इतिहास की गलती पर मांझी की मुखर आवाज का ‘मर्म’, राजनीति से आगे मानवीय सवाल- भारत मौन क्यों?

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पटना. बांग्लादेश को अलग राष्ट्र बनाना ही आज हिंदुओं की दुर्दशा की जड़ है… बिहार के गया में दिए अपने बयान में जीतन राम मांझी ने बांग्लादेश में हाल ही में एक हिंदू युवक दीपू चंद्र दास की निर्मम हत्या का जिक्र करते हुए कहा कि इस तरह की घटनाएं हर हिंदुस्तानी को आहत करती हैं. मांझी ने इन अत्याचारों को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की नीतिगत गलती से जोड़ते हुए कहा कि 1971 के युद्ध में ऐतिहासिक जीत और 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों के सरेंडर के बाद अगर बांग्लादेश को अलग देश न बनाया गया होता तो आज वहां हिंदू नागरिकों को धर्म के नाम पर जुल्म और अपमान नहीं झेलना पड़ता. उन्होंने कहा कि यह केवल इतिहास की चर्चा नहीं, बल्कि आज की भयावह सच्चाई है. जीतन राम मांझी का बयान केवल राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि पड़ोसी देश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर एक चेतावनी है. उन्होंने इतिहास से सीख लेने और भविष्य में ऐसी नीतिगत भूलों को न दोहराने की बात कही है.

दरअसल, बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचार आज किसी से छिपे नहीं हैं. मंदिरों पर हमले, घरों में लूटपाट, संपत्ति छीनना और धार्मिक आधार पर अपमान जैसी खबरें लगातार आ रही हैं. दो दिन पहले (20 दिसंबर) एक हिंदू युवक दीपू चंद्र दास की भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी और शव को आग लगा दी. ऐसे मामले सामने आने से जहां हर हिंदुस्तानी का मन दुखी है, वहीं केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने इस मुद्दे पर खुलकर बोलने का साहस दिखाया है. उन्होंने इन अत्याचारों को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की नीतिगत गलती से जोड़ते हुए कहा है कि अगर बांग्लादेश को अलग देश न बनाया जाता तो शायद आज हिंदू भाइयों को इतना जुल्म न सहना पड़ता. दरअसल, मांझी की यह आवाज सिर्फ एक बयान भर नहीं, बल्कि पड़ोसी देश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का गंभीर सवाल है.

इंदिरा गांधी की नीतिगत भूल का इतिहास

जीतन राम मांझी ने याद दिलाया कि 1947 में बंटवारे के समय कश्मीर को छोड़ देने जैसी गलतियां हुईं. फिर 1971 के युद्ध में इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के लगभग 93 हजार सैनिकों को सरेंडर करवाया- यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सबसे बड़ा सरेंडर था. लेकिन उसके बाद बांग्लादेश को अलग देश बना दिया गया. मांझी का सवाल है- अगर बांग्लादेश भारत का हिस्सा रहता तो वहां के लोग बेआबरू न होते. कोई धार्मिक आधार पर जुल्म न करता. यह बयान 1971 की उस जीत पर सवाल उठाता है जो भारत की बड़ी उपलब्धि मानी जाती है. मांझी इसे भूल बताते हैं, क्योंकि इससे पड़ोसी देश में हिंदुओं की स्थिति कमजोर हुई. आज बांग्लादेश में हिंदू आबादी घटकर 8 प्रतिशत के करीब रह गई है, जबकि पहले यह 22 प्रतिशत से भी ज्यादा थी.

पाकिस्तान में विलुप्त हो रहे हिंदुओं पर चिंता

जीतन राम मांझी ने पाकिस्तान की मिसाल देकर बात को और साफ किया. बंटवारे के समय पाकिस्तान में हिंदू 15 प्रतिशत से ज्यादा थे, लेकिन आज मुश्किल से 2 प्रतिशत बचे हैं. वजह साफ है- धार्मिक आधार पर सताना और उत्पीड़न. लाखों हिंदू मजबूरन पलायन कर गए. वहीं, भारत में मुसलमानों की आबादी 1951 में करीब 10 प्रतिशत से बढ़कर 2011 में 14 प्रतिशत हो गई, जो अब करीब 18 प्रतिशत अनुमानित है. इसका कारण भारत की धर्मनिरपेक्ष नीति है. यहां सबको सुरक्षा मिलती है, संरक्षण मिलती है, आरक्षण मिलता है, समान अधिकार मिलते हैं. लेकिन पड़ोसी देशों में हमारे हिंदू भाइयों को अपमानित किया जाता है. मांझी ने इसे बड़ा अन्याय बताते हुए कहा है कि भारत जैसे उदार देश को अपने लोगों की रक्षा के लिए आगे आना चाहिए.

भारत सरकार से जीतन राम मांझी की अपील

केंद्रीय मंत्री होने के नाते मांझी ने साफ कहा- इस मुद्दे पर भारत सरकार को ध्यान देना चाहिए. आज नहीं तो कल, समय आने पर संज्ञान लेना पड़ेगा. उनका बयान केंद्र सरकार की ओर कूटनीतिक स्तर पर दबाव बनाने की ओर इशारा करता है. भारत को बांग्लादेश सरकार से बात करनी होगी कि अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित हो. अगर अत्याचार जारी रहे तो हिंदू संगठन और ज्यादा मुखर होंगे. मांझी की यह पहल पड़ोसी देश में हिंदुओं की आवाज बन सकती है.

जीतन राम मांझी ने गया में बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार और दीपू चंद्र दास की हत्या पर इंदिरा गांधी की नीतिगत भूल को जिम्मेदार बताया है. भारत सरकार से सज्ञान लेने की अपील की है.

बांग्लादेश में जारी अत्याचारों की हकीकत

बांग्लादेश से बुरी खबरें आने का क्रम जारी है. हिंदू युवकों की लिंचिंग, मंदिरों पर हमले और अल्पसंख्यकों पर जुल्म. राजनीतिक अस्थिरता के बीच कट्टरपंथी ताकतें सक्रिय हैं. मांझी ने कहा कि ये सब सुनकर मन दुखी हो जाता है. पड़ोसी देश में धार्मिक आधार पर अपमान और यातनाएं बर्दाश्त नहीं की जा सकतीं. यह सिर्फ बांग्लादेश की समस्या नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र में धार्मिक सद्भाव का सवाल है. भारत ने 1971 में बांग्लादेश की आजादी में बड़ी भूमिका निभाई, लेकिन आज वहां के हिंदू असुरक्षित महसूस कर रहे हैं.

बांग्लादेश में हिंदुओं पर जुल्म और भारत की भूमिका

बहरहाल, मांझी के बयान को जोड़ते हुए जानकार भी कहते हैं कि इतिहास से सीखना जरूरी है. मांझी ने इंदिरा की गलती को दोहराने से बचने की सलाह दी. भारत की धर्मनिरपेक्षता अपनी ताकत है, लेकिन पड़ोस में अपने लोगों की रक्षा भी जरूरी. यह मुद्दा अब राजनीति से ऊपर उठकर मानवीय अधिकारों का सवाल बन गया है. उम्मीद है कि भारत सरकार जल्द कदम उठाएगी, ताकि बांग्लादेश में हिंदू सुरक्षित महसूस करें. मांझी की आवाज एक याद दिलाती है- पड़ोसी देश में शांति भारत की अपनी शांति को लेकर गहराई से जुड़ी हुई है.

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