाओं ने विरोध किया. हालिया रिपोर्टों के अनुसार, स्थानीय प्रतिरोध के कारण कंपनी को माइनिंग शुरू करने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन खतरा टला नहीं है.

नियमगिरि (Niyamgiri): वेदांता (Vedanta) और डोंगरिया कोंध आदिवासियों के बीच की लड़ाई इतिहास बन चुकी है, जहाँ सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में ऐतिहासिक फैसला दिया था कि ‘ग्राम सभा’ ही तय करेगी कि माइनिंग होगी या नहीं.

मौजूदा हालात: भले ही नियमगिरि में माइनिंग रुक गई हो, लेकिन आस-पास की पहाड़ियों (जैसे सिजीमाली और कुट्रुमाली) पर अब नजरें गड़ी हैं. सरकार नई लीज आवंटित कर रही है, और यह मामला फिर से अदालतों की चौखट पर है.

3. राजमहल की पहाड़ियां (झारखंड): गायब होता इतिहास

झारखंड के साहिबगंज और पाकुड़ जिलों में स्थित राजमहल की पहाड़ियां (Rajmahal Hills) भूवैज्ञानिक दृष्टि से हिमालय से भी पुरानी हैं. ये जुरासिक काल के जीवाश्मों (Fossils) का घर हैं. लेकिन आज यह क्षेत्र अवैध पत्थर खनन (Stone Chips) का केंद्र बन गया है.

‘गायब होते पहाड़’ की रिपोर्ट: स्थानीय मीडिया और एनजीटी में दायर याचिकाओं के अनुसार, साहिबगंज में कई पहाड़ अब नक्शे पर तो हैं, लेकिन जमीन पर समतल मैदान बन चुके हैं.

एनजीटी की सख्त टिप्पणी: नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने 2023-24 में झारखंड सरकार को फटकार लगाते हुए कहा था कि राज्य में “पर्यावरणीय अराजकता” (Environmental Lawlessness) का माहौल है. ट्रिब्यूनल ने पाया कि पत्थर क्रशर बिना किसी पर्यावरण मंजूरी के चल रहे हैं और प्रशासन की मिलीभगत से पहाड़ों को डायनामाइट से उड़ाया जा रहा है.

गंगा पर असर: राजमहल की पहाड़ियां गंगा नदी के किनारे स्थित हैं. क्रशर से उड़ने वाली धूल और मलबे से गंगा का इकोसिस्टम भी तबाह हो रहा है. ईडी (ED) द्वारा हाल ही में की गई छापेमारी में अवैध माइनिंग से जुड़े 1000 करोड़ रुपये के घोटाले का पर्दाफाश हुआ था, जो यह बताता है कि यहाँ पहाड़ ‘पैसे’ में बदल चुके हैं.

4. विंध्याचल पर्वत (मध्य प्रदेश/यूपी): पत्थर माफिया का गढ़

बुंदेलखंड और विंध्य का क्षेत्र (मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमा) अवैध सैंडस्टोन और ग्रेनाइट खनन के लिए कुख्यात है.

सोनभद्र और मिर्जापुर (यूपी): यह क्षेत्र ‘भारत की ऊर्जा राजधानी’ कहलाता है, लेकिन यहाँ की कैमूर (Kaimur) पहाड़ियां छलनी हो चुकी हैं. एनजीटी ने कई बार यहाँ चल रहे क्रशरों पर जुर्माना लगाया है. एक रिपोर्ट के मुताबिक, यहाँ के जंगलों में रहने वाले वन्यजीवों का आवास पूरी तरह खत्म हो चुका है.

vindhyachal mountain

पन्ना (मध्य प्रदेश): पन्ना टाइगर रिजर्व के आस-पास की पहाड़ियों में अवैध हीरा और पत्थर खनन एक बड़ी चुनौती है.

अदालत का दखल: एनजीटी की भोपाल बेंच ने मध्य प्रदेश सरकार को कई बार निर्देश दिए हैं कि सैटेलाइट मैपिंग के जरिए अवैध खनन पर नजर रखी जाए. लेकिन स्थानीय माफिया इतना ताकतवर है कि कई बार वन विभाग के अधिकारियों पर हमले की खबरें आती रहती हैं.

5. हिमालय (शिवालिक रेंज): विकास का बोझ

हिमालय में खनन से ज्यादा बड़ा खतरा ‘अनियोजित निर्माण’ है. चार धाम परियोजना और रेल लाइनों के लिए पहाड़ों को जिस तरह से काटा जा रहा है, वह चिंताजनक है.

जोशीमठ और उससे आगे: 2023 में जोशीमठ के धंसने (Sinking) की घटना ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा था. विशेषज्ञों ने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा था कि कमजोर पहाड़ों पर भारी निर्माण और टनलिंग (Surang) इसका मुख्य कारण है.

कोर्ट में मामला: सुप्रीम कोर्ट ने हिमालय की ‘वहन क्षमता’ (Carrying Capacity) का आकलन करने के लिए एक समिति का गठन किया था. केंद्र सरकार ने कोर्ट में तर्क दिया है कि देश की सुरक्षा और सीमा तक पहुँच के लिए सड़कों का चौड़ीकरण जरूरी है. यह ‘पर्यावरण बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा’ का एक जटिल कानूनी मामला बन चुका है.

निष्कर्ष

कानून जैसे माइनिंग एक्ट, वन संरक्षण अधिनियम और एनजीटी के आदेश कागज पर बेहद सख्त हैं. लेकिन अवैध खनन में मुनाफा इतना ज्यादा है कि जुर्माना भरना माफिया के लिए ‘बिजनेस कॉस्ट’ मात्र है. सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की ‘स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरनमेंट’ रिपोर्ट चेतावनी देती है कि पहाड़ों के विनाश से न केवल भूस्खलन बढ़ेंगे बल्कि भूजल (Groundwater) का स्तर भी पाताल में चला जाएगा क्योंकि पहाड़ ही बारिश के पानी को रोककर रिचार्ज करते हैं. अरावली का मसला दिल्ली के करीब होने के कारण मीडिया में है लेकिन राजमहल के जीवाश्म, पूर्वी घाट के आदिवासी और पश्चिमी घाट की जैव-विविधता जिस खतरे में है वह एक राष्ट्रीय आपातकाल से कम नहीं है. यदि समय रहते ‘सस्टेनेबल माइनिंग’ की सिर्फ बातें नहीं बल्कि उस पर अमल नहीं हुआ तो अगली पीढ़ी इन पहाड़ों को सिर्फ गूगल मैप्स के पुराने नक्शों में ही देख पाएगी.

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