गजब की अकबर की शाही किचन – ड्राईफ्रूट्स वाले भरवां करेले, दही वाली दाल
अगर ये पूछा जाए कि मुगलों में किसके समय में शाही रसोई ने सबसे ज्यादा समृद्ध थी. एक से बढ़कर एक ना जाने कितने लाजवाब जायकेदार खाने बनाती थी. खानों को स्वादिष्ट बनाने के साथ जमकर प्रयोग करती थी. दस्तरखाने पर जब कई व्यंजन सजाए जाते थे तो लोग देखते रह जाते थे. वैसे अकबर की किचन में ये व्यंजन कैसे बनते थे. फिर कैसे पैक होकर शाही दस्तरख्वान पर परोसे जाते थे – इसकी भी रोचक कहानी है. हम आखिर में आपको ये भी बताएंगे कि दाल को दही में मिलाकर तब शाही रसोई कैसे बनाती थी, जो अकबर को बहुत प्रिय थी तो इसी के साथ करेला वो स्वादिष्ट भरवां भी, जो बादशाह को भाता था.
मुगल बादशाहों में अकबर ऐसा राजा था, जिसकी रुचियां और दिलचस्पी काफी अलग अलग क्षेत्रों में थी. परिष्कृत थी. असल में मुगल शाही किचन को उन्होंने खास विभाग बना दिया. शाही किचन ने उनके दौर में वाकई भारतीय पाक कला क्षेत्र में क्रांति ही ला दी. बादशाह जहां भांति भांति के भोजन का प्रेमी था, वहीं अच्छे खाने का शौकीन भी. जिसको मांसाहार के साथ शाकाहार पसंद था लेकिन जैसे जैसे वह जैन और हिंदू धर्म के विद्वानों की सोहबत में आया, उसके खाने में शाकाहारी व्यंजन बढ़ने लगे.
सलमा हुसैन की किताब द एम्परर्स टेबल द आर्ट ऑफ मुगल कुजीन इस बारे में विस्तार से लिखती है. उनके दस्तरख्वान पर तुर्की, फारसी और भारतीय स्वादों का एक अद्भुत मिश्रण देखने को मिलता था.
अकबर के जमाने में आए स्पेनी ईसाई पादरी मॉन्स्टरेट के अनुसार, अकबर को मांस पसंद नहीं था. वे इसे केवल मौसमी तौर पर ही खाते थे. उन्होंने पहले सभी शुक्रवारों को मांस का सेवन नहीं किया, बाद में रविवार को भी, फिर प्रत्येक सौर माह के पहले दिन, फिर पूरे मार्च महीने में और आखिर में अपने जन्म के महीने अक्टूबर में.
भोजन की शुरुआत दही और चावल से
वे अपने भोजन की शुरुआत दही और चावल से करते थे. सादा भोजन पसंद करते थे, धर्मगुरु के अनुसार, उनकी मेज भव्य होती थी. इसमें 40 से अधिक व्यंजन बड़े-बड़े बर्तनों में परोसे जाते थे. पके हुए भोजन को तीन वर्गों में बांटा गया था: पहला – बिना मांस वाला भोजन सूफियाना कहलाता था; दूसरा – अनाज और मांस से बना भोजन और तीसरा – मसालों के साथ पका हुआ मांस.
सोने चांदी के बर्तनों में पकता था खाना
पानी लाकर मिट्टी के बर्तनों में भरा जाता था, जिसमें गंगा का थोड़ा सा पानी मिलाया जाता था. खाना सोने, चांदी, पत्थर या मिट्टी के बर्तनों में पकाया जाता था. खाना पकाते समय रसोई की सुरक्षा की जाती थी. रसोई स्टाफ के अलावा कोई और तब रसोई घुस भी नहीं सकता था.
फिर खाने की पैकिंग लाल और सफेद कपड़ों में
खाना परोसने से पहले इसके स्वाद को चखा जाता था. सोने और चांदी के बर्तनों को लाल कपड़े में लपेटा जाता था, तांबे और चीनी मिट्टी के बर्तनों को सफेद कपड़े में. उनका मुख्य खानासामा मीर बाक़वाल हर बर्तन पर अपनी मुहर लगाने के बाद उस पर उस व्यंजन का नाम भी लिखता था. तरह-तरह के अचार, चटनी, ताज़ा अदरक, नींबू और पुदीना, हरा धनिया जैसी हरी सब्ज़ियां छोटी-छोटी थैलियों में लपेटी जाती थीं. इन सभी पर मीर बाक़वाल की मुहर लगी होती थी. वहां से रसोई का स्टाफ, सुरक्षा गार्डों के साथ अकबर के खाने के दस्तरख्वान तक पहुंचाता था. खाने की पैकिंग एक एक करके सजाई जाती थी.
रोटी अलग से पकाई जाती थी
सिकल-खानाब यानि बेकरी में रोटी अलग से पकाई जाती थी. यह दो प्रकार की होती थी – बुज़ुर्ग सम्मन, जिसे ओवन में पकाया जाता था और जरूरत के हिसाब से छोटा या बड़ा बनाया जाता था. दूसरी तनक तबगी होती थी, जिसे लोहे की प्लेट पर पकाया जाता था. तनक तबगी कई प्रकार से बनाई जाती थी. ये रोटी चपाती कहलाती थी. चपाती में परिष्कृत आटे की अच्छी मात्रा होती थी. इसे गरमागरम परोसा जाता था.
अकबर की कुल्फी
आइन – ए -अकबरी में अकबर के शाही रसोईघर में एक व्यंजन का उल्लेख है जो बिल्कुल आज की कुल्फी की तरह है. ये गाढ़े दूध में पिस्ता और केसर को मिलाकर बनती थी. इसे शंक्वाकार धातु के उपकरण में आटे से सील किया जाता था.
