बेटे-बहू और पोतों को इंसाफ दिलाते-दिलाते दुनिया को अलविदा कह गया बुजुर्ग, कैसे आज भी अबुझ पहेली है कोहली मर्डर केस? | kohli murder case 1997 | delhi police | encounter specialist lalit mohan negi | delhi unsolved mystery

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Kohli Murder Mystery Case: आज से करीब 31 साल पहले, जब दिल्ली का वसंत कुंज इलाका इतना आबाद नहीं था जितना आज है, वहां की खामोशी एक ऐसी चीख में बदली जिसने पुलिस के होश उड़ा दिए थे. साल 1994 की वह सर्द रात और जनवरी का महीना आज भी दिल्ली पुलिस के लिए एक अबुझ पहेली बनी हुई है. वसंत कुंज के पॉश इलाके में एक परिवार का मर्डर मिस्ट्री जो एक पर्स से सुलझी थी, अदालत में ऐसी उलझी कि आज तक सुलझ नहीं पाई. एक बूढ़ा पिता अपने जवान बेटे, बहू और दो पोतों की मौत का गुनाहहार को खोजते-खोजते इस दुनिया से चल बसा. लेकिन आज भी उस मर्डर मिस्ट्री की चर्चा और गुनाहगारों को सजा नहीं दिलाने का मलला दिल्ली पुलिस के एनकाउंटर स्पेशलिस्ट ललित मोहन नेगी को सता रहा है. चार जिंदगियों को मौत के नींद सुलाने वाला आज भी कानून के पकड़ से बाहर है. पढ़िए इस पुरानी मगर सनसनीखेज क्राइम फाइल की अधूरी कहानी.

दिल्ली के पॉश इलाके वसंत कुंज के एक आलीशान मकान में जब सुबह देर तक कोई हलचल नहीं हुई, तो पड़ोसियों को शक हुआ. दिल्ली पुलिस को बुलाया गया और जब दरवाजा तोड़ा गया तो अंदर का मंजर भयावह था. परिवार के सदस्यों की लाशें अलग-अलग कमरों में पड़ी थीं. पत्नी की लाश अलग कमरे में, पति की बॉडी अलग कमरे में और दोनों बच्चे एक कमरे में फर्श पर पड़े थे.

कोहली मर्डर मिस्ट्री क्या था?

दिल्ली पुलिस की शुरुआती जांच में लगा कि यह लूट का मामला है. अलमारियां खुली थीं, सामान बिखरा पड़ा था. लेकिन पुलिस को एक बात खटक रही थी कि घर में जबरन प्रवेश का कोई निशान नहीं था. इसका साफ मतलब था कि कातिल कोई जान-पहचान वाला था या फिर उसे घर के अंदर बुलाया गया था. पड़ोसियों ने भी किसी संदिग्ध को आते-जाते नहीं देखा था. पुलिस के लिए यह एक ब्लाइंड मर्डर केस बनता जा रहा था. जांच अधिकारी परेशान थे कि आखिर सुराग कहां से मिलेगा?

दिल्ली के पॉश इलाके में घर के अंदर चार लाशें

यह घटना तब दिल्ली के चर्चित मर्डर केसों में से एक केस हो गया था. रात के अंधेरे में अपराधियों ने एक पूरे परिवार का खात्मा कर दिया था. इस मर्डर मिस्ट्री की जांच दिल्ली पुलिस के सुपर कॉप ललित मोहन नेगी को सौंपा गया. इस मर्डर मिस्ट्री तक पहुंचने में नेगी ने पूरी कोशिश की. ललित मोहन नेगी कहते हैं, ’22 जनवरी 1994 को सुबह 5 बजे वसंत विहार पुलिस को एक सूचना मिली कि वसंत कुंज के डी-3/3122 मकान में एक परिवार का कत्ल कर दिया गया है. मैं पूरी टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गया. घर के अंदर सरनपाल कोहली उनकी पत्नी और उनके दो बेटों की डेड बॉडी अलग-अलग कमरों में फर्श पर पड़ी मिली. एक बेटा 4 साल का था दूसरा 3 साल का था.’

