क्या काकोरी एक्शन के कारण हुई थी क्रांतिकारी रोशन सिंह को फांसी? जानें बमरौली कांड और अंग्रेजी न्याय का काला सच
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Shahjahanpur News :
25 दिसंबर 1924 को बमरौली गांव में हुई एक घटना, जिसे अंग्रेजों ने डकैती बताकर दर्ज किया, आगे चलकर महान क्रांतिकारी ठाकुर रोशन सिंह की फांसी का आधार बनी. हालांकि , रोशन सिंह काकोरी रेल एक्शन में शामिल नहीं थे, फिर भी अंग्रेजी हुकूमत ने बमरौली कांड की पुरानी फाइल खोलकर उन्हें साजिशन हत्या के आरोप में फंसा दिया. यह मामला ब्रिटिश न्याय व्यवस्था के दोगलेपन का कड़वा सच उजागर करता है.
शाहजहांपुर : 25 दिसंबर 1924 की रात पीलीभीत के बमरौली गांव में घटी एक घटना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ साबित हुई. जिसे पुलिस ने ‘डकैती’ की फाइल में दर्ज किया, वह असल में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) के क्रांतिकारियों का एक ‘मनी एक्शन’ था. संगठन को मजबूत करने और हथियार खरीदने के लिए की गई इस कार्रवाई के दौरान दुर्घटना के कारण मोहनलाल नामक व्यक्ति की गोली लगने से मृत्यु हो गई. यही वह घटना थी जो आगे चलकर महान क्रांतिकारी ठाकुर रोशन सिंह के लिए फांसी का फंदा बनी. इतिहास गवाह है कि काकोरी रेल एक्शन में शामिल न होने के बावजूद, अंग्रेजी हुकूमत ने इसी बमरौली कांड की पुरानी फाइल खोलकर रोशन सिंह को साजिशन फसाकर उन्हें मौत की सजा दी.
इतिहासकार डॉ. विकास खुराना बमरौली कांड को एक साधारण अपराध नहीं, बल्कि अंग्रेजी न्याय व्यवस्था के दोगलेपन का प्रतीक मानते हैं. उनका कहना है कि ब्रिटिश सरकार ठाकुर रोशन सिंह के व्यक्तित्व और उनकी निशानेबाजी से खौफ खाती थी. डॉ खुराना ने बताया कि बमरौली एक्शन में गोली चलना एक दुर्घटना थी, हत्या नहीं, लेकिन अंग्रेजों को रोशन सिंह को रास्ते से हटाने का बहाना चाहिए था. जब काकोरी रेल एक्शन की सुनवाई शुरू हुई, तो पुलिस ने जानबूझकर बमरौली कांड को काकोरी षड्यंत्र के साथ नत्थी कर दिया. रोशन सिंह पर हत्या की धारा इसी बमरौली कांड के लिए लगाई गई थी, जबकि बाकी साथियों पर राजद्रोह का मुकदमा चला. यह न्याय नहीं, बल्कि एक पूर्व-नियोजित ‘न्यायिक हत्या’ थी.
क्या है बमरौली कांड की पृष्ठभूमि?
डॉ. खुराना कहते हैं कि बमरौली कांड की पृष्ठभूमि और इसके दूरगामी परिणामों को समझना बेहद जरूरी है. राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में जब क्रांतिकारी बमरौली के एक अमीर साहूकार बलदेव प्रसाद के घर धन जुटाने पहुंचे, तो उनका मकसद किसी की जान लेना कतई नहीं था. उस रात अंधेरे और अफरातफरी में चली गोली ने न केवल एक ग्रामीण की जान ली, बल्कि अंग्रेजों को एक अचूक हथियार दे दिया.
बमरौली की घटना को बनाया आधार
काकोरी कांड के बाद जब गिरफ्तारियां हुईं, तो सी.आई.डी. ने बहुत चालाकी से रोशन सिंह की उपस्थिति को बमरौली की घटना से जोड़ा. जज हैमिल्टन की अदालत में इसी एक घटना को आधार बनाकर दलील दी गई कि रोशन सिंह एक ‘खतरनाक अपराधी’ हैं, जिसके फलस्वरूप उन्हें 19 दिसंबर 1927 को इलाहाबाद की मलाका जेल में फांसी दी गई, जबकि वे काकोरी ट्रेन एक्शन का हिस्सा भी नहीं थे.
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मीडिया क्षेत्र में पांच वर्ष से अधिक समय से सक्रिय हूं और वर्तमान में News-18 हिंदी से जुड़ा हूं. मैने पत्रकारिता की शुरुआत 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव से की. इसके बाद उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड चुनाव में ग्राउंड…और पढ़ें