राजपूतों के साथ उनके गठबंधन ने शाही भोजन में राजस्थानी स्वाद का समावेश किया. राजस्थान के रेगिस्तान राजपूत शिकारियों के लिए अच्छे शिकार उपलब्ध कराते थे. सम्राट का पसंदीदा खेल शिकार था. कई व्यंजन शिकारगाह में भूमिगत गड्ढों में विकसित किए गए और वहीं पकाए गए. आज भी राजस्थान में खाना पकाने की यह शैली प्रचलित है.
वैसे तो अकबर अधिकतर एकांत में भोजन करते थे. 24 घंटे में केवल एक बार ही भोजन करते थे. त्योहारों के दिनों में ही वे अपने दरबारियों के साथ भोजन करते थे.
अकबर की किचन के मुख्य व्यंजन
आइन-ए-अकबरी जिन व्यंजनों का जिक्र हुआ. वो इस तरह थे.
मांसाहारी व्यंजन (विशेष रूप से शिकार से प्राप्त)- कई तरह के कबाब, कॉरमा, दोपियाज़ा, पुलाव, बिरियानी शब्द का सीधा प्रयोग नहीं मिलता, लेकिन पुलाव और ज़र्द-बिरिंज (केसरिया चावल) जैसे व्यंजनों के बारे में इसमें जरूर लिखा है. शिकार से प्राप्त मांस जो किचन में बनाए जाते थे, उसमें हिरन, मोर, तीतर, बटेर, बतख, खरगोश आदि के मांस से बने व्यंजन.
शाकाहारी – खिचड़ी, खिचड़ी-ए-दही, दलिया, कई तरह का हलवा. राब (राबड़ी), रोटियां और ब्रेड, नान, रोटी चपाती, शीर-माल (दूध और मक्खन मिलाकर बनाई जाने वाली मीठी और नरम रोटी), बाजरे और ज्वार की रोटी, कई तरह की दालें, पालक, गाजर, मूली, बैंगन, भिंडी, कद्दू आदि के प्रयोग से बनने वाली सब्जियां.
मिठाइयां और डेसर्ट – फिरनी, पायसम – खीर, मुरब्बा, शर्बत, कुल्फी, दही, लस्सी, पनीर (चीज़). फलों के रस और ठंडे पेय.
अकबर के ड्राईफ्रूट्स वाले दम के करेले
इसके पकने में करीब एक घंटा लगता था. हालांकि तैयारी में भी इतना ही समय लगता था. धोये हुए करेले का छिलका उतारकर इस्तेमाल में लाया जाता था. साथ नमक, इमली के पत्ते, किशमिश, उबले हुए बादाम, तले हुए प्याज, कटे प्याज, बारीक कटे अदरक, धनिया सीड्स, जीरा पाउडर, योगर्ट, नींबू के रस, केसर, घी, भूरी इलायची. सबूत काली मिर्च, काला जीरा, दालचीनी और लौंग.
– करेले को लंबाई में चीरा लगाकर उसके बीज निकाल लें और कड़वाहट दूर करने के लिए नमक रगड़ें.
– इमली के पत्तों के साथ करेले को उबालें. नरम होने पर आंच से उतार लें. ठंडा होने के लिए अलग रख दें.
– एक पैन में 1 बड़ा चम्मच घी गरम करें; किशमिश को भूनें. बादाम और भुने हुए प्याज डालें; अच्छी तरह मिलाएं. आँच से उतारकर ठंडा होने दें. प्रत्येक करेले में इस मिश्रण को भरें. धागे से बांधकर मिश्रण को अंदर सील कर दें.
– बचे हुए घी को एक पैन में गरम करें; प्याज को हल्का सुनहरा होने तक भूनें. अदरक, कुटी हुई धनिया पत्ती और जीरा पाउडर डालें. एक मिनट तक भूनें. दही डालकर अच्छी तरह मिला लें. पैन में भरे हुए करेले रखें. बचा हुआ मिश्रण डालें. पैन को ढककर सील कर दें. 10 मिनट तक दम पर पकाएं
– पैन का ढक्कन हटा दें, उसमें नींबू का रस, केसर और ताजा पिसा हुआ मसाला पाउडर डालें.
दही के साथ पकी हुई दाल
तैयारी का समय – 20 मिनट. पकाने का समय 40 मिनट.
सामग्री – सिनेमोन (दालचीनी), 1/2″ स्टिक, मसूर दाल 2½ कप/500 ग्राम, दही, घी – 4 बड़े चम्मच- 60 ग्राम, नमक, प्याज कटा हुआ, योगर्ट (दबी), नींबू का रस,
जिंजर (अदरक) जूस 2 छोटे चम्मच, केसर, लौंग, दूध, छोटी इलायची के दाने.
– दाल को नमक डालकर उबालें और पानी निकाल दें.
– इसमें दही और अदरक का रस मिलाएं और एक घंटे के लिए अलग रख दें.
– लौंग, हरी इलायची और दालचीनी को बारीक पीस लें. छानकर अलग रख दें.
– एक पैन में घी गरम करें; प्याज को सुनहरा भूरा होने तक भूनें. प्याज का एक तिहाई हिस्सा निकाल लें.
– पिसे हुए मसाले डालकर भूनें. दही में मिलाई हुई दाल डालें. एक कप पानी डालकर धीमी आंच पर पकाएं.
– जब दाल नरम और पक जाए, तो उसमें नींबू का रस, केसर का मिश्रण और हाथ से कुटी हुई भूरी प्याज डालें. ढककर दम पर पकाएं
– इसे वर्क लगाकर परोसें.
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