दिल्ली पुलिस के एनकाउंटर स्पेशलिस्ट ने क्या कहा

नेगी कहते हैं, ‘हमने इस केस की तफ्तीश शुरू कर दी. हमारे सामने पहली चुनौती यह थी कि हत्यारा कौन है और उसे कैसे खोजा जाए? सरनपाल कोहली शेयर का काम करते थे. इसलिए सबसे पहले उनके साथ काम करने वाले लोगों से पूछताछ शुरू कर दी. हमलोगों को शक था कि सरनपाल कोहली और उनके परिवार की हत्या किसी ऐसे शख्स ने की होगी, जिसका घर में फ्रेंडली एंट्री थी. घर के अंदर कहीं कोई जोर-जबरदस्ती के साक्ष्य नहीं मिले. पूछताछ में पता चला कि उनके दो कर्मचारी राम पाल सिंह चौहान और परमिंदर सिंह का सरनपाल से अच्छा संबंध था. दूसरे लोग और अन्य कर्मचारियों से पूछताछ में भी दोनों के संबंध का पता चला. इसके बाद दोनों को हमलोगों ने डिटेन कर लिया.’

किसने सरनपाल कोहली और उनके परिवार का मर्डर किया?

नेगी के मुताबिक, ‘दोनों पुलिस पूछताछ में बयान बार-बार बदल रहा था. हमलोगों को पता चला कि गिरफ्तार दोनों शख्स का शेयर का काम करने वाले सरनपाल कोहली के पास बहुत पैसा होने का शक था. हालांकि, हमने सरनपाल के शेयर सर्च किए तो ऐसा कुछ नहीं मिला. लेकिन, घटनास्थल से मृतक के जेब से एक पर्स मिला, जो उसका नहीं था. फिर मैंने सोचा कि कौन ऐसा शख्स है, जो सरनपाल के जेब में पर्स डाला है? आखिर उसका क्या मकसद था? हमलोगों को पता चला कि वह पर्स गाजियाबाद में बनता है. किसी तरह पर्स की कंपनी का पता लगाया.’

बूढ़ा मां-बाप इंसाफ दिलाते-दिलाते दुनिया को कहा अलविदा

नेगी कहते हैं, ‘जब हमलोग गाजियाबाद के उस पर्स के मालगोदाम में पहुंचे तो पता चला कि उस मालगोदाम में एक गिरफ्तार शख्स रामपाल का पिता काम करता है. उसके पिता ने वह पर्स मालखाने में जमा कराने के बजाए खुद रख लिया था. वही पर्स उसका बेटा इस्तेमाल करने लगा. इससे एक और सबूत मिल गया. इस बीच घटनास्थल पर फिंगर प्रिंट भी दोनों आरोपी के फिंगर प्रिंट से टेली हो गया था. फिर हम लोगों ने उस चापर्ड हथियार को बरामद किया, जिसका इस्तेमाल मारने में हुआ था.’

नेगी ने कहा कि अदालत ने तब कहा था कि कोई डायरेक्ट एविडेंस नहीं है. इस वजह से आरोपी को कोर्ट ने बेनिफिट ऑफ डाउट देकर रिहा कर दिया. बाद में इस केस को सीबीआई को सौंप दिया गया. दो साल से अधिक समय तक चले इस मुकदमे में 11 गवाहों के बयान दर्ज किए गए थे. लेकिन, बचाव पक्ष ने दलील दी कि चार्जशीट में कई विरोधाभास है. राम पाल सिंह चौहान और परमिंदर सिंह रिहा हो गया. कई सालों तक सरनपाल सिंह कोहली के पिता हर चरण सिंह कोहली बनाम दिल्ली पुलिस केस चलता रहा. यह मामला आज भी मिस्ट्री बना हुआ है. अब तो हर चरण सिंह कोहली भी बेटे, बहू और पोतों का कातिल खोजते-खोजते इस दुनिया से चल बसे. यह मर्डर मिस्ट्री ऐसी है, जो आज भी दिल्ली पुलिस के अबुझ पहेली बनी हुई है.

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