मोतीलाल वोरा: विनम्रता को बनाया था राजनीति का हथियार, विरोधी पार्टियों में भी थे ‘दोस्त’!

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बहुगुणा अकेले ऐसे नेता नहीं थे, जो राजनीति में ऊंचा मुकाम हासिल करने का श्रेय वोरा को देते थे. यूपीए के शासन के दौरान कई मंत्रियों को लगता था कि उन्हें वोरा की बदौलत ही मंत्रिमंडल में जगह मिल सकी. जुलाई 2011 में जब चरण दास महंत राज्य मंत्री बने थे, तब उन्हें वोरा को दंडवत प्रणाम करते देखा गया. उस समय एआईसीसी कोषाध्यक्ष रहे वोरा ने उन्हें धीरे से उठाते हुए कहा था, ‘भगवान का शुक्रिया अदा कीजिए, सोनिया जी का शुक्रिया अदा कीजिए. मेरी इसमें कोई भूमिका नहीं है.’

राजनीति में किसी पद पर पहुंचने के बाद भी विनम्रता का गुण बेहद दुर्लभ माना जाता है, लेकिन यही विनम्रता, शिष्टाचार और मर्यादा वोरा की सबसे बड़ी खूबी थी. मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री, राज्यपाल, मध्य प्रदेश कांग्रेस प्रमुख या एआईसीसी कोषाध्यक्ष जैसे तमाम अहम पदों पर रहने के बावजूद वोरा में अहंकार का भाव कभी छू तक नहीं गया. यही वजह है कि इसी हफ्ते 17 दिसंबर बुधवार को मप्र विधानसभा के 69 साल पूरे होने के अवसर पर आहूत विशेष सत्र में भी वोरा को एक विनम्र और संवेदनशील प्रशासक के तौर पर याद किया गया.

चाय छोड़ने वाले को टोकना नहीं भूलते थे…

विनम्रता का यह भाव उनके व्यवहार भी झलकता था. उनसे मिलने आने वाले हर आगंतुक को गरमागरम चाय जरूर पिलाई जाती थी. इस परंपरा के कारण कभी-कभार उनकी बैठकों का शेड्यूल गड़बड़ा जाता था. फिर यह व्यवस्था बनाई गई कि उनके कार्यालय में एआईसीसी कैंटीन से एक लड़के को चाय से भरे थर्मस, कप और प्लेट के साथ हमेशा मौजूद रहने को कहा जाने लगा. यह लड़का आगंतुकों के पहुंचते ही उन्हें चाय परोस देता. अक्सर चाय खत्म होते-होते बैठक भी खत्म हो जाती. इससे जुड़ा एक दिलचस्प प्रसंग भी है. यह 1990 के दशक की बात है. एक बार एक आदमी, जो मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं था, खुद को प्रियंका का पति बताते हुए उनके कार्यालय के अंदर घुस गया. वोरा ने उस व्यक्ति की चाय खत्म होने का इंतजार किया और सुरक्षाकर्मी को तलब करने के बजाय उसे नमस्ते कहकर विदा किया. वोरा प्याली में चाय छोड़ने वालों को विनम्रता के साथ टोकने से भी नहीं चूकते थे. वे मुस्कराते हुए कहते थे, ‘इस पर पैसे खर्च होते हैं. आठ रुपए की चाय आती है.’ दरअसल, उनका हमेशा ही इस बात पर जोर रहता कि कोई चीज बर्बाद नहीं होनी चाहिए.

वह कुर्सी केवल ‘बाबूजी’ के लिए थी!

