धरती कोड़ते-कोड़ते बिहार में दिखी वो ‘क्रांति’ जिसने बदल दी इंसानी जिंदगी के विकास की दिशा, यहां की मिट्टी बोलती है!

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छपरा. सोचकर देखिये जरा कि सामने बहती गंगा नदी है, लेकिन वहां किनारे खड़े आपके पैरों के नीचे इतिहास सांस ले रहा है- करीब 4000 साल पुरानी वह सभ्यता, जहां इंसान ने पहली बार शिकार छोड़कर खेती करना सीखा, गांव बसाए और समाज की नींव रखी. यह कोई कहानी नहीं, बल्कि हकीकत है बिहार के सारण जिले के चिरांद गांव की. छपरा से महज कुछ किलोमीटर दूर बसा यह गांव भारत की नवपाषाण संस्कृति यानी नीओलिथिक एरा (Neolithic Era) का वह केंद्र है, जिसे पुरातत्वविदों ने इंसानी सभ्यता के विकास का निर्णायक मोड़ माना है. लेकिन, विडंबना देखिए-जिस गंगा ने कभी इस सभ्यता को जीवन दिया, आज वही नदी इसे अपने में समेटने को आतुर है. इतिहास और वर्तमान के इस टकराव के बीच चिरांद आज अस्तित्व की बचाने को पुकार कर रहा है.

बिहार के सारण जिले में छपरा से सिर्फ 11-14 किलोमीटर दूर चिरांद गांव बड़ा ही रोमांचक पुरातत्व स्थल है. यह नवपाषाण काल (नीओलिथिक एरा) का भारत का सबसे महत्वपूर्ण साइट माना जाता है, जहां इंसान ने शिकार छोड़कर पहली बार खेती शुरू की और स्थायी गांव बसाए. ब्रिटिश पुरातत्वविद् एफआर एल्चिन ने इसे ‘भारत की नवपाषाण संस्कृति का उगता सूरज’ कहा था.
नवपाषाण काल (नीओलिथिक एरा) का भारत का सबसे महत्वपूर्ण साइट है चिरांद.

खुदाई के अनोखे खजाने

वर्ष 1960-70 के दशक में बिहार पुरातत्व निदेशालय की खुदाई और 2019 की हालिया एक्सकवेशन ने चिरांद को दुनिया के नक्शे पर ला दिया. यहां तीन कालखंड मिले- एक- नवपाषाण (2500-1345 ईसा पूर्व), दो- ताम्रपाषाण और तीन- लौह युग. गोलाकार झोपड़ियां जंगली घास से बनीं, पत्थर-हड्डी के औजार, तीर-कमान, मनके और आभूषण. सबसे हैरान करने वाला गेहूं, जौ, चावल और मसूर की प्राचीन बालियां हैं. साफ प्रमाण कि यहां कृषि क्रांति की शुरुआत हुई! हड्डी के औजारों की संख्या इतनी कि कश्मीर के बुर्जहोम के बाद भारत में दूसरा स्थान. ये औजार बताते हैं कि प्राचीन लोग शिकार से खेती और व्यापार की ओर बढ़े. चिरांद पूर्वी भारत की स्वतंत्र सभ्यता का जीता-जागता सबूत है, हड़प्पा से अलग अपनी अनोखी संस्कृति!

चिरांद, सारण का नवपाषाण कालीन पुरातत्व स्थल गंगा के कटाव से खतरे में है.

गंगा का खतरा, अस्तित्व की पुकार

चिरांद गंगा-घाघरा के खूबसूरत संगम पर है, लेकिन यही नदी इसका सबसे बड़ा दुश्मन बन गई. सालाना कटाव से साइट का बड़ा हिस्सा नदी में समा चुका. सरकार बोरी और अस्थायी उपाय कर रही, लेकिन जरूरत है बड़े संरक्षण की. बिहार सरकार थीमैटिक पार्क, म्यूजियम और टूरिस्ट सर्किट बनाने की योजना पर काम कर रही, ताकि पर्यटक यहां आकर इतिहास को छू सकें. हालिया क्लीनिंग ड्राइव और संरक्षण प्रयास उम्मीद जगाते हैं. आज यह सभ्यता खुद गंगा की लहरों से जंग लड़ रही है. चिरांद सिर्फ एक गांव नहीं, बल्कि सभ्यता की गुम होती परछाईं है, जो हर साल गंगा के कटाव के साथ और गहरी होती जा रही है.

सारण का नवपाषाण कालीन पुरातत्व स्थल चिरांद गंगा के कटाव से खतरे में है.

चिरांद क्यों है अनमोल?

यह स्थल बताता है कि बिहार प्राचीन काल से समृद्ध और सभ्य था. व्यापार, कला और कृषि के अवशेष यहां की अपनी संस्कृति की गाथा गाते हैं. इतिहास प्रेमी, छात्र या पर्यटक- चिरांद जरूर जाएं. यहां की मिट्टी बोलती है और गंगा गवाही देती है. अगर संरक्षित हुआ तो यह बिहार का नया टूरिज्म हॉटस्पॉट बनेगा, वरना इतिहास हमेशा के लिए खो जाएगा. आज गंगा-घाघरा के संगम पर बसा यह गांव इतिहास की किताब बन सकता है, लेकिन नदी की लहरें इसे निगलने पर आमादा हैं! समय है जागने का- चिरांद को बचाइए, इतिहास को जीवित रखिए!

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