सर्दी में मिठास और सेहत का खजाना: सीवान में तिल, मूंगफली और चावल-चिउरा के लड्डू की धूम – Bihar News

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सीवान. सर्दी का मौसम शुरू होते ही बिहार के हर जिले में घरों और बाजारों की रसोई से पारंपरिक व्यंजनों की खुशबू फैलने लगती है. ठंड से बचने और शरीर को अतिरिक्त ऊर्जा देने के लिए लोग देसी और पौष्टिक खाद्य पदार्थों का सहारा लेते हैं. इन्हीं पारंपरिक व्यंजनों में तिल, मूंगफली, चावल और चिउरा से बने लड्डू खास स्थान रखते हैं. स्वाद, सेहत और परंपरा—तीनों का अनोखा मेल होने के कारण ये लड्डू हर उम्र के लोगों को खूब पसंद आते हैं.

मकर संक्रांति पर बढ़ जाती है डिमांड 
विशेष रूप से मकर संक्रांति, तुसू पर्व और अन्य स्थानीय त्योहारों के दौरान इन लड्डुओं की मांग कई गुना बढ़ जाती है. मान्यता है कि तिल और मूंगफली शरीर को गर्म रखने में मदद करते हैं और ठंड के दुष्प्रभाव को कम करते हैं. वहीं नए धान के चावल और चिउरा से बने लड्डू को नए साल की शुभ शुरुआत का प्रतीक माना जाता है. यही कारण है कि सर्दियों में इनका सेवन बिहार की सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा बन चुका है.

इन सामग्री की है जरूरत
सीवान की शांति देवी बताती हैं कि तिल, मूंगफली और अनाज के लड्डू बनाने के लिए ज्यादा सामग्री की जरूरत नहीं होती. इसमें सफेद या काले तिल, मूंगफली, चावल या चिउरा, देसी गुड़ और थोड़ा सा घी इस्तेमाल किया जाता है. कुछ लोग स्वाद बढ़ाने के लिए इलायची पाउडर भी मिलाते हैं, लेकिन पारंपरिक स्वाद के लिए चावल, चिउरा, तिल, मूंगफली और गुड़ ही काफी होते हैं.

इस तरीके से करें तैयार 
लड्डू बनाने की प्रक्रिया भी उतनी ही पारंपरिक है. सबसे पहले मूंगफली को धीमी आंच पर भूनकर उसका छिलका उतार लिया जाता है. इसके बाद तिल को हल्का भूनते हैं. चावल और चिउरा को गांवों में आज भी घोंसार में नमक और बालू के माध्यम से भूनने की परंपरा है, जिससे उनमें खास खुशबू और स्वाद आ जाता है. इसके बाद गुड़ को छोटे टुकड़ों में काटकर कढ़ाही में धीमी आंच पर पिघलाया जाता है. जब गुड़ पूरी तरह पिघल जाए, तब उसमें जिस अनाज की लड्डु बनानी है जैसे भुनी हुई मूंगफली, तिल, चावल और चिउरा उसमें अलग अलग मिलाकर अच्छे से चलाया जाता है. चाहें तो इस दौरान इलायची पाउडर भी डाला जा सकता है.

सर्दी के मौसम में बेहतर विकल्प 
मिश्रण को थोड़ा ठंडा होने देने के बाद हाथों में घी लगाकर जहां तिल व मूंगफली के छोटे-छोटे लड्डू बनाए जाते हैं तो वहीं अनाज चावल व चिउरा का हाथ के आकार की लड्डू तैयार की जाती है. कुछ ही देर में स्वादिष्ट और पौष्टिक लड्डू तैयार हो जाते हैं. इन्हें एयरटाइट डिब्बे में कई दिनों तक सुरक्षित रखा जा सकता है, ताकि पूरे सर्दी के मौसम में इनका आनंद लिया जा सके.

ग्रामीण इलाकों में तिल और मूंगफली के लड्डू को ताकत देने वाला भोजन माना जाता है. खेतों में काम करने वाले किसान और मजदूर सर्दियों में इन्हें खास तौर पर खाते हैं. महिलाएं बच्चों और बुजुर्गों को यह लड्डू इसलिए खिलाती हैं, क्योंकि यह ऊर्जा के साथ-साथ जरूरी पोषण भी प्रदान करता है.

धार्मिक दृष्टि से भी इन लड्डुओं का विशेष महत्व है. खरमास की समाप्ति के बाद मकर संक्रांति के अवसर पर नए अनाज से बने चावल और चिउरा के लड्डू का विशेष प्रसाद तैयार किया जाता है. ऐसा कहा जाता है कि खरमास खत्म होने के बाद इन्हीं लड्डुओं को खाकर लोग नए साल की शुरुआत करते हैं.

इन लड्डुओं की बढ़ती मांग का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इन दिनों जिले के लगभग हर चौक-चौराहे पर लोग अन्य काम छोड़कर लड्डू बनाने और बेचने में जुटे हैं. सीवान के दुकानदार सुरेंद्र चौधरी बताते हैं कि वे आमतौर पर समोसा और जलेबी की दुकान चलाते हैं, लेकिन हर साल दिसंबर आते ही लड्डू के इस मौसमी व्यवसाय में लग जाते हैं. मकर संक्रांति के बाद फिर वे अपने पुराने व्यवसाय में लौट जाते हैं.

रेट की बात करें तो सुरेंद्र चौधरी के अनुसार चावल के लड्डू 80 रुपये किलो, चिउरा के लड्डू 90 रुपये किलो और तिल के लड्डू करीब 400 रुपये किलो बिक रहे हैं. उनका कहना है कि वे प्रतिदिन लगभग दो क्विंटल अनाज से बने ये खास लड्डू बेच रहे हैं. साफ है कि सर्दियों में ये पारंपरिक लड्डू न सिर्फ सेहत का खजाना हैं, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए रोजगार और आय का भी बड़ा साधन बन गए हैं.

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