2004 से 2014 तक, जब कांग्रेस-नीत यूपीए केंद्र में सत्तारूढ़ था, तब सत्ता के गलियारों में कैबिनेट मंत्रियों या प्रधानमंत्री कार्यालय की तुलना में वोरा और पार्टी के एक अन्य कद्दावर नेता अहमद पटेल के टेलीफोन कॉल तथा मौखिक संदेशों को अधिक अहमियत दी जाती थी. उस समय 15 गुरुद्वारा रकाबगंज मार्ग स्थित दफ्तर कांग्रेस के लिए वॉर रूम के तौर पर काम करता था. इस वॉर रूम के मिनी कॉन्फ्रेंस रूम में वोरा के लिए एक कुर्सी रखी होती थी. यहां तक कि जब पी. चिदंबरम, प्रणब मुखर्जी, ए.के. एंटनी और सुशील कुमार शिंदे जैसे दिग्गज कांग्रेसी बैठकों में शामिल होते थे, तब भी ‘बाबूजी’ (वोरा) के लिए रखी कुर्सी पर कोई नहीं बैठता था. वोरा और पटेल हर बैठक के बाद समीक्षा के लिए रुकते. दोनों नेताओं के पास अक्टूबर-नवंबर 2020 तक पार्टी के 24 अकबर रोड स्थित मुख्यालय से जुड़े चेक पर दस्तखत करने का संयुक्त अधिकार था. उनके बीच तालमेल भी बेहतरीन था. निजी बातचीत में भी शायद ही कभी दोनों के बीच मतभेद नजर आए हों.

हर पार्टी के बीच थी स्वीकार्यता…

राजनीतिक विचारधारा में भिन्नता के बावजूद मोतीलाल वोरा की हर पार्टी में स्वीकार्यता रही. साल 2007 में तो बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की अध्यक्ष मायावती ने उनके नाम की राष्ट्रपति पद तक के लिए पैरवी की थी. 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी राज्यसभा में संबोधन के दौरान सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत ‘उत्कृष्ट’ कार्य करने को लेकर वोरा की जमकर तारीफ की थी. भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी, राजनाथ सिंह और अरुण जेटली भी उनकी गिनती अपने ‘दोस्तों’ में किया करते थे.

जब 24 अकबर रोड पर गिर पड़ा था एक बड़ा पेड़

वोरा अपनी वाकपटुता के लिए भी जाने जाते थे. पुराने नेता याद करते हैं कि कैसे एक मौके पर वोरा ने निराशावादियों को बिना किसी आलोचना के चुप करा दिया था. दरअसल, पार्टी के 24 अकबर रोड स्थित परिसर में एक बड़ा पेड़ गिर गया था. यह घटना तब की है, जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे और कांग्रेस के सितारे गर्दिश में चल रहे थे. किसी ने पेड़ की तुलना कांग्रेस से करते हुए इशारा किया कि पार्टी की जड़ें कमजोर पड़ रही हैं. वोरा ने उस व्यक्ति से बहस करने के बजाय पेड़ के गिरने से खाली हुई जगह की तरफ इशारा किया और कहा, ‘देखो, कितनी खाली जगह निकल आई.’

सिंधिया के इनकार से मिला था सीएम बनने का मौका!

वोरा के सियासी कॅरियर में एक बड़ा मोड़ 1985 में तब आया, जब वे मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी का नेतृत्व कर रहे थे और अर्जुन सिंह ने राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली ही थी. शपथ ग्रहण समारोह के बाद जब अर्जुन सिंह अपने मंत्रिमंडल पर राजीव गांधी की मुहर लगवाने के लिए दिल्ली पहुंचे, तब राजीव ने उनसे पंजाब का राज्यपाल बनने को कहा. कहा जाता है कि राजीव गांधी चाहते थे कि माधवराव सिंधिया मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर अर्जुन सिंह की जगह लें. जब सिंधिया और वोरा चार्टर्ड विमान में एक साथ रवाना हुए तो ग्वालियर के महाराजा ने एक मुख्यमंत्री की दिनचर्या, कामकाज और भोपाल के बारे में पूछना शुरू कर दिया. जब तक विमान भोपाल में उतरा, तब तक सिंधिया ने मुख्यमंत्री का पदभार न संभालने का मन लिया था. उन्होंने फौरन राजीव गांधी को फोन कर उनसे मुख्यमंत्री पद के लिए वोरा के नाम पर विचार करने को कहा. दरअसल, सिंधिया चाह रहे थे कि वे दिल्ली में केंद्रीय मंत्री बनने के साथ-साथ अपनी व्यस्त सामाजिक जिंदगी भी जी सकें. कारण जो भी था, वोरा हमेशा सिंधिया के आभारी रहे